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अपने भीतर के बच्चे को खोए बिना बड़े होना

लेखक विक्रम चन्दीरमानी के अनुसार, बच्चों में जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, मुश्किलों से उबरने की क्षमता और खुशी का असाधारण गुण होता है. वयस्क होने के सफर में कहीं न कहीं हम अक्सर इनमें से कुछ खूबियां खो देते हैं. शायद अब समय आ गया है कि हम उन्हें फिर से खोजें.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

विक्रम चन्दीरमानी

बच्चों से वयस्क बहुत कुछ सीख सकते हैं. उनके व्यवहार को थोड़ी देर ध्यान से देखिए, तो शायद आप सोचने लगेंगे कि बड़े होने के अपने तमाम फायदों के बावजूद, इस प्रक्रिया में हमें कुछ बेहद खूबसूरत चीजें भूलनी भी पड़ती हैं.

एक छोटे बच्चे के लिए दुनिया हमेशा आकर्षित करने वाली जगह होती है. उड़ती हुई तितली, बारिश के बाद बना पानी का गड्ढा, गुजरती हुई ट्रेन या फर्श पर रेंगता हुआ कोई कीड़ा उसका पूरा ध्यान अपनी ओर खींच सकता है. वे चीजों को छूना चाहते हैं, उन्हें बारीकी से देखना चाहते हैं, खोलकर समझना चाहते हैं कि वे कैसे काम करती हैं. और वे सवाल पूछते हैं. लगातार सवाल. आसमान नीला क्यों है? हवा कहां से आती है? लोगों को काम क्यों करना पड़ता है? हम नाश्ते में आइसक्रीम क्यों नहीं खा सकते? और लंबी कार यात्रा के दौरान उनका हमेशा पसंदीदा सवाल होता है: हम अभी तक पहुंचे क्यों नहीं?

इनमें से कुछ सवाल मजेदार होते हैं. कुछ आश्चर्यजनक रूप से गहरे होते हैं. कभी-कभी कोई बच्चा ऐसा अप्रत्याशित सवाल पूछ देता है कि दशकों से किसी बात को सहज मानते आ रहे वयस्क को भी उसका जवाब देने में मुश्किल होने लगती है. बच्चों में टालमटोल वाले जवाबों को पहचानने की भी गजब की क्षमता होती है. “क्योंकि मैंने कहा है” जैसा जवाब शायद ही उन्हें संतुष्ट करता है, हालांकि थके हुए माता-पिता के बीच यह अब भी लोकप्रिय है.

इस जिज्ञासा के साथ उनकी कल्पनाशीलता भी जुड़ी होती है, जिसकी कोई खास सीमा नहीं होती. किसी बच्चे को कागज और रंग दे दीजिए, वह खुशी-खुशी घंटों अपनी कलाकृतियां बनाने में बिता सकता है. रंग उसकी उंगलियों, कपड़ों, फर्श और संभव है कि फर्नीचर पर भी लग जाएं. लेकिन कलाकार को इन बातों से खास फर्क नहीं पड़ता. उसकी बनाई तस्वीर का वैसा दिखना भी जरूरी नहीं है, जैसा उसने सोचा था. और अगर आप यह पहचान नहीं पा रहे हैं कि उसने क्या बनाया है, तो अंदाजा लगाने के बजाय उससे पूछना ही बेहतर होता है.

कभी-कभी बच्चों को खिलौनों की भी जरूरत नहीं होती. टेलीविजन खोलने के बाद बचा एक बड़ा गत्ते का डिब्बा उन्हें घंटों व्यस्त रख सकता है. एक पल वह घर बन जाता है, अगले पल सुरंग, फिर किला, कार या किसी दूसरी आकाशगंगा की ओर जाता अंतरिक्ष यान. हो सकता है कि वह उस महंगे खिलौने से कहीं ज्यादा मनोरंजक साबित हो, जो किसी दूसरे डिब्बे में आया था. ऐसे में माता-पिता सोचते रह जाते हैं कि आखिर उन्होंने खिलौने पर इतने पैसे खर्च क्यों किए.

