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स्केल तभी मायने रखता है जब उसका समझदारी से इस्तेमाल किया जाए: टोनी हर्राडीन
टोनी हर्राडीन के अनुसार भारत जैसे तेजी से उभरते बाजार में, जहां नवाचार और स्केल दोनों मौजूद हैं, कंपनियों के लिए अपार संभावनाएं हैं.
डॉ. अनुराग बत्रा 1 month ago
ओम्नीकॉम मीडिया (Omnicom Media) एशिया पैसिफिक के सीईओ टोनी हर्राडीन ने इंटीग्रेशन, क्लाइंट ट्रस्ट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टैलेंट इकोनॉमिक्स और वैश्विक नेटवर्क में भारत की बढ़ती भूमिका जैसे अहम विषयों पर बीडब्ल्यू बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा से खास बातचीत की. इस विस्तृत चर्चा में उन्होंने इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों, चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों पर अपनी स्पष्ट राय रखी, प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
ओम्नीकॉम, आईपीजी मर्जर को 90 दिन से अधिक हो चुके हैं, क्या उम्मीद से बेहतर रहा और इसने एक लीडर के रूप में आपको क्या सिखाया?
कम समय में बहुत कुछ हुआ है. हाल के समय में यह हमारे उद्योग में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव माना जा सकता है, इसलिए इसमें जटिलता होना स्वाभाविक था. जो बात सकारात्मक रूप से सामने आई है, वह है सहयोग का स्तर, जो लगभग तुरंत देखने को मिला. मर्जर के कुछ ही दिनों के भीतर अलग-अलग बाजारों की टीमें भविष्य के ऑपरेटिंग मॉडल को परिभाषित करने के लिए साथ काम करने लगी थीं.
लीडरशिप के दृष्टिकोण से यह एक मूल सत्य को दोहराता है, आप उतने ही अच्छे हैं जितनी आपकी टीम. इंटीग्रेशन के पैमाने और गति के लिए नेतृत्व स्तर पर गहरा भरोसा और क्रियान्वयन में स्पष्टता जरूरी होती है. उतना ही महत्वपूर्ण है संवाद. इस स्तर के मर्जर में स्वाभाविक रूप से अंदर और बाहर दोनों जगह चिंता होती है. साथ ही काफी अटकलें भी होती हैं, जिनमें से सभी वास्तविकता पर आधारित नहीं होतीं. ऐसे में भूमिकाओं, दिशा और उद्देश्य पर स्पष्टता देना जरूरी हो जाता है, ताकि टीमें अपने काम पर केंद्रित रहें.
संस्कृति अगला चरण है. इसमें समय लगता है, लेकिन शुरुआती संकेत, साझा सीख, खुलापन और टीमों के बीच सहयोग उत्साहजनक हैं.
क्लाइंट्स ने इस मर्जर पर कैसी प्रतिक्रिया दी है और अब आप उन्हें क्या ठोस मूल्य दे रहे हैं?
सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम क्लाइंट्स को यह भरोसा दिलाना था कि काम सामान्य रूप से जारी रहेगा. यही कारण है कि हमारी एजेंसी ब्रांड्स, जिनमें ओएमडी, पीएचडी, हार्ट्स एंड साइंस, इनिशिएटिव, यूएम और मीडिया हब शामिल हैं, फ्रंट-एंड इंटरफेस के रूप में काम कर रही हैं. वहीं असली बदलाव पर्दे के पीछे हो रहा है. हम जुड़े हुए क्षमता इकोसिस्टम बना रहे हैं, जिसमें रणनीति, कॉमर्स, डेटा, इन्फ्लुएंसर और मापन को अधिक एकीकृत तरीके से जोड़ा जा रहा है. उद्देश्य केवल दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि एक अधिक मजबूत और लचीला सिस्टम बनाना है, जिसे एजेंसियां क्लाइंट्स के लिए संचालित कर सकें.
क्लाइंट्स के नजरिए से मूल्य दो स्तरों पर है. पहला, बड़े और विविध टैलेंट पूल तक पहुंच. दूसरा, टेक्नोलॉजी क्षमताओं का एकीकरण, खासकर ओम्नी का विकास एक व्यापक, एंड-टू-एंड मार्केटिंग ऑर्केस्ट्रेशन प्लेटफॉर्म के रूप में, जिसे एक्जियम जैसे मजबूत डेटा एसेट्स का समर्थन प्राप्त है. हालांकि सबसे महत्वपूर्ण पहलू है स्पष्टता. क्लाइंट्स स्वाभाविक रूप से पूछते हैं - इसका मेरे लिए क्या मतलब है? हमारा ध्यान इस संरचनात्मक बदलाव को स्पष्ट और परिणाम-आधारित मूल्य में बदलने पर रहा है.
भारत जैसे प्रतिस्पर्धी बाजार में आपकी पेशकश को क्या अलग बनाता है?
उद्योग अक्सर समान शब्दों में बात करता है- टेक्नोलॉजी, डेटा, स्केल. अंतर इनके उपयोग में होता है. केवल स्केल अपने आप में कोई लाभ नहीं है, जब तक उसका समझदारी से इस्तेमाल न किया जाए. हमारे लिए अंतर यह है कि हम डेटा, टेक्नोलॉजी और टैलेंट को एक समेकित सिस्टम में कैसे जोड़ते हैं और हमारी टीमें विभिन्न क्षेत्रों में मिलकर कितनी प्रभावी ढंग से काम करती हैं. ओम्नीकॉम और आईपीजी दोनों की संस्कृति सहयोग पर आधारित रही है. इन्हें साथ लाकर हम अधिक एकीकृत और चुस्त सिस्टम बना सकते हैं.
