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सर्कुलर इकॉनमी केवल विचार नहीं, राष्ट्रीय औद्योगिक रणनीति : मसूद मलिक

रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री ने पिछले तीन वर्षों में तेजी से विकास किया है, मटेरियल की संख्या 4 से 20 तक बढ़ी है, और बड़ी विनिर्माण कंपनियाँ सर्कुलैरिटी को मुख्यधारा में शामिल कर रही हैं.

रितु राणा 11 months ago

भारत तेजी से विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है, लेकिन इस प्रगति के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर होती जा रही हैं. बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के बीच waste-to-worth यानी “कचरे से संसाधन” बनाने की तकनीकें, टिकाऊ भविष्य की कुंजी बनकर उभरी हैं. इस दिशा में Re Sustainability Limited अग्रणी भूमिका निभा रही है. Re Sustainability ने देशभर में 22 से अधिक शहरों में संचालित परियोजनाओं और उन्नत रीसायकलिंग तकनीकों के माध्यम से उन्होंने वेस्ट मैनेजमेंट को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी सार्थक बनाया है. इसी विषय पर सीआईआई नेशनल कमेटी ऑन वेस्ट-टू-वर्थ टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन और Re Sustainability Limited के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं ग्रुप सीईओ मसूद मलिक से BW हिन्दी की वरिष्ठ संवाददााता रितु राणा ने विस्तार से चर्चा की, जिसमें उन्होंने बताया कि भारत को सर्कुलर इकॉनमी को केवल विचार के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय औद्योगिक रणनीति के रूप में अपनाना चाहिए. तो प्रस्तुत हैं आपके सामने इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :

प्रश्न: 'कचरे से संसाधन' की अवधारणा को भारत में लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती आप किसे मानते हैं ?
उत्तर : देखिए, हमारे देश के पास बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं. हमारे पास दुनिया की लगभग 18% जनसंख्या है, लेकिन भूमि क्षेत्र का हिस्सा 2.5% से भी कम है. अब ऐसे में क्या हमारे पास कचरे के पहाड़ बनाने की जगह है? बिल्कुल नहीं. इसीलिए केवल पर्यावरण के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रणनीतिक प्रगति और आत्मनिर्भरता के लिए waste-to-worth तकनीकों को मुख्यधारा में लाना बहुत जरूरी है. हमें सिर्फ इस पर बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि इसे एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित करना चाहिए.

अगर हम इस समस्या के समाधान की बात करें, तो तीन बातें बहुत अहम हैं. पहली बात यह कि जब हम कोई भी उत्पाद खरीदते हैं, तो हमें यह जानना चाहिए कि उसका उपयोग या जीवनकाल कैसे अधिकतम किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, क्या आपको अपना पहला मोबाइल फोन याद है? अधिकांश लोगों का जवाब होगा, हाँ, और वह कई साल चला था. लेकिन आजकल चीजों की उम्र घटती जा रही है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारा उपभोग करने का तरीका बदल गया है. हमें इस आदत को बदलना होगा. किसी भी उत्पाद का life extension यानी जीवन बढ़ाना बहुत जरूरी है. अगर आप किसी वस्तु को रिपेयर कर सकते हैं, उसकी उपयोगिता बढ़ा सकते हैं, तो वह भी waste-to-worth है. यह केवल कचरा पैदा करने की बात नहीं है, बल्कि खुद को कचरा उत्पन्न करने से बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

प्रश्न: Re Sustainability इस समस्या को कैसे सुलझा रही है?

उत्तर : हमारा प्रयास है कि जिसे लोग ‘कचरा’ कहते हैं, उसमें भी मूल्य खोजा जाए. हम निर्माण कचरे से देशभर में नोएडा, कोलकाता, नागपुर, हैदराबाद नए निर्माण उत्पाद बना रहे हैं. हम विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे से FMCG पैकेजिंग तैयार कर रहे हैं. जो प्लास्टिक रीसायकल नहीं हो सकती, उससे ईंधन बना रहे हैं ताकि वह कोयले की जगह इस्तेमाल हो सके. जहां ईंधन भी नहीं भेजा जा सकता, वहां हम अपनी बिजली बनाने के प्लांट लगा रहे हैं. इसके अलावा, देश में पहली बार हमने कचरे से सोना, चांदी, प्लेटिनम और पैलेडियम जैसी कीमती धातुएं सफलतापूर्वक निकाली हैं. ये सभी तकनीकें अब औद्योगिक पैमाने पर लागू की जा रही हैं.

प्रश्न : कचरा प्रबंधन में घरों की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर : यह बहुत महत्वपूर्ण बाता है, दरअसल हमें यह समझना होगा कि यदि हम घर पर ही गीले और सूखे कचरे को मिला देते हैं, तो बाद में उसे अलग करना बहुत मुश्किल और महंगा हो जाता है. भारत में आज प्लास्टिक का केवल 15% ही रीसायकल होता है, बाकी 85% लैंडफिल में चला जाता है. इसके बाद हम नया तेल खरीदकर नई प्लास्टिक बनाते हैं और फिर वही प्लास्टिक वापस लैंडफिल में डालते हैं. इसलिए पहला सिद्धांत, हर संसाधन का अधिकतम उपयोग करें. दूसरा, कचरे को मिलाने से बचें ताकि रीसायकल आसान हो सके. तीसरा, उपभोक्ता को रीसायकल किए गए उत्पाद खरीदने की आदत डालनी चाहिए. जब उपभोक्ता रीसायकल उत्पादों की मांग करेगा, तब waste-to-worth केवल अवधारणा नहीं, बल्कि वास्तविकता बन जाएगा.

