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मैं ये समझ चुका हूं कि इन्‍हें चैरिटी की जरूरत नहीं है : राजेश अग्रवाल, सचिव, GOI

हर इस प्रकार के बच्‍चे के अंदर कोई ऐसी बात होती है जो सबसे खास होती है. मेरा एक साथी है वो 400 पेज के पीडीएफ को मुझसे तीन गुना से ज्‍यादा स्‍पीड से समझ सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

बिजनेस वर्ल्‍ड के BW People Disability positive Summit & Awards 2023 में संबोधित करते हुए मिनिस्‍ट्री ऑफ सोशल जस्टिस में इंपावरमेंट ऑफ परसन विद डिसेबिलिटी विभाग के सचिव राजेश अग्रवाल ने कई अहम बातें कहीं. उन्‍होंने कहा कि अब इन दिव्‍यांगजनों के साथ काम करते हुए मैं ये समझ गया हूं कि इन्‍हें किसी दया की जरूरत नहीं है. इनमें बहुत पोटेंशियल है, आप इनको इनकी कॉम्‍पीटेंस पर लीजिए और अगर न अच्‍छा लगे तो निकाल दीजिए. 

देश की 10 प्रतिशत आबादी दिव्‍यांग 
सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि मैंने इस विभाग को मात्र 6 महीने पहले ही ज्‍वॉइन किया है. तब मैंने जाना कि 10 प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरह से दिव्‍यांग है. कई बार हम इसके बारे में बात नहीं करते हैं और कई बार इसे इग्‍नोर भी कर देते हैं. हमारे देश में माना जाता है कि 1/3 प्रकार की डिसेबिलिटी जन्‍म से ही होती है, आज हमारे देश में कानून के अनुसार 21 तरह की डिसेबिलिटी है. इनमें एक तिहाई युवावस्‍था में किसी एक्‍सीडेट के कारण होती है, या एंटीबॉयोटिक लेने के कारण होती हैं, और एक तिहाई उम्र के कारण या कहें बुढ़ापे में हो जाती है. दिव्‍यांगता हमारे चारों ओर हमें दिख जाती है लेकिन कई बार हम इसके बारे में बात तक नहीं करते हैं. 

खुशी की बात है कि इन्‍हें भी मिल रहा है अवसर 
सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि मुझे बड़ी खुशी हुई जब मैं ललित होटल के अंदर आया और मैने देखा कि कोई 10 लोग ऐसे हैं जो दिव्‍यांग हैं, सुनने में सक्षम नहीं है. मनीषा भी सुनने में सक्षम नहीं है लेकिन वो फ्रंट ऑफिस को देख रही है. उसे कहीं छिपाकर नहीं रखा गया है. वो उसे ग्रो करने का पूरा अवसर दे रहे हैं. लेकिन मनीषा ने जो कहा कि ये जो साइन लैंग्‍वेज वाला मामला है, उसे लेकर काम करने की जरूरत है.  एक सुन न सकने वाले बच्‍चे के पेरेंट थे, वो वास्‍तव में साइन लैंग्‍वेज को जानते थे, उन्‍होंने मुझसे कहा कि अगर बच्‍चा ब्‍लाइंड है तो माता पिता उससे बात कर सकते हैं और वो सुन सकता है, यानी उससे बातचीत का रास्‍ता बना हुआ है, लेकिन अगर बच्‍चा सुन नहीं सकता है तो माता पिता उससे कम्‍यूनिकेट नहीं कर सकते हैं. ऐसे में माता पिता उससे बात नहीं कर सकते हैं. क्‍योंकि बच्‍चा पेट से साइन लैंग्‍वेज नहीं जानता है, बच्‍चा यहां तक के ये भी नहीं कह सकता है कि मैं भूखा हूं मैं प्‍यासा हूं.

पिछले महीने हमने माता पिता और उन बच्‍चों के साथ वर्कशॉप की थी जिनके न सुन सकने वाले जुड़वा बच्‍चे है. बच्‍चे बहुत खुश थे कि वो साइन भाषा से एक दूसरे से बात कर पा रहे हैं. उसने कहा कि मुझे बड़ी खुशी हो रही है कि मेरे माता पिता मेरे दूसरे भाई बहनों से तो बहुत बात करते हैं लेकिन मुझसे तो बात कर ही नहीं पाते हैं. उसने कहा कि मेरे बड़े भाई को सिखाने का कोई फायदा नहीं है वो मेरी बात नहीं सुनने वाला, मेरे छोटे भाई को सिखा दो उससे गप्‍पे मारने में बड़ा मजा आएगा. ये उन बच्‍चों के एंबीशन हैं जो सुन नहीं सकते हैं. 

कुछ ही लोग पोटेंशियल के बराबर कुछ कर पाते हैं
हमारे देश में कुछ ही ऐसे बच्‍चे होते हैं जो अपने पोटेंशियल के बराबर कुछ कर पाते हैं. क्‍लास 10 देख लीजिए ग्रेजुएशन देख लीजिए बहुत ड्रापआउट है. फीगर कहते हैं कि अगर आप सामान्‍य लोगों के मुकाबले इन लोगों को अवसर देते है तो ये ज्‍यादा प्रोडक्‍टिव साबित होते हैं. एक सामान्‍य आदमी अपने एक सप्‍ताह में 100 से ज्‍यादा दोस्‍तों को फोन करता है जबकि दिव्‍यांग कर्मचारी उनके मुकाबले 10 से 15 लोगों को ही कॉल करता है. ये लोग सामान्‍य के मुकाबले कम डिस्‍ट्रैक्टिव होते हैं.

इनमें कुछ विशेष शक्ति होती है
जब मैंने ऐसे बहुत सक्‍सेस लोगों से बात की जो देख नहीं सकते हैं, मेरा एक दोस्‍त है अमर जो कॉरपोरेट लॉयर है मैंने आईफोन के कई नए फीचर उससे सीखे हैं. अमर मुझसे कहता है कि सर आप जो 2 घंटे में सुनते हो मैं उसे 20 मिनट में समझ लेता हूं और आपसे अच्‍छा समझ लेता हूं. अगर आप अमर को 400 पेज की एक पीडीएफ पढ़ने के लिए दे दो तो वो अपने टूल के जरिए तेज स्‍पीड से सामान्‍य आदमी के मुकाबले एक तिहाई से कम समय में सीख लेता है. उबर और ललित जैसी कंपनियां आज इन लोगों को जॉब दे रही हैं. 


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