बिना यह चिंता किए कुछ बनाने की आजादी में एक खास खूबसूरती है कि नतीजा अच्छा होगा या नहीं. छोटे बच्चे शब्द जाने बिना गाते हैं, कदम जाने बिना नाचते हैं और उन चीजों को भी पूरे उत्साह से करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं किया. किसी संगीत वाद्ययंत्र पर तीन सुर बजाना सीख चुका बच्चा पूरे परिवार के सामने संगीत कार्यक्रम पेश करने की जिद कर सकता है. उससे उम्मीद की जाती है कि उसका हर श्रोता प्रस्तुति की सराहना करेगा, चाहे प्रदर्शन कैसा भी हो.

बड़े होते-होते हममें से कई लोग यह आजादी खो देते हैं. हम गाना छोड़ देते हैं. हम सोचते हैं कि हमारी आवाज अच्छी नहीं है, हमारे पैर नाचने के लिए सही नहीं हैं या हममें चित्रकारी की प्रतिभा नहीं है. जो गतिविधियां कभी हमें खुशी देती थीं, उन्हें हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं, जिन्हें हम अपने से बेहतर मानते हैं. हम अपनी सीमाओं को लेकर इतने सचेत हो जाते हैं कि कोशिश करने का आनंद भी खुद से छीन लेते हैं.

और फिर भी, बचपन में हम असफलता को सहजता से स्वीकार कर लेते थे.

चलना सीख रहे किसी छोटे बच्चे को देखिए. वह कुछ झिझकते हुए कदम बढ़ाता है, संतुलन खोता है और गिर जाता है. हो सकता है कि वह रोने लगे. कभी-कभी उसकी आवाज इतनी तेज होती है कि चोट की गंभीरता के मुकाबले प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा बड़ी लगती है. थोड़ा दुलार, शायद ध्यान भटकाने के लिए कोई दूसरी चीज और कुछ ही देर में बच्चा फिर अपने पैरों पर खड़ा होकर वही कोशिश करने लगता है. कुछ मिनट पहले मिली असफलता वह पहले ही भूल चुका होता है.

कुछ साल बाद यही बच्चा साइकिल से गिर सकता है, उसके घुटने छिल सकते हैं, वह खूब रो सकता है और फिर दोबारा कोशिश करने की जिद कर सकता है. वह बाकी दोपहर यह सोचते हुए नहीं बिताता कि शायद वह साइकिल चलाने के लिए बना ही नहीं है. न ही वह गिरने को इस बात का सबूत मानता है कि वह कभी सफल नहीं हो पाएगा. उसे निश्चित रूप से इस अनुभव से मिली सीख के बारे में सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट लिखने की जरूरत भी महसूस नहीं होती.

असफलता सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा भर है. कल्पना कीजिए कि अगर हम जीवन भर इस सोच का थोड़ा-सा हिस्सा भी अपने भीतर बनाए रखें, तो कितना कुछ हासिल कर सकते हैं.

स्नेह जताने के मामले में भी बच्चे उतने ही बेझिझक होते हैं. जब वे किसी से प्यार करते हैं, तो उसे गले लगाते हैं, उससे लिपट जाते हैं और अपने प्यार का इजहार करते हैं. वे यह हिसाब नहीं लगाते कि सामने वाला भी उतना ही स्नेह लौटाएगा या नहीं, अथवा अपनी भावनाएं जाहिर करने से वे कमजोर पड़ सकते हैं. जब वे आपको देखकर खुश होते हैं, तो उनकी भावनाओं को समझने में कोई गलती होने की गुंजाइश बहुत कम होती है. उनका स्नेह ऐसे साथियों तक भी पहुंच सकता है, जिनकी कोई उम्मीद नहीं करता. कोई बच्चा घर के एक्वेरियम में तैरती छोटी-सी मछली से भी गहरा भावनात्मक लगाव विकसित कर सकता है. वह उसका नाम रखता है, हर सुबह उसका अभिवादन करता है और उसके बीमार दिखने पर चिंता करता है. किसी वयस्क के लिए वह टैंक में तैरती कई मछलियों में से एक हो सकती है. लेकिन बच्चे के लिए वह एक दोस्त है.