प्रश्न : सर्कुलर इकॉनमी (Circular Economy) को आप कैसे परिभाषित करते हैं?
उत्तर : हमारा पूरा काम ही सर्कुलर इकॉनमी पर आधारित है. जब भी हमें कोई कचरा मिलता है, चाहे वह औद्योगिक, नगरपालिका या मेडिकल कचरा हो, तो सबसे पहले हम उसे संसाधन के रूप में उपयोग करने की कोशिश करते हैं. अगर उपयोग नहीं कर सकते, तो रीसायकल करते हैं. रीसायकल नहीं कर सकते, तो उससे ईंधन बनाते हैं. और अगर ईंधन नहीं बना सकते, तो उससे बिजली उत्पन्न करते हैं. यह पूरी श्रृंखला ही असली सर्कुलैरिटी है. बाकी सर्कुलैरिटी केवल सिद्धांत में रहती है, पर यह सर्कुलैरिटी एक्शन में है. हम इसे “360 डिग्री सर्कुलैरिटी” कहते हैं.

प्रश्न : भारत में Critical Minerals की आवश्यकता को लेकर आपकी क्या पहलें हैं?
उत्तर : भारत में लिथियम, मैग्नेट और अन्य critical minerals की भारी जरूरत है. हम इस दिशा में विशेष ध्यान दे रहे हैं ताकि देश की सामरिक और संसाधन सुरक्षा को मजबूती मिल सके. हमने हैदराबाद में एक विशेष integrated refinery स्थापित की है, जहां औद्योगिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से इन खनिजों को निकाला जाता है. भारत में इन खनिजों की खदानें नहीं हैं, इसलिए हम इसे Urban Mining कहते हैं, यानी शहरों के कचरे और लैंडफिल से संसाधन निकालना. यह देश की पहली एकीकृत रिफाइनरी है, जिसकी सालाना क्षमता लगभग 20,000 टन है. वर्तमान में यह संयंत्र अपने तीसरे वर्ष में है और हम सालाना लगभग 1 करोड़ टन से अधिक कचरे का प्रसंस्करण करते हैं.

प्रश्न : पिछले कुछ वर्षों में रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री में आपने क्या परिवर्तन देखे हैं. इस संदर्भ में रीसाइक्लिंग प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता और रणनीतिक महत्व को आप कैसे देखते हैं?

हमने सीआईआई के साथ मिलकर नेशनल सर्कुलर इकॉनमी फ्रेमवर्क (NCEF–3) का तीसरा संस्करण लॉन्च किया है. यह फ्रेमवर्क भारत को संसाधन-कुशल और सतत सर्कुलर इकॉनमी की ओर ले जाने के प्रयासों को तेज करेगा. इसमें पहले साल 4 सामग्रियां थी और अब हमने 20 प्राथमिक सामग्रियों को शामिल किया गया है. पहले संस्करण (2023) में चार प्रमुख सामग्रियों प्लास्टिक, निर्माण सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और मिश्रित नगर निगम अपशिष्ट पर ध्यान केंद्रित किया गया था. दूसरे संस्करण (2024) में यह संख्या बढ़कर 16 हुई, जिसमें वस्त्र, एंड-ऑफ-लाइफ वाहन, बैटरी, खतरनाक कचरा, टायर और स्क्रैप मेटल शामिल थे. अब NCEF संस्करण 3 में कुल 20 सामग्री शामिल की गई हैं, जैसे कि यूज़्ड कुकिंग ऑयल, कैटालिटिक कन्वर्टर्स, पेपर और कार्डबोर्ड, तथा एब्जॉर्बेंट हाइजीन प्रोडक्ट्स, यह विस्तार भारत की बदलती उपभोग प्रवृत्तियों, नई नीतिगत पहलों और तकनीकी प्रगति का प्रतिबिंब है.

पिछले तीन वर्षों में 4 से 20 मटेरियल तक का विस्तार हमारे लिए एक विशाल यात्रा रही है. इससे नई इंडस्ट्रीज, तकनीकी अंतराल और नीतिगत बाधाओं को समझने का अवसर मिला. आज बड़ी विनिर्माण कंपनियाँ स्वयं रीसायक्लिंग में शामिल हो रही हैं। यह मुख्यधारा में सर्कुलैरिटी को अपनाने का संकेत है. रीसाइक्लिंग प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता मटेरियल और लोकेशन पर निर्भर करती है. उदाहरण के लिए, कंस्ट्रक्शन मलबा और इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट दोनों की अर्थव्यवस्था अलग होती है. फीडस्टॉक की निकटता और उसके मूल्य का प्रभाव परियोजना की सफलता पर बड़ा है. सरकार द्वारा सब्सिडी और नए प्रोत्साहन योजनाओं के कारण अब पूंजीगत लागत को कम करना संभव हो गया है. आज रीसाइक्लिंग सिर्फ अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की संसाधन सुरक्षा और रणनीतिक हितों से भी जुड़ा हुआ है. बाजार आधारित उपकरण जैसे EPR (Extended Producer Responsibility) के माध्यम से ऑपरेशनल खर्च को कम करना और अतिरिक्त राजस्व अर्जित करना संभव हो गया है.

प्रश्न : अंत में, आप इस क्षेत्र के भविष्य को कैसे देखते हैं?
उत्तर : मेरा मानना है कि आने वाले वर्षों में waste-to-worth तकनीकें भारत की सतत अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनेंगी. जब तक हम संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग नहीं करेंगे और कचरे को संपत्ति के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक सच्ची प्रगति संभव नहीं है. भारत जैसे देश के लिए यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है. इसलिए waste-to-worth केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है. 

 


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