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कलाकार की अनंत रेखाएं: जोगेन चौधरी को श्रद्धांजलि

87 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रख्यात कलाकार अपने पीछे ऐसी विशिष्ट कला छोड़ गए हैं, जो उनकी खास क्रॉस-हैचिंग शैली, असामान्य रेखाओं और गहराई से मानवीय चित्रों के लिए पहचानी जाती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 18 hours ago

तान्या गोयल

मैं जोगेन चौधरी को 20 वर्षों से जानती थी. बहुत करीब से नहीं, न ही अंतरंग रूप से, उनका एक छोटा और बेहद करीबी मित्रों का दायरा था, जिसकी सीमाओं की वे रक्षा करते थे, लेकिन इतना जरूर कि मैं उनकी आवाज, उनकी हंसी और एक रेखा को लेकर उनकी जिद को पहचान सकूं.

25 अक्टूबर 2026, रविवार की सुबह कोलकाता में उनका निधन हो गया. वह 87 वर्ष के थे. एक दुर्लभ रक्त कैंसर, 14 महीने तक कीमोथेरेपी और फिर अंत में एक संक्रमण. उनसे मेरी आखिरी मुलाकात मार्च 2025 में शांतिनिकेतन में हुई थी. तब भी वह कमजोर हो चुके थे, लेकिन उनकी आंखें अब भी तेज थीं. कमरे में मौजूद हम सभी से ज्यादा तेज.

जब आप जोगेन-दा को जानते थे, तो आप दो व्यक्तित्वों को जानते थे.

एक थे सार्वजनिक जीवन के जोगेन चौधरी, बंगा विभूषण, 15 वर्षों तक राष्ट्रपति भवन में कला के संरक्षक, राज्यसभा सांसद और ऐसी अखंड रेखा के उस्ताद, जो एक ही निरंतर क्रॉस-हैचिंग स्ट्रोक से पूरा जीवन उकेर सकते थे. उस व्यक्ति के बारे में मैंने केवल पढ़ा था.

दूसरे वह व्यक्ति थे, जिनसे मेरी मुलाकात हुई - फरिदपुर के दहरपारा गांव के एक लड़के, जो अब बांग्लादेश में है और जिसने वास्तव में कभी अपना गांव नहीं छोड़ा. वह तब भी बांग्ला में ही बात करते, जब आप उनसे अंग्रेजी में बोलते. वह आपके हाथ को देखते और कहते, "आपकी उंगलियां दिलचस्प हैं. थोड़ी मुड़ी हुई. क्या मैं इनका चित्र बना सकता हूं?"

उन्होंने कभी खूबसूरत लोगों के चित्र नहीं बनाए. उन्होंने वास्तविक लोगों को चित्रित किया. उनके पुरुष थोड़े सूजे हुए दिखते थे, उनकी महिलाएं थोड़ी थकी हुई और उनके जोड़े थोड़े अकेले. उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, "सीधी रेखा एक झूठ है. कोई भी इंसान सीधा नहीं होता. हम सभी थोड़े टेढ़े हैं. इसलिए मेरी रेखा भी टेढ़ी है."

यही उनका संपूर्ण दर्शन था.

मुझे याद है, कुछ साल पहले मैंने उनसे मेरे कैलाशम फाउंडेशन में आयोजित बंगाली कलाकारों की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने का अनुरोध किया था. वह समय पर आ गए  कलाकारों के मामले में यह दुर्लभ था, उन्होंने सफेद रंग का एक ऐसा पायजामा-कुर्ता पहना था, जो उनके लिए काफी बड़ा था, और उन्होंने फीता काटने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, "मैं कुछ भी नहीं काटूंगा. मैं एक रेखा खींचूंगा. किसी चीज की शुरुआत ऐसे ही होती है."

इसके बाद उन्होंने अतिथि पुस्तिका में एक रेखा खींची. पन्ने पर एक लंबी, बिना टूटे आगे बढ़ती, डगमगाती हुई रेखा. फिर उन्होंने कहा, "हो गया, प्रदर्शनी शुरू."

पिछले साल मार्च में शांतिनिकेतन में हम उनके स्टूडियो में बैठे थे. अब उनके पास एक छोटी मेज, स्याही, कागज और एक आवर्धक लेंस था. उन्होंने मुझे अपनी नई श्रृंखला दिखाई , आकार में छोटी और अधिक निजी. उनके बचपन के चेहरे. उन्होंने कहा कि वह कई नाम भूल रहे थे, लेकिन चेहरों को बेहतर तरीके से याद रख पा रहे थे. अपने बारे में तीसरे व्यक्ति में बात करते हुए, जैसा कि वह अक्सर करते थे, उन्होंने कहा, "चेहरे याद रहते हैं, जोगेन."

वह गले लगाकर स्नेह जताने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका स्नेह बंगाली अंदाज में था, वह आपको चाय देते, फिर एक घंटे तक चित्र बनाते हुए आपको नजरअंदाज करते और अचानक कुछ ऐसा गहरा कह देते कि आप उस एक घंटे को माफ कर देते.

मैं यह दिखावा नहीं करूंगी कि मैं उनकी करीबी मित्र थी. मैं नहीं थी. लेकिन 20 वर्षों तक वह कला जगत के मेरे छोटे-से दायरे में एक स्थायी उपस्थिति बने रहे. मैं फोन करती, तो वह उठा लेते. किसी युवा कलाकार के लिए मुझे उनसे एक संदेश चाहिए होता, तो वह अपनी छोटी-छोटी बंगाली-अंग्रेजी लिखावट में उसे लिख देते. मैं उन्हें आमंत्रित करती, तो वह आने की कोशिश करते.

भारतीय कला जगत में कई प्रतिभाशाली चित्रकार हैं. लेकिन ऐसे बहुत कम कलाकार हैं, जिनकी रेखा को देखते ही पहचाना जा सकता है कि यह उन्हीं की है. आप कमरे के दूसरी तरफ से भी जोगेन की कला पहचान सकते हैं. वह क्रॉस-हैचिंग, वह उभरा हुआ गाल, वह अकेली आंख.

अब वह रेखा थम गई है.

लेकिन वह गायब नहीं होगी. वह राष्ट्रपति भवन में है, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (एनजीएमए) में है, हजारों घरों में है और अब कैलाशम फाउंडेशन की मेरी अतिथि पुस्तिका में भी, एक अकेली, अखंड रेखा, जिसे वह यह कहने के लिए छोड़ गए, "मैं यहां था."

प्रणाम, जोगेन-दा.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

अतिथि लेखिका: तान्या गोयल, अध्यक्ष और ट्रस्टी, कैलाशम ट्रस्ट 


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