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भारत-जापान वैश्विक साझेदारी 2.0: द्विपक्षीय व्यापार से वैश्विक सशक्तीकरण तक
इस लेख में विभव कांत उपाध्याय बताते हैं कि इस साझेदारी के अगले अध्याय में बाजारों और परियोजनाओं से आगे बढ़कर संस्थानों, प्रणालियों और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना क्यों जरूरी है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
विभव कांत उपाध्याय
भारत और जापान के बीच लगभग 2,000 वर्षों से चली आ रही सभ्यतागत साझेदारी है. बौद्ध धर्म, दर्शन, संस्कृति और ज्ञान के आदान-प्रदान ने आधुनिक राजनयिक संबंधों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही दोनों देशों के बीच गहरा जुड़ाव स्थापित कर दिया था.
हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, इन दोनों महान सभ्यताओं का विकास उल्लेखनीय रूप से अलग-अलग रास्तों पर हुआ. जापान ने युद्ध की तबाही के बाद अपनी अर्थव्यवस्था, उद्योग और संस्थानों के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया. औपनिवेशिक शासन से बाहर निकलकर भारत अपने राष्ट्र निर्माण के ढांचे की तलाश कर रहा था और राज्य के नेतृत्व वाली योजना तथा समाजवादी प्रभाव वाली नीतियों से होते हुए आर्थिक उदारीकरण की ओर बढ़ रहा था.
दोनों देश एक-दूसरे का सम्मान करते थे. दोनों के पास एक-दूसरे की पूरक क्षमताएं थीं. फिर भी, उनकी सरकारों, संस्थानों, व्यवसायों और लोगों के बीच संवाद आश्चर्यजनक रूप से सीमित रहा.
1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद जापान द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने संबंधों को काफी तनावपूर्ण बना दिया. हालांकि, मेरे आकलन में प्रतिबंध मूल समस्या नहीं थे.
वास्तविक चुनौती निरंतर संवाद की कमी और, इससे भी महत्वपूर्ण, एक साझा उद्देश्य का अभाव था. प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं और राजनयिक मतभेद सुलझाए जा सकते हैं. लेकिन साझा उद्देश्य के बिना, मित्र देश भी पीढ़ियों तक एक-दूसरे से दूर रह सकते हैं.
इस समझ ने भारत-जापान संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाले एक नए आंदोलन की नींव रखी.
एक नई साझेदारी का जन्म
1990 के दशक के आखिरी वर्षों और 2000 के शुरुआती वर्षों के दौरान, मेरे नेतृत्व में इंडिया सेंटर फाउंडेशन ने भारत और जापान के बीच मौलिक रूप से अलग संबंधों की वकालत शुरू की. हमारा प्रस्ताव था कि दोनों देशों को पारंपरिक व्यापार और कूटनीति से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण और वैश्विक विकास में भागीदार बनना चाहिए.
इस दृष्टिकोण को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का प्रोत्साहन और आशीर्वाद मिला. इसके बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पर्याप्त समर्थन और निरंतरता बनी रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे चलकर भारत-जापान वैश्विक साझेदारी को अगले स्तर तक पहुंचाया, रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया और हाई-स्पीड रेलवे परियोजना सहित प्रमुख विकास एवं बुनियादी ढांचा पहलों के क्रियान्वयन को आगे बढ़ाया.
जापान की ओर से योशिरो मोरी, जुनिचिरो कोइजुमी और शिंजो आबे सहित नेताओं ने अपनी-अपनी भूमिकाओं और अलग-अलग चरणों में इस साझेदारी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
मैं विशेष रूप से प्रभावशाली जापानी अर्थशास्त्री और नीति सलाहकार कोइची हमादा के योगदान का उल्लेख करना चाहूंगा. उनके मजबूत विचारों, निरंतर समर्थन और भारत-जापान संबंधों की वकालत ने जापान के लिए भारत के रणनीतिक और आर्थिक महत्व की पहचान को मजबूत करने में मदद की.
नीति निर्माताओं, राजनीतिक नेताओं, व्यवसायों और सामाजिक संस्थानों के साथ संवाद के माध्यम से हमने एक साझा उद्देश्य स्थापित करने का प्रयास किया.
जापान के पास उन्नत तकनीक, औद्योगिक अनुशासन, संस्थागत ज्ञान और दीर्घकालिक वित्तीय संसाधन थे. भारत के पास विशाल मानवीय क्षमता, उद्यमशीलता की क्षमताएं, एक बड़ा घरेलू बाजार और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की नई पीढ़ी विकसित करने का अवसर था.
जापान भारत को केवल अपने उत्पादों के बाजार के रूप में क्यों देखे? भारत जापान को केवल तकनीक और पूंजी के स्रोत के रूप में क्यों देखे?
हमारा प्रस्ताव था कि जापान भारत की उत्पादक आर्थिक नींव को मजबूत करने में भागीदार बने, जबकि भारत जापान और अंततः व्यापक दुनिया के लिए नए अवसर पैदा करने में भागीदार बने.
इस दृष्टिकोण को सहस्राब्दी के आसपास भारत-जापान वैश्विक साझेदारी पहल के माध्यम से आगे बढ़ाया गया और बाद में दोनों देशों के बीच विस्तारित होते राजनयिक एवं रणनीतिक संबंधों में इसे समर्थन मिला.
मूल विचार सहयोग को व्यावसायिक लेन-देन तक सीमित रखने के बजाय दोनों राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की पूरक क्षमताओं में तालमेल स्थापित करना था.
विकास की शुरुआत विचारधारा और प्रणालियों से होती है
हमारी सोच के केंद्र में यह विश्वास था कि विकास का उद्देश्य शोषण से सशक्तीकरण की ओर बढ़ना होना चाहिए. यही दर्शन विकसित होकर उस अवधारणा में बदला, जिसे हम वैकल्पिक विकास मॉडल यानी अल्टरनेटिव डेवलपमेंट मॉडल (ADM) कहते हैं. ADM का प्रस्ताव है कि राष्ट्र निर्माण तीन परस्पर जुड़ी परतों के माध्यम से होना चाहिए - विचारधारा → प्रणालियां → परियोजनाएं और उत्पाद.
विचारधारा विकास का उद्देश्य निर्धारित करती है. प्रणालियां उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए जरूरी संस्थान और क्षमताएं तैयार करती हैं. परियोजनाएं और उत्पाद ठोस परिणाम प्रदान करते हैं.
जब दो देश साझा विकास दर्शन पर सहमत होते हैं, तो उन्हें अगला कदम उठाते हुए ऐसी प्रणालियां बनानी चाहिए, जो उनकी साझा सोच को टिकाऊ आर्थिक गतिविधियों में बदल सकें.
इस मध्यवर्ती स्तर के बिना, सबसे महत्वाकांक्षी द्विपक्षीय साझेदारी भी असंबद्ध परियोजनाओं का एक संग्रह बनकर रह जाने का जोखिम उठाती है. भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. हमने उद्यमशीलता, तकनीक और व्यक्तिगत परियोजनाओं में असाधारण क्षमताएं दिखाई हैं. फिर भी, एकीकृत और विश्वस्तरीय प्रणालियां बