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कविता में एक शोकगीत: मेरे मित्र और बैचमेट, हेमचंद सिरोही, IAS

केजे अल्फोंस लिखते हैं, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में, हेमचंद सिरोही को प्रशासनिक कुशलता, जन-केंद्रित शासन और जनसेवा में योगदान के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था. उनके योगदानों में महाबोधि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की मान्यता दिलाना और जमीनी स्तर पर विकास की पहल शामिल थीं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago

केजे अल्फोंस 

एक नन्हा पक्षी उत्सुकता से अनदेखी दुनिया को निहार रहा था

उस बाड़ से, जो आईआईसी को लोधी गार्डन से अलग करती है

जो वंचितों को संपन्न लोगों से अलग करती है;

नन्हे पक्षी ने पूछा:

“हेम चंद जी, यह एक अजीब दृश्य है,

आईआईसी में ऐसा पहले कभी नहीं देखा.

आप व्हीलचेयर पर हैं,

ऑक्सीजन की ट्रॉली आपके साथ इस तरह जुड़ी है, मानो आपसे अलग ही न हो सकती हो,

आपकी नाक से एक नली

ऑक्सीजन की ट्रॉली तक जुड़ी हुई है.

इतनी परेशानी उठाकर

यहां आने की क्या जरूरत है,

जब आप घर पर रह सकते थे

और अपनी किस्मत को कोस सकते थे?”

“मेरे प्यारे नन्हे पक्षी,” सिरोही ने कहा,

“तुम वाकई बहुत जिज्ञासु पक्षी हो,

जब तुम आसमान में प्रेम के गीत गा सकते थे,

तब तुमने मेरी जीवन-श्वास पर ध्यान दिया.

हमारे बैच 1979 के 10 प्रतिशत साथी जा चुके हैं,

हमारे आंकड़ों के विशेषज्ञ नीलांजन सान्याल के अनुसार.

पता नहीं बाकी लोग कब जाएंगे.

उनमें से कई लंबे समय तक जीवित रहेंगे,

शायद 100 साल की उम्र भी छू लें.

लेकिन मैं जल्द ही जाने वाला हूं.

पाइप हटाए जाने से पहले मुझे कुछ काम पूरे करने हैं.

मैं भाग्यशाली रहा कि परीक्षा पास कर सका,

बिना किसी विशेषाधिकार के,

न तो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ और न ही स्टील का चम्मच लेकर,

बल्कि सचमुच लकड़ी का चम्मच लेकर.

सत्ता में रहना मेरे लिए सम्मान की बात रही,

बिहार में लाखों लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने का अवसर मिला.

फिर 60 साल की उम्र में मुझे एहसास हुआ

कि फाइलें ही सब कुछ नहीं हैं.

अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है.

मैं अपनी जड़ों की ओर, एक गांव में लौट आया हूं,

जहां बच्चे बिना दीवारों और छत वाले स्कूल में पढ़ने जाते हैं,

जहां रात होते ही मवेशी उसे अपना घर बना लेते हैं,

जहां न मेजें हैं, न कुर्सियां और न ही ब्लैकबोर्ड.

छोटे-छोटे बच्चे बड़े-बड़े सपने लेकर आते हैं,

जहां शिक्षकों को वेतन तो मिलता है, लेकिन वे पढ़ाते नहीं हैं.

मैंने सोचा कि मैं भी अपनी ओर से कुछ योगदान दे सकता हूं,

ताकि उनके सपनों को पंख मिल सकें,

उनके स्कूल के लिए एक दीवार बनाकर,

किताबें रखने के लिए एक डेस्क देकर,

बैठने के लिए एक कुर्सी देकर.

मैं यहां आईआईसी में उस नेक इंसान की तलाश में आया हूं,

जो मुझे एक ब्लैकबोर्ड उपहार में दे सके,

कुछ डेस्क और कुछ बेंच दे सके.

वहां कुछ नेक दिल लोग हैं,

जो मेरे सपने को साझा करते हैं.

मैं चाहता हूं कि ये नन्हे बच्चे भी तुम्हारी तरह उड़ सकें, नन्हे पक्षी,

इससे पहले कि सिलेंडर की ऑक्सीजन खत्म हो जाए.

1979 के बैच में होना कितना सौभाग्य की बात है.

मैं अपने जैसे तीन लोगों को पीछे छोड़कर जा रहा हूं,

जो करुणा से भरे हुए हैं:

उषा, सोनिया और सुधीर।”

नन्हे पक्षी ने कहा: “मेरी मां ने मुझसे कहा था

कि इंसानों से कभी बात मत करना.

वे दुष्ट होते हैं.

वे मौज-मस्ती के लिए मारते हैं.

आसमान से मैं तबाही देखता हूं.

हम डरे हुए हैं.

मुझे बहुत खुशी है कि मेरी मुलाकात एक ऐसे इंसान से हुई,

जो दूसरों को उड़ने में मदद करना चाहता है.

मैं अपनी मां को बताऊंगा कि कुछ इंसान अच्छे भी होते हैं.

अलविदा, हेम चंद जी.

आपकी ऑक्सीजन इस धरती की ऑक्सीजन बनी रहे।”

अतिथि लेखक: केजे अल्फोंस

(लेखक एक भारतीय सिविल सेवक, अधिवक्ता और राजनेता हैं. वह नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार में 3 सितंबर 2017 से मई 2019 तक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री रहे.)

 


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