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'Digital से Books हुई बूस्ट,पब्लिकेशन पर GST असंगत,नेशनल बुक पॉलिसी क्यों जरूरी'

अदिति माहेश्वरी कहती हैं कि आजकल शोध आधारित यानी रिसर्च बेस्ड किताबों का बहुत बोलबाला है. पाठक ऐसी पुस्तकों को ज्यादा पसंद करते हैं.

नीरज नैयर 2 years ago

वाणी प्रकाशन की सीईओ अदिति माहेश्वरी (Aditi Maheshwari) मानती हैं कि किताबें राष्ट्र का निर्माण करती हैं और प्रकाशक उसमें कारीगर की भूमिका निभाता है. हालांकि, उन्हें यह भी लगता है कि सरकारी स्तर पर प्रकाशन उद्योग के लिए अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है. BW हिंदी से बातचीत में अदिति ने पब्लिशिंग इंडस्ट्री की परेशानी, सरकार से अपेक्षा और कमजोर होते लाइब्रेरी सिस्टम पर खुलकर अपने विचार रखे. 

आज किताबों के कई विकल्प मौजूद
ऐसे समय में जब लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं, तो पब्लिशिंग हाउस चलाना कितना ज्यादा मुश्किल है? इस पर वाणी प्रकाशन की सीईओ अदिति माहेश्वरी (Vani Prakashan CEO Aditi Maheshwari) ने कहा कि ऐसा नहीं है कि युवा पीढ़ी किताबों से दूर हुई है, बल्कि उनके पास आज किताबों के विकल्प काफी हो गए हैं. उदाहरण के तौर पर सोशल मीडिया, इंटरनेट पर OTT कंटेंट आदि. ऑडियो-विजुएल आज किताबों के विकल्प के रूप में उपलब्ध है. मेरा मानना है कि युवा जिस रूप में किताबों को कंज्यूम कर रहे हैं, हमें उसी रूप में उन तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए. लिहाजा पब्लिशिंग हाउसेस को किताबों के बारे में नए रूप से सोचने की जरूरत है. क्योंकि केवल छपी हुई पुस्तक ही पुस्तक नहीं होती. जहां तक डिजिटल युग के प्रिंटेड किताबों के बिजनेस को प्रभावित करने का सवाल है, तो मेरी सोच थोड़ी अलग है. मुझे लगता है कि डिजिटल युग में प्रिंटेड किताबों को बूस्ट मिला है. आज किताबें ज्यादा पाठकों तक पहुंच रही हैं. 

आजकल ऐसी किताबें ज्यादा पसंद
पहले की तुलना में अब लेखकों की लेखनी में किस तरह का बदलाव आया है? इस सवाल के जवाब में अदिति माहेश्वरी कहती हैं, 'हर युग में हर प्रकार की पुस्तकें लिखी जाती रही हैं. पहले भी पॉपुलर साहित्य लिखा जा रहा था और अब भी लिखा जा रहा है. हालांकि, आजकल शोध आधारित यानी रिसर्च बेस्ड किताबों का बहुत बोलबाला है. पाठक ऐसी पुस्तकों को ज्यादा पसंद करते हैं'. अदिति ऐसे समय में प्रकाशन की दुनिया का हिस्सा बनीं, जब इस फील्ड में महिलाओं की भूमिका बेहद सीमित थी, ऐसे में जाहिर है उन्हें तमाम तरह की परेशानियों से भी दो-चार होना पड़ा होगा. इस बारे में वह कहती हैं, 'आज भी इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी सीमित ही है. जब आप अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं, तो आपको इन्फ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर कई तरह की चुनौतियों-परेशानियों का सामना करना पड़ता है'.

