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USA ने भारत को अपनी मुद्रा निगरानी सूची से क्यों हटाया, जानिए क्या हैं इसके मायने?

अमेरिकी राजकोष विभाग ने प्रमुख अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों की नीतियों की समीक्षा की और उनका मूल्यांकन भी किया.

उर्वी श्रीवास्तव 3 years ago

नई दिल्ली: भारतीय रुपया पिछले कुछ महीनों से लगातार गिर रहा है, जिसका भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा है. USA को भी इस स्थिति के बारे में अच्छी तरह पता है और जो उसके लिए फायदेमंद है, वो वही कर रहा है.

अमेरिका ने क्यों बनाई है 'करेंसी मॉनिटरिंग लिस्ट'
जब भी रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव होता है तो इसका असर आयात और निर्यात पर पड़ता है. हम कमजोर रुपये के साथ और अधिक निर्यात कर सकते हैं, जो अमरीका के लिए बिल्कुल भी अच्छी खबर नहीं है. अमेरिका यह नहीं चाहता कि भारत भी अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करे. इसी भावना के चलते उन्होंने एक 'करेंसी मॉनिटरिंग लिस्ट' निकाली है, जिसे करेंसी मैनिपुलेटर भी कहा जाता है. कोई भी देश जो इस सूची में जगह बनाता है, उसे 'करेंसी मैनिपुलेटर' का संदिग्ध माना जाता है. अमेरिका ऐसा मानता है कि इस लिस्ट में शामिल देश आमतौर पर अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करते हैं, इसलिए उसपर निगरानी रखता है. हालांकि, अमेरिकी वित्त विभाग ने दो साल बाद भारत को अपनी 'करेंसी मॉनिटरिंग लिस्ट' से हटा दिया है. उसने भारत के साथ-साथ मैक्सिको, वियतनाम, इटली और थाईलैंड को भी लिस्ट से हटाया है, जबकि जापान, चीन, कोरिया, जर्मनी, मलेशिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देश अभी भी इस सूची में शामिल हैं.

इस लिस्ट में कम से कम कितने साल तक कोई देश रह सकता है?
अमेरिकी राजकोष विभाग ने प्रमुख अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों की नीतियों की समीक्षा की और उनका मूल्यांकन भी किया, जिसमें माल और सेवाओं में लगभग 80 प्रतिशत अमेरिकी विदेशी व्यापार शामिल है. एक बार जब कोई देश सूची में शामिल हो जाता है, तो वह लगातार दो रिपोर्ट टर्म्स तक उसमें बना रहता है. हर 6 महीने में एक रिपोर्ट आती है, इसका मतलब ये हुआ कि कोई देश कम से कम 1 साल तक इस सूची में रहता ही है. भारत को इस सूची में पहली बार दिसंबर 2018 में और दूसरी बार दिसंबर 2020 में जोड़ा गया था.

इस लिस्ट में शामिल देशों के बारे में अमेरिका का मानना है कि वे निर्यात बढ़ाने के लिए US डॉलर के विरुद्ध अपनी करेंसी का अवमूल्यन करते हैं, जिसे रिपोर्ट में 'currency manipulation' कहा गया है. ऐसा करने पर मेजबान देश से निर्यात की लागत कम हो जाती है और परिणामस्वरूप उनका व्यापार घाटा कृत्रिम रूप से कम हो जाता है. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग इस मानदंड का उपयोग यह आंकलन करने के लिए करता है कि किसी अर्थव्यवस्था में हेरफेर किया गया है या नहीं.

अमेरिका ने इस लिस्ट के लिए क्या तय किए हैं मानदंड
इस सूची में देशों को शामिल करने के लिए अमेरिका ने तीन मानदंड बनाए हैं, जिनमें से यदि कोई देश कम से कम दो मानदंड पूरा करता है तो उस इस लिस्ट में शामिल कर लिया जाता है:

1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के कम से कम तीन प्रतिशत का चालू खाता अधिशेष, जिसमें भौतिक वस्तुएं और सेवाएं शामिल हैं. भारत व्यापार के संबंध में आमतौर पर घाटे में है और यह मानदंड शायद ही कभी पूरा हुआ हो.

2. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार अधिशेष 20 बिलियन अमेरीकी डॉलर से अधिक होना चाहिए, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 102 अरब अमेरिकी डॉलर है और भारत का व्यापार घाटा 45.5 अरब अमेरिकी डॉलर है. इसलिए भारत इस क्रिटेरिया को भी पूरा नहीं करता.

3. 12 महीने में GDP के दो प्रतिशत की विदेशी मुद्रा की शुद्ध खरीद. भारत इस मानदंड को पूरा करता है, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का पांच प्रतिशत के करीब रहा है. ऐसा बड़े पूंजी प्रवाह के कारण हुआ है.

यानी, भारत इन तीन मानदंडों में से सिर्फ एक को ही पूरा कर रहा है, इसलिए अमेरिका ने इसे सूची से हटा दिया है. कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह सूची तर्क विहीन है. हालांकि, इस सूची से बाहर होने के बाद अब भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय दरों के प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है. यह भारत की वैश्विक साख के लिए भी अच्छी खबर है.

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