उनकी ईमानदारी कभी-कभी असुविधाजनक भी हो सकती है. कोई छोटा बच्चा कह सकता है कि आपका बनाया खाना बहुत खराब है, किसी मेहमान से पूछ सकता है कि वह गंजा या मोटा क्यों है, या अपने माता-पिता की निजी बातचीत में कही गई बात को दोहरा सकता है. अक्सर वह ऐसा सबसे अनुचित समय पर करता है. जब ऐसी बातें अनजान लोगों के सामने तेज आवाज में कही जाती हैं, तो माता-पिता को शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. बच्चों ने अभी तक उन जटिल सामाजिक तौर-तरीकों को नहीं सीखा होता, जिनके जरिए वयस्क कभी-कभी अपनी वास्तविक भावनाओं को छिपाते हैं.

बेशक, विवेक और संवेदनशीलता महत्वपूर्ण हैं. हर विचार को व्यक्त करना जरूरी नहीं है. लेकिन इस तरह के बिना किसी रोक-टोक वाले व्यवहार में कुछ ताजगी जरूर है, भले ही कभी-कभी माता-पिता चाहते हों कि उनके बच्चे बोलने से पहले थोड़ा सोच लिया करें.

दोस्ती को लेकर उनका नजरिया भी उतना ही सरल होता है. दो ऐसे बच्चे, जो पहले कभी नहीं मिले, किसी पार्क में एक-दूसरे से मिल सकते हैं और कुछ ही मिनटों में इस तरह साथ खेलने लगते हैं, मानो वर्षों से दोस्त हों. हो सकता है कि वे एक-दूसरे की भाषा भी न समझते हों. लेकिन इससे खास फर्क नहीं पड़ता. एक गेंद, झूला या साथ खेला जाने वाला खेल ही अक्सर दोस्ती के लिए पर्याप्त होता है.

उन्हें यह जानने की जरूरत नहीं होती कि दूसरे बच्चे के माता-पिता क्या काम करते हैं, वे कहां रहते हैं, कितने अमीर हैं या भविष्य में यह दोस्ती किसी काम आएगी या नहीं. यहां कोई संपर्क बढ़ाने की रणनीति नहीं होती, न ही बिजनेस कार्ड का आदान-प्रदान होता है. इस बात पर भी कोई चर्चा नहीं होती कि वे एक-दूसरे के जीवन में क्या उपयोगिता जोड़ सकते हैं. वे बस एक-दूसरे का साथ पसंद करते हैं.

स्वाभाविक है कि वे झगड़ते भी हैं. कभी-कभी तो बहुत बुरी तरह. किसी खिलौने को लेकर हुआ विवाद आंसुओं, आरोपों और इस गंभीर घोषणा तक पहुंच सकता है कि अब वे एक-दूसरे से कभी बात नहीं करेंगे. आधे घंटे बाद वही दोनों बच्चे खुशी-खुशी साथ खेलते नजर आ सकते हैं और झगड़ा लगभग पूरी तरह भूल चुके होते हैं. न किसी मध्यस्थ की नियुक्ति हुई होती है, न वकील ने माफी का मसौदा तैयार किया होता है और न ही किसी ने सार्वजनिक रूप से बयान वापस लेने की मांग की होती है.