महिला होने की परेशानी
उदाहरण के तौर पर 2016 की एक घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा - विश्व पुस्तक मेले से एक रात पहले मैं और मेरी छोटी बहन प्रगति मैदान में अपनी स्टॉल की तैयारियों के लिए मौजूद थे. रात के करीब 2 बजे जब मैं वॉशरूम गई, तो देखा कि जेंट्स वॉशरूम खुले थे, लेकिन लेडिज वॉशरूम बंद कर दिए गए थे. इस पूरी घटना के बारे में मैंने सोशल मीडिया पोस्ट लिखा और नेशनल बुक ट्रस्ट के डायरेक्टर के पास व्यक्तिगत रूप से शिकायत दर्ज कराई. इसका असर ये हुआ कि अब पुस्तक मेले से पहले स्टॉल फेब्रिकेशन के लिए रातभर लेडिज वॉशरूम खुले रहते हैं और महिलाओं की सुरक्षा के लिए गार्ड भी मौजूद रहते हैं. यह देखकर अच्छा लगता है कि किसी ने तो आख़िरकार माना कि यहां भी औरतें हैं और काम कर रही हैं. 

लाइब्रेरी कल्चर पर कही ये बात
देश में लाइब्रेरी कल्चर खत्म होता जा रहा है, ये देश के लिए कितना बड़ा नुकसान है? इस पर अदिति माहेश्वरी ने कहा कि राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी, केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से जगह-जगह लाइब्रेरी खोली गई हैं, लेकिन समस्या ये है कि पिछले कुछ वर्षों में हमारे पुस्तकालयों की कार्यप्रणाली में बदलाव आया है. वो पहले जिस तरह से कार्य करते हैं, अब नहीं कर पा रहे हैं. पहले वो खूब किताबें खरीदते थे और उसे देश के अंतिम नागरिक तक पहुंचाते थे, जो अब कम हुआ है. इसके क्या कारण हैं, ये अभी स्पष्ट नहीं हैं. लेकिन हम सरकार से मांग करते हैं कि पुस्तकालयों को फिर से केंद्र में लाएं, जिस संस्कृति का संचार पुस्तकालयों से होता आया है उसे फिर से जीवित करें. 

GST पर फिर से विचार करे सरकार
पब्लिशिंग इंडस्ट्री की सरकार से अपेक्षा के बारे में बात करते हुए वाणी प्रकाशन की सीईओ कहती हैं कि प्रकाशन उद्योग के लिए GST को लेकर जो नीतियां बनी हैं, उन पर फिर से विचार किया जाना चाहिए. मौजूदा व्यवस्था के तहत किताबों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले धागे जैसे कच्चे माल पर GST लगता है, लेकिन पुस्तकों के GST फ्री होने की वजह से हम कच्चे माल पर बढ़ी लागत की भरपाई किसी भी रूप में नहीं कर पा रहे हैं. इसके अलावा, किताबों के डिस्ट्रीब्यूशन के इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि पाठकों तक सस्ते दामों में किताबें पहुंचाई जा सकें. अदिति का यह भी मानना है कि देश में नेशनल बुक पॉलिसी का होना भी बेहद जरूरी है. वह कहती हैं, हमारी इतनी सारी भाषाएं हैं और उन भाषाओं में सदियों से इतना समृद्ध साहित्य छप रहा है, उसे व्यवस्थित करके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने के लिए एक राष्ट्रीय पुस्तक नीति का होना अति आवश्यक है. 

अगली पीढ़ी को इस फील्ड में लाना चाहेंगी?
क्या आप चाहेंगी कि आपकी अगली पीढ़ी भी इस विरासत को आगे बढ़ाए? इस पर अदिति ने कहा - जरूर, इससे सुंदर और नोबल प्रोफेशन कोई नहीं हो सकता. लेकिन ये जरूर है कि मौजूदा समय में जिस तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर या सपोर्ट प्रकाशन इंडस्ट्री को मिल रहा है, उसके चलते यहां काम करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है. केवल पाठकों का प्रेम और लेखकों का समर्थन, सच कहूं तो केवल यही दो औषधियां हैं जो इस दौर में किसी प्रकाशक को प्रोत्साहन देती हैं, इसके अलावा हर चीज निराशावन है. ऐसे में भारतीय भाषाओं का प्रकाशक होना और भी ज्यादा कठिन काम हो जाता है. लिहाजा, सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा, तभी युवाओं का रुझान इस फील्ड पर केंद्रित होगा.


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