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मंदी क्या होती है, कैसे पता करें कि मंदी आ गई है या आने वाली है?

वैश्विक मंदी को लेकर परिभाषा अबतक तय नहीं है. वैश्विक मंदी को लेकर वर्ल्ड बैंक का मुख्य इंडिकेटर यही है कि एक ही समय में कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक साथ सिकुड़ रही हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

नई दिल्ली: दुनिया में कहीं जंग चल रही है, तो कहीं महामारी, और महंगाई ने तो दुनिया की सभी बड़ी छोटी अर्थव्यवस्थाओं को अपनी चपेट में ले लिया, जिसे रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की तैयारी है, ब्याज दरें बढ़ीं तो खपत और उत्पादन कम होगा जिससे ग्रोथ के पहिए भी थम जाएंगे, तो क्या ये सभी संकेत आने वाली मंदी की ओर इशारा कर रहे हैं. 

क्या है मंदी की परिभाषा? 

अर्थशास्त्री मंदी को लेकर अलग अलग राय रखते हैं, लेकिन वर्ल्ड बैंक के प्रेसिडेंट डेविड मैल्पास का कहना है कि कई देशों के लिए मंदी को रोकना बेहद मुश्किल है. उनका इशारा किस ओर है ये साफ है. साल 2008 में हमने मंदी का दौर देखा था, इसके लिए 1929 में भी ग्रेट रिसेशन आया था. इकोनॉमी में सुस्ती आना और मंदी में बहुत बड़ा फर्क है. मंदी आ गई है या आने वाली है, किस परिस्थिति को हम मंदी की श्रेणी में रखेंगे इसे लेकर आधिकारिक या वैश्विक तौर पर कोई तय परिभाषा नहीं है. 1974 में अमेरिका के अर्थशास्त्री जूलियस सिस्किन ने मंदी को लेकर एक विवरण दिया था, उन्होंने कहा कि ग्रोथ में लगातार दो तिमाहियों तक गिरावट आए तो इसे मंदी माना जा सकता है. मंदी को तय करने के लिए कई देश इसी परिभाषा का ही अनुसरण करते हैं. हालांकि अमेरिका ने इस परिभाषा को थोड़ा और खुलापन दिया. नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च  (NBER) अमेरिका में मंदी को तय करने के लिए कई दूसरे फैक्टर्स को भी देखता है. NBER के मुताबिक मंदी "अर्थव्यवस्था में फैली आर्थिक गतिविधि में एक महत्वपूर्ण गिरावट के रूप में परिभाषित करती है, जो कुछ महीनों से ज्यादा समय तक चलती है. जो आमतौर पर उत्पादन, रोजगार, आय और दूसरे इंडिकेटर्स में दिखाई देती है. मंदी तब शुरू होती है जब अर्थव्यवस्था गतिविधियों के चरम पर पहुंच जाती है और जब अर्थव्यवस्था अपने गर्त में पहुंच जाती है तो ये खत्म हो जाती है.”

वैश्विक मंदी की परिभाषा 
जैसे राष्ट्रीय मंदी को तय करने के लिए कोई परिभाषा नहीं उसी तरह वैश्विक मंदी को लेकर भी परिभाषा अबतक तय नहीं है. वैश्विक मंदी को लेकर वर्ल्ड बैंक का मुख्य इंडिकेटर यही है कि एक ही समय में कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक साथ सिकुड़ रही हैं. ग्लोबल इकोनॉमी ने बीते 7 दशकों में 4 बड़ी मंदी देखी है, 1975, 1982, 1991 और 2009. IMF के मुताबिक एडवांस इकोनॉमी में मंदी ज्यादा से ज्यादा एक साल तक ही चलती है. NBER के आंकड़े भी इसे सपोर्ट करते हैं, 1945 से लेकर 2009 तक मंदी का औसत समय 11 महीने रहा है. 

मंदी के संकेत 
आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि अगर जीडीपी ग्रोथ में काफी लंबे समय से गिरावट चल रही है, तो इसे मंदी का संकेत समझ लिया जाता है, लेकिन इसके अलावा मंदी का एक और बड़ा संकेत होता है बेरोजगारी. जब ये बढ़ना शुरू होता है तो इसका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव दिखता है, उत्पादों और सेवाओं की मांग घट जाती है. पिछली वैश्विक मंदी के दौरान अमेरिका में बेरोजगारी दर 9.5 परसेंट रही थी. फिलहाल बेरोजगारी अभी कोई फैक्टर नहीं है, क्योंकि ज्यादातर अर्थव्यवस्थाओं में रोजगार के आंकड़े काफी बेहतर हैं. लेकिन कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स काफी नीचे है, जो कि दूसरा बड़ा इंडिकेटर है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि जीवन जीने की लागत बढ़ी है और लोग कम खर्च कर रहे हैं. जिससे इकोनॉमी में स्लोडाउन आता है और टैक्स से कमाई भी घटती है. मंदी के दौरान शेयर बाजारों पर भी असर पड़ता है. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस और खर्चों में कमी आती है, कंपनियां छंटनी करती है जिससे शेयर बाजार में निवेश घटता है और घबराहट फैलती है. Goldman Sachs के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध के बाद 12 मंदिंयों में S&P 500 में 24 परसेंट की गिरावट देखने को मिली. 

कैसे खत्म होती है मंदी 
मंदी को खत्म करने के लिए देश के केंद्रीय बैंकों के सामने चुनौती होती है कि वो कंज्यूमर कॉन्फिडेंस बढ़ाने का हर संभव प्रयास करे, ये कोशिश करे कि लोग खरीदारी करें और खर्च करें. इसके लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करते हैं. जिससे कर्ज सस्ते होते हैं, लोग कर्ज लेकर घर, कार और दूसरे सामान खरीदते हैं. इससे इकोनॉमी को बूस्ट मिलता है. सरकारें भी रोजगार बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं पर खर्च करती है. 
एक बात तो तय है कि ग्रोथ और मंदी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जब ग्रोथ लौटती है तो मंदी अपने आप ही चली जाती है, भले ही उसमें कितना वक्त लगे. जैसा कि 2008 की मंदी में हुआ था. अर्थव्यवस्थाओं ने अरबों डॉलर बाजार में झोंक दिए, राहत पैकेजों का ऐलान किया ताकि इकोनॉमी में ग्रोथ लौट सके. 
 
(स्रोत: World Economic Forum)
 

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