दूसरी ओर, वयस्क कई सालों तक पुरानी शिकायतों को मन में पालकर रख सकते हैं, कभी-कभी तब भी, जब मूल विवाद का कोई महत्व नहीं रह जाता. हम पुराने दुखों को नई परिस्थितियों में भी साथ लेकर चलते हैं और कभी-कभी किसी एक अप्रिय घटना को वर्षों के स्नेह या दोस्ती पर हावी होने देते हैं.

बच्चे मदद मांगने में भी ज्यादा नहीं हिचकिचाते. कोई चीज उनकी पहुंच से बाहर हो, तो वे किसी लंबे व्यक्ति से मदद मांग लेते हैं. कुछ समझ न आए, तो उसका स्पष्टीकरण मांगते हैं. कोई काम न कर पाएं, तो किसी से उसे करके दिखाने के लिए कहते हैं. उन्होंने अभी तक यह मानना नहीं सीखा होता कि मदद मांगना कमजोरी या अयोग्यता की निशानी है.

दिलचस्प बात यह है कि वे उन वयस्कों से भी सवाल करने में सक्षम होते हैं, जिनसे वे मदद मांगते हैं. जिसने भी बच्चे का पालन-पोषण किया है, वह जानता है कि यह कितना थकाने वाला हो सकता है. निर्देशों के जवाब में सवाल आते हैं, स्पष्टीकरण देने पर और सवाल उठते हैं और पूरी तरह उचित नियमों पर भी लंबी बातचीत शुरू हो सकती है. कभी-कभी बच्चे बातचीत की प्रक्रिया को पूरी तरह छोड़कर ठीक वही कर देते हैं, जिसके लिए उन्हें मना किया गया था. माता-पिता को पता चल सकता है कि तीन साल के बच्चे में किसी अनुभवी ट्रेड यूनियन नेता जितनी बातचीत और मोलभाव करने की क्षमता है, लेकिन समझौता करने में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है.

फिर भी, उनके भीतर अधिकार को सवालों के घेरे में रखने की जो सहज प्रवृत्ति होती है, उसमें कुछ प्रशंसनीय है. उन्होंने अभी तक यह नहीं सीखा होता कि कोई नियम सिर्फ इसलिए समझदारी भरा होगा, क्योंकि उसे किसी बड़े या अधिक शक्तिशाली व्यक्ति ने बनाया है. दूसरी ओर, वयस्क कभी-कभी उन परंपराओं का पालन करते रहते हैं, जिनके अस्तित्व का कारण वे बहुत पहले भूल चुके होते हैं.

बच्चे अपनी कल्पनाओं में बेहद महत्वाकांक्षी भी होते हैं. किसी छोटे बच्चे से पूछिए कि बड़ा होकर वह क्या बनना चाहता है, तो जवाब अंतरिक्ष यात्री, वैज्ञानिक, फुटबॉलर, जादूगर या सुपरहीरो हो सकता है. कभी-कभी वह एक साथ कई चीजें बनना चाहता है. उसके पास यह मानने का कोई खास कारण नहीं होता कि असाधारण चीजें उसकी पहुंच से बाहर हैं. किसी ने अभी तक उसे यह नहीं बताया होता कि सुपरहीरो के लिए नौकरियों के अवसर काफी सीमित हैं.

धीरे-धीरे वे योग्यता, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक सीमाओं और महत्वाकांक्षा तथा उपलब्धि के बीच आने वाली कई बाधाओं के बारे में सीखेंगे. इनमें से कुछ बातें जानना जरूरी है. लेकिन किसी सपने को पूरा करने में आने वाली कठिनाइयों को समझने और कोशिश करने से पहले ही उसे छोड़ देने में फर्क है.

