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Mauritius के इस द्वीप पर लगी ड्रैगन की निगाहें, भारत को हो सकता है सामरिक नुकसान

यह भारत और क्वाड के अन्य सदस्यों देशों जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूएसए के लिए बुरी खबर है.

उर्वी श्रीवास्तव 3 years ago

नई दिल्लीः चीन इस बार हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मॉरिशस के एक द्वीप डिएगो गार्सिया में निगाह गढ़ाए हुए है. चीन चाहता है कि मॉरिशस उस द्वीप को उसे दे दे ताकि वो अपने ग्लोबल फुटप्रिंट को बढ़ाने के उद्देश्य में सफल हो सके. चीन का मकसद इस द्वीप पर अपने नेवी को बढ़ाने का है. चीन इसको एक नौसैनिक अड्डे के रूप में विकसित करना है. यह भारत और क्वाड के अन्य सदस्यों देशों जैसे कि ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूएसए के लिए बुरी खबर है, इस समूह को मुख्य रूप से चीन की हिंद महासागर में बढ़ती उपस्थिति का मुकाबला करने के लिए 2007 में स्थापित किया गया था. 

क्या हो रहा है?

चीन पिछले एक दशक से अधिक समय से जानबूझकर अपनी मातृभूमि से दूर अपनी सैन्य उपस्थिति दिखाने की कोशिश कर रहा है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) हमेशा हिंद महासागर में जिबूती में पहले से मौजूद अपने नौसैनिक अड्डे के अलावा अपने अगले नौसैनिक अड्डे की तलाश में रहती है. यह अनुमान लगाया जाता है कि मॉरीशस चागोस द्वीपसमूह के उस हिस्से को सौंप कर चीनी विस्तार में मदद कर सकता है जो पूर्व के प्रभाव में है. इससे चीनी नौसैनिक अड्डे को क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचने में मदद मिलेगी. चीन के साथ अपने संबंधों को देखते हुए मॉरीशस के पास पर्याप्त वजह है. यह स्थान चीन के लिए भी सामरिक और आर्थिक महत्व रखता है, यह देखते हुए कि 80 से 90 प्रतिशत चीनी व्यापार हिंद महासागर, विशेष रूप से मलक्का जलडमरूमध्य के माध्यम से होता है. अपनी मौजूदा संपत्तियों के अलावा, चीन की निगाहें अगले नौसैनिक विस्तार पर टिकी हैं.

यह क्षेत्र क्यों महत्वपूर्ण है?

डिएगो गार्सिया को 2036 तक एक सैन्य अड्डे के रूप में ब्रिटेन द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका को पट्टे पर दिया गया था और यह चागोस द्वीपसमूह में सबसे बड़ा द्वीप है (यह देखते हुए कि पूर्व एक ब्रिटिश उपनिवेश था). क्षेत्र को अक्सर अकल्पनीय विमान वाहक के रूप में बताया जाता है और खाड़ी युद्ध और इराक आक्रमण के दौरान आधार के रूप में उपयोग किया जाता था. यह क्षेत्र न केवल भारत के लिए बल्कि अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस बीच, यूके ने मॉरीशस के साथ ब्रिटिश भारत महासागर क्षेत्र (BIOT) या चागोस द्वीपसमूह को बाद में सौंपने के संबंध में बातचीत फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है. हालांकि इस सौदे का अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद वे इलाके में चीन की मौजूदगी को लेकर आशंकित हैं.

यह मुद्दा अब यहां इसलिए बढ़ गया है क्योंकि मॉरीशस चीन को अपनी विस्तारवादी गतिविधियों को यहां करने की अनुमति दे सकता है. यह केवल डिएगो गार्सिया के लिए ही सही नहीं है, बल्कि अन्य सभी द्वीपों के साथ-साथ चागोस द्वीपसमूह में भी है. चीन ने मॉरीशस में लगभग 887 मिलियन अमेरीकी डॉलर का निवेश किया है जो उसके कुल व्यापार का 18 प्रतिशत है. ये दोनों संख्याएं भविष्य में और बढ़ेंगी, इससे दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत होंगे. इतना ही नहीं, हाल ही में चीन और मॉरीशस ने भी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पर मॉरीशस का कर्ज 180.5 बिलियन अमेरीकी डॉलर का है, यह एक ऐसी राशि है जिसे उसे चुकाना अभी बाकी है. इस बीच, भारत मॉरीशस से लगभग 1160 मिलियन अमरीकी डालर के सामान का निर्यात करता है और लगभग 71,5 मिलियन अमेरीकी डॉलर का आयात करता है. यह द्वीप राष्ट्र भारत में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है। चीन अपने प्रभाव का विस्तार करने और यह दिखाने के लिए भारी कोशिश कर रहा है. इन कारकों और निवेश की आवश्यकता को देखते हुए, आईलैंड नेशन चीन की debt trap diplomacy का शिकार हो सकता है और नौसैनिक अड्डे को लीज पर दे सकता है.

भारत को क्यों परवाह करनी चाहिए?

भारत चारों तरफ से चीन के द्वारा विभिन्न देशों के बंदरगाहों पर किए गए निवेश से घिरा हुआ है, चाहे वह श्रीलंका में हंबनटोटा और कोलंबो हो, पाकिस्तान में कराची बंदरगाह, ईरान में ग्वादर, दक्षिण पूर्व एशिया में तंजुंग बंदरगाह आदि इन सब के अलावा 15 बंदरगाह हैं जहां पर चीन का भारी भरकम निवेश है. यदि मॉरीशस अपने द्वीप को चीन को सौंप देता है, तो यह शत्रुतापूर्ण पड़ोसी से घिरे होने के भारत के संकट को और बढ़ा देगा. हम पहले से ही सीमा पर एक तेज चीन से निपट रहे हैं और यह कदम निर्णायक रूप से सत्ता को उनके पक्ष में झुका देगा.

गौर करने वाली बात यह भी है कि चीन भी इस क्षेत्र के आसपास अपने विस्तार में तेजी दिखा रहा है. हाल ही में समाप्त हुई चीन अंतर्राष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी (CIDCA) ने भी एक सार्वजनिक नोट में कहा है कि 100 से अधिक पार्टीयां हिंद महासागर क्षेत्र में आर्थिक और पर्यटन एजेंडे पर उनके साथ सहयोग करने के लिए सहमत हुए हैं। हालांकि, कई देशों ने किसी भी आधिकारिक भागीदारी को अस्वीकार कर दिया है. यह क्षेत्र में चीनी आक्रामकता को उजागर करता है. भारत इस मंच को संदेह की दृष्टि से देखता है. पहला इसलिए कि हमारे पास पहले से ही 23 सदस्यों वाला एक हिंद महासागर परिधि संघ (आईओआरए) है और दूसरा हाल की चीनी गतिविधियों के कारण.

उदाहरण के लिए एक चीनी सैन्य ट्रैकर पोत युआन वांग 5, को हाल ही में श्रीलंका के आसपास देखा गया था. हिंद महासागर में भारत की स्थिति, इसका व्यापारिक महत्व, आर्थिक, सैन्य और पर्यटन स्थल राष्ट्र के लिए सावधानी बरतना महत्वपूर्ण बनाते हैं. विशेष रूप से भारतीय व्यापार और निवेश के संबंध में इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. 

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