होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / विश्व बैंक: भारत ने रचा इतिहास
विश्व बैंक: भारत ने रचा इतिहास
भारत में गरीबी में आई भारी कमी एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस प्रगति को बनाए रखने के लिए बेहतर रोजगार और कम ध्रुवीकृत राजनीतिक व्यवस्था जरूरी है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
हरदयाल सिंह
भारत में अत्यधिक गरीबी में आई तेज गिरावट और करीब 50 करोड़ लोगों का गरीबी के एक उच्चतर स्तर से ऊपर उठना आधुनिक समय की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है. विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में यह बात दर्ज की गई है.
इसकी शुरुआत करीब 75 साल पहले हुई थी, जब देश ने अपनी पहली पंचवर्षीय योजना शुरू की थी. लेकिन 2004 तक, यानी 53 साल बाद भी, देश की 46.4 प्रतिशत आबादी अत्यधिक गरीब थी. 2011-12 तक यह आंकड़ा घटकर 27.1 प्रतिशत रह गया. इसके बाद विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रगति में तेजी आई. 2023-24 तक 2021 की क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर प्रतिदिन 3 डॉलर प्रति व्यक्ति के मानक से मापी जाने वाली अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6 प्रतिशत रह गई. 2021 की कीमतों के आधार पर यह सीमा लगभग 58 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के बराबर है. व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार है.
हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती. यदि हम 2021 की क्रय शक्ति समता के आधार पर प्रतिदिन 4.20 डॉलर प्रति व्यक्ति की उच्चतर गरीबी सीमा से गरीबी को मापें, तो 2011-12 और 2023-24 के बीच गरीबों का प्रतिशत 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया. दूसरे शब्दों में, 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर आ गए. अब वे अपने सपनों को पूरा करने और अपनी क्षमता का एहसास करने के लिए पहले से अधिक स्वतंत्र हैं. चाहे वह विज्ञान, प्रौद्योगिकी, ललित कला, व्यवसाय, खेल या मानव प्रयास का कोई अन्य क्षेत्र हो.
2017 से 2023 के बीच रोजगार में करीब 13.4 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई. इसके अलावा, असमानता मापने वाला उपभोग आधारित गिनी सूचकांक 2011-12 के 28.8 से घटकर 2023 में 23.0 रह गया. सूचकांक जितना अधिक होता है, असमानता उतनी ही ज्यादा होती है. इस प्रकार, इन सर्वेक्षणों में दर्ज उपभोग के आधार पर भारत 2011 की तुलना में कम असमानता वाला समाज बन गया. एक राष्ट्र के रूप में हम इन सभी महत्वपूर्ण उपलब्धियों पर गर्व कर सकते हैं. ये उपलब्धियां उपभोग के बेहतर आंकड़ों में भी दिखाई देती हैं और इससे कारोबारी विश्वास मजबूत होना चाहिए.
हालांकि, चुनौतियां अभी भी बहुत हैं. नए रोजगारों में से कई ग्रामीण क्षेत्रों और अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र में पैदा हुए, जबकि जरूरत श्रमिकों को कहीं अधिक उत्पादक औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित करने की थी. इसके अलावा, युवाओं में बेरोजगारी अप्रैल-जून 2025 के 14.6 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल-जून 2026 में 15.9 प्रतिशत हो गई. यह चिंता का विषय है. इसी तरह, वेतन में अंतर भी चिंता पैदा करता है. 2023 में शीर्ष 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत कमाई निचले 10 प्रतिशत श्रमिकों की तुलना में करीब 13 गुना थी.
हालांकि, हमारी विकास गाथा और गरीबों की स्थिति में और सुधार के प्रयासों के सामने सबसे बड़ी बाधा हमारी राजनीतिक व्यवस्था का अत्यधिक ध्रुवीकृत स्वरूप है. एक राजनीतिक दल लगातार राजनीतिक परिदृश्य पर हावी है. मुख्य विपक्षी दल को पिछले दो दशकों में बार-बार चुनावी हार का सामना करना पड़ा है. स्वाभाविक रूप से, लगातार मिली हार ने निराशा को जन्म दिया है और चुनाव आयोग तथा सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं पर तीखे व्यक्तिगत हमले किए गए हैं. ये सभी संस्थाएं राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. दरअसल, शिकागो विश्वविद्यालय के नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स ए रॉबिन्सन और एमआईटी के डेरॉन एसेमोग्लू ने बताया है कि सफल देशों में मजबूत, विश्वसनीय और स्वतंत्र संस्थाएं होती हैं, जो राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का निष्पक्ष और व्यापक वितरण करती हैं, सुरक्षित लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं स्थापित करती हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखती हैं.
भारत में अपने क्षेत्र में 76 साल पुराना भारतीय चुनाव आयोग भी यही काम करता रहा है. यह निर्धारित समय-सारिणी और नियमों के अनुसार चुनाव कराता है. इसके नेतृत्व वाली व्यवस्था विकेंद्रीकृत है और इसमें लाखों सरकारी कर्मचारी तथा स्कूल शिक्षक शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश राज्य सरकारों के कर्मचारी हैं. मेरे विचार में, इस संस्था के शीर्ष स्तर पर किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में काम करने की साजिश करना लगभग असंभव है. इसकी विकेंद्रीकृत व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर मतदाता सूची तैयार करने में मदद करने वाले 10 लाख से अधिक बूथ स्तर के अधिकारियों के काम को देखते हुए ऐसा करना बेहद मुश्किल है.
इसके बावजूद, मौजूदा सरकार के विरोधी राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान लगातार इस संस्था को निशाना बना रहे हैं. मेरे विचार में, इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए हैं. इससे देश को भारी नुकसान हुआ है. लाखों नागरिकों, जिनमें व्यापारी, यात्री, श्रमिक और छात्र शामिल हैं, को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा है. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों और उनसे जुड़ी पाबंदियों से संबंधित सुनवाई के दौरान व्यापारियों के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्हें प्रतिदिन 200 करोड़ से 250 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. लंबे समय तक चलने वाले आंदोलन यह धारणा पैदा करते हैं कि भारत अराजक, राजनीतिक रूप से अस्थिर और विदेशी निवेश के लिए असुरक्षित है. विदेशी प्रकाशनों, सोशल मीडिया और सरकारों के माध्यम से ऐसी धारणाएं और मजबूत हो सकती हैं.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की हालिया मौखिक टिप्पणी समयानुकूल है कि कोई एक समूह अनिश्चितकाल तक किसी निर्धारित विरोध स्थल पर कब्जा नहीं कर सकता और दूसरों को उसी स्थान पर विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता. पुलिस को इन स्थलों के इस्तेमाल से जुड़ी शर्तों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना चाहिए.
दूसरी ओर, राजनीतिक दलों के लिए जमीनी स्तर पर अपना संगठन मजबूत करना, लोगों की इच्छाओं को समझना और भविष्य के लिए अपने विजन दस्तावेजों में उन्हें प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना अधिक फायदेमंद हो सकता है. लंबे समय में यह तरीका उनके साथ-साथ देश के लिए भी कहीं बेहतर परिणाम देगा. लगातार चलने वाले आंदोलन केवल संस्थाओं को कमजोर करेंगे, विकास की गति धीमी करेंगे और गरीबों को नुकसान पहुंचाएंगे.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों)
अतिथि लेखक: हरदयाल सिंह
(लेखक पूर्व आयकर मुख्य आयुक्त रह चुके हैं और 'मोरल कंपस-फाइंडिंग बैलेंस एंड पर्पज इन एन इम्परफेक्ट वर्ल्ड', हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2022 के लेखक हैं.)
टैग्स