शायद बच्चों की सबसे प्यारी खूबियों में से एक यह है कि उन्हें खुश होने के लिए कभी-कभी बहुत कम चीजों की जरूरत होती है. अचानक मिल जाने वाली आइसक्रीम उनका पूरा दिन बना सकती है. समुद्र तट की सैर, इंद्रधनुष देखना, खेलने के लिए उत्सुक कोई पिल्ला या अपने पसंदीदा दादा-दादी से मिलने की संभावना भी उन्हें खुश कर सकती है. कोई बच्चा पूरी दोपहर रेत के महल बनाने में बिता सकता है, जिन्हें आखिरकार समुद्र की लहरें बहा ले जाएंगी. इस गतिविधि से कोई स्थायी या उपयोगी चीज बनना जरूरी नहीं है. आनंद तो उसे करने में ही है.

वयस्क होने पर हमें अक्सर यह साबित करने की जरूरत महसूस होती है कि हम अपना समय जिस तरह बिता रहे हैं, वह सही है. उम्मीद की जाती है कि शौक किसी उपलब्धि में बदलें, बेहतर हो कि ऐसी उपलब्धि हो जिसे लिंक्डइन पर दिखाया जा सके. रुचियों का उत्पादक होना जरूरी माना जाने लगता है और यहां तक कि खाली समय को भी अधिकतम उपयोगी बनाने की कोशिश की जाती है. कहीं न कहीं हम यह भूल जाते हैं कि किसी काम को सिर्फ इसलिए करना कि उससे हमें खुशी मिलती है, अपने आप में पर्याप्त कारण है. कोई बच्चा दो घंटे तक पानी के गड्ढे में छप-छप कर सकता है, बिना व्यक्तिगत विकास, नए कौशल सीखने या उस अनुभव को पेशेवर तरक्की के लिए इस्तेमाल करने की चिंता किए.

जब बच्चे आनंद ले रहे होते हैं, तो वे अक्सर पूरी तरह उसी पल में डूबे होते हैं. वे इस बात की चिंता नहीं करते कि पिछले सप्ताह क्या हुआ था या अगले महीने क्या हो सकता है. वे कल हुई किसी असहज बातचीत को बार-बार याद नहीं करते और न ही उन मुश्किलों की कल्पना करते हैं, जो शायद कभी आएंगी ही नहीं.

उस तरह पूरी तरह किसी काम में डूब जाने में एक तरह की आजादी है. वयस्क अक्सर उसे फिर से पाने के लिए ध्यान, सजगता और दूसरी गतिविधियों पर काफी समय और पैसा खर्च करते हैं. एक बच्चा बिना किसी सप्ताहांत शिविर में गए, सिर्फ एक बाल्टी, फावड़े और रेत के छोटे से हिस्से की मदद से उस स्थिति को हासिल कर सकता है.

छोटे बच्चे लोगों से भी एक ऐसी सहजता के साथ मिलते हैं, जो वयस्क जीवन में धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है. उन्होंने अभी तक वे संदेह, पूर्वाग्रह और निराशाएं जमा नहीं की होतीं, जो वयस्कों के कई रिश्तों को आकार देती हैं. वे अक्सर इस बात में ज्यादा रुचि रखते हैं कि कोई व्यक्ति मिलनसार है या उनके साथ खेलना चाहता है, न कि समाज ने उस व्यक्ति पर कौन-से लेबल लगा रखे हैं.

बेशक, बच्चों को सतर्क रहना सीखना चाहिए. भरोसे के साथ विवेक भी जरूरी है और केवल मासूमियत ऐसी दुनिया से बचाव नहीं कर सकती, जो हमेशा दयालु नहीं होती. लेकिन समझदारी से लोगों को परखने और हर बात को लेकर नकारात्मक हो जाने में फर्क है.

समय बीतने के साथ हम ज्ञान, अनुभव और जिम्मेदारियां हासिल करते हैं. हम संयम बरतना, परिणामों का अनुमान लगाना, निराशा से निपटना और कठिन फैसले लेना सीखते हैं. ये बड़े होने की प्रक्रिया के जरूरी हिस्से हैं. फिर भी, इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं हम कभी-कभी उन चीजों को भी छोड़ देते हैं, जिन्हें छोड़ने की हमें जरूरत नहीं थी.