कई बाजारों में हमने चैलेंजर माइंडसेट के साथ काम किया है. अब इस सोच को स्केल के साथ जोड़कर हम प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल कर सकते हैं, बशर्ते इसका उपयोग सटीकता के साथ किया जाए.
क्या क्लाइंट्स फिर से इंटीग्रेटेड मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं और आप कैसे अनुकूलन कर रहे हैं?
उद्योग हमेशा चक्रीय रहा है, कभी इंटीग्रेटेड, फिर स्पेशलाइज्ड और फिर दोबारा इंटीग्रेटेड. फिलहाल हम देख रहे हैं कि कुछ बड़े क्लाइंट्स अधिक समेकित, एंटरप्राइज-लेवल पार्टनरशिप की ओर बढ़ रहे हैं. वहीं कई क्लाइंट्स अब भी मल्टी-एजेंसी मॉडल को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहती है. दोनों मॉडल आगे भी जारी रहेंगे. यही बात इन-हाउसिंग पर भी लागू होती है, जहां कुछ कार्य अंदर आते हैं और कुछ बाहर जाते हैं.
हमारी जिम्मेदारी है कि हम खुद को इस तरह संरचित करें कि दोनों मॉडलों को सहज रूप से सपोर्ट कर सकें. चाहे क्लाइंट एक ही पार्टनर चाहता हो या अलग-अलग विशेषज्ञ क्षमताएं, हमें दोनों ही स्थितियों में मजबूत डिलीवरी देनी चाहिए.
आउटकम-आधारित रेम्यूनरेशन को लेकर चर्चा बढ़ रही है. क्या उद्योग इसके लिए तैयार है?
हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं, लेकिन यह बदलाव धीरे-धीरे होगा. एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग के साथ पारंपरिक भुगतान मॉडल, जो हेडकाउंट या कमीशन पर आधारित हैं, बदलेंगे. सिद्धांत रूप में आउटकम-आधारित मॉडल सही लगते हैं, लेकिन इन्हें लागू करना जटिल है. व्यापारिक परिणाम कई बाहरी कारकों से प्रभावित होते हैं, जिन पर एजेंसी का नियंत्रण नहीं होता.
ऐसे मॉडल के सफल होने के लिए गहरा भरोसा और साझेदारी जरूरी है. क्लाइंट्स को एजेंसी की विशेषज्ञता पर अधिक भरोसा करना होगा और एजेंसियों को अपनी क्षमता, डेटा और अनुभव से उस भरोसे को साबित करना होगा.
फीस पर दबाव के बीच क्या एजेंसियां टॉप टैलेंट को आकर्षित और बनाए रख सकती हैं?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम मूल्य को कैसे परिभाषित करते हैं. कुछ पारंपरिक सेवाएं अब सामान्य हो चुकी हैं और इसमें बदलाव की संभावना कम है. लेकिन उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं हैं, जैसे कंसल्टेटिव थिंकिंग, एडवांस एनालिटिक्स, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और विशेष क्षमताएं.
हमें अपने ऑपरेटिंग मॉडल पर भी पुनर्विचार करना होगा. ऑटोमेशन दोहराए जाने वाले कार्यों को संभाल सकता है, जिससे हम रणनीतिक और रचनात्मक टैलेंट में अधिक निवेश कर सकें. समय के साथ यह बदलाव अधिक टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल बनाने में मदद करेगा.
कंसल्टिंग फर्म्स से प्रतिस्पर्धा को आप कैसे देखते हैं?
कुछ हद तक समानता है, लेकिन मुख्य अंतर क्रियान्वयन में है. कंसल्टेंट्स अक्सर रणनीतिक स्तर पर काम करते हैं. हमारी ताकत रणनीति को क्रियान्वयन से जोड़ने में है -- विचारों को बाजार में ले जाना, उनका परीक्षण करना, उनसे सीखना और लगातार सुधार करना. यह फीडबैक लूप ही एजेंसियों की प्रमुख ताकत है.
भारत की तुलना अन्य एपीएसी बाजारों से कैसे करते हैं?
भारत इस क्षेत्र के सबसे गतिशील और रोमांचक बाजारों में से एक है. इसकी खासियत है स्केल और नवाचार का संयोजन. यहां केवल वैश्विक ट्रेंड्स को अपनाया नहीं जाता, बल्कि उन्हें आकार भी दिया जाता है. डिजिटल इकोसिस्टम बेहद विविध है और क्विक कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नवाचार हो रहा है. यह उद्यमशीलता से भरपूर है और वैश्विक महत्व भी रखता है.
अगले 12 महीनों में भारत में ओम्नीकॉम मीडिया से क्या उम्मीद की जा सकती है?
निकट भविष्य में हमारे ऑपरेटिंग मॉडल को लेकर अधिक स्पष्टता सामने आएगी. इसके साथ ही टेक्नोलॉजी में निवेश जारी रहेगा, खासकर ओम्नी के विकास और भारत जैसे बाजारों के लिए उसके लोकलाइजेशन पर. जहां जरूरत होगी, वहां क्षमताओं को और मजबूत किया जाएगा. इंटीग्रेशन केवल मौजूदा ताकतों को जोड़ना नहीं है, बल्कि कमियों की पहचान कर उन्हें दूर करना भी है.
अंत में, आप किस तरह की संस्कृति बनाना चाहते हैं?
उद्यमशील, सहयोगी और जिज्ञासु. हम अपने स्केल के बावजूद चुस्त बने रहना चाहते हैं. जिज्ञासा नवाचार को बढ़ावा देती है और सहयोग विचारों को प्रभाव में बदलता है. अगर हम ऐसा वातावरण बना सकें जहां टैलेंट खुद को सशक्त महसूस करे, सीख सके, आगे बढ़ सके और प्रयोग कर सके, तो यही हमारी सफलता को परिभाषित करेगा.
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