हम खुद को लेकर ज्यादा सचेत हो जाते हैं, स्नेह जताने में अधिक सावधानी बरतते हैं, दूसरों की नजरों में अपनी छवि को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं और शर्मिंदगी के डर से जोखिम उठाने से कतराने लगते हैं. अनजान या कम जानकारी वाला दिखने के डर से सवाल पूछना कम कर देते हैं. हम अपनी उपलब्धियों की तुलना दूसरों से करने लगते हैं. हमारे पास अधिक सामान हो सकता है, लेकिन हमें खुश करना पहले से ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

जो दुनिया कभी आश्चर्यों से भरी लगती थी, वह धीरे-धीरे जानी-पहचानी हो जाती है. हम उन चीजों पर ध्यान देना बंद कर देते हैं, जो कभी हमें आकर्षित करती थीं. इंद्रधनुष खुशी देने वाली चीज के बजाय मौसम विज्ञान की एक घटना बन जाता है. तितली महज एक और कीड़ा रह जाती है. और खाली गत्ते का डिब्बा ऐसी चीज बन जाता है, जिसे समतल करके रीसाइक्लिंग के लिए भेज देना चाहिए.

बेशक, बचपन कोई ऐसी आदर्श अवस्था नहीं है, जिसमें हमें लौटने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे स्वार्थी, अधीर, अनुचित मांग करने वाले और असाधारण रूप से जिद्दी भी हो सकते हैं. जिसने भी किसी छोटे बच्चे के साथ समय बिताया है, वह जानता है कि मासूमियत और अच्छा व्यवहार हमेशा साथ-साथ नहीं चलते. दूसरे बिस्कुट से मना किए जाने पर कोई छोटा बच्चा इस तरह प्रतिक्रिया कर सकता है, मानो उसके किसी मौलिक संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो गया हो.

बड़े होने के लिए हमें वे खूबियां भी विकसित करनी होती हैं, जो बच्चों में अभी नहीं आई होतीं. लेकिन परिपक्वता हासिल करने के लिए जिज्ञासा, अपनापन, कल्पनाशीलता या खुशी को खोना जरूरी नहीं है. हम जिम्मेदार होते हुए भी कठोर होने से बच सकते हैं, सावधान रहते हुए भी डरपोक नहीं बनना पड़ता, ज्ञान हासिल करते हुए भी नए विचारों के लिए खुले रह सकते हैं और महत्वाकांक्षी होते हुए भी छोटी-छोटी खुशियों का आनंद लेना नहीं भूलना चाहिए.

शायद उम्र बढ़ने की असली उपलब्धि यह है कि हम बचपन में मौजूद खूबियों को पूरी तरह बदलने के बजाय उनमें समझदारी और अनुभव जोड़ें. कुछ नया करने की हिम्मत बनाए रखें, सवाल पूछने में विनम्रता दिखाएं, दूसरों को माफ करने का उदार भाव रखें और साधारण चीजों में खुशी खोजने की क्षमता बचाकर रखें.

आखिरकार, हम अपने बचपन का एक बड़ा हिस्सा वयस्क बनना सीखने में बिताते हैं. शायद हमें अपने वयस्क जीवन का थोड़ा-सा हिस्सा फिर से बच्चा बनना याद करने में बिताना चाहिए.

और शायद, कभी-कभी, हमें एक खाली गत्ते के डिब्बे को देखकर उसमें अंतरिक्ष यान भी दिखाई देना चाहिए.

अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी,

(विक्रम चन्दीरमानी, एक सेलेब्रिटी ज्योतिषाचार्य हैं, जोकि वर्ष 2001 से ज्योतिष का अभ्यास कर रहे हैं. वह वैदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज क्षमताओं के साथ जोड़कर भविष्य के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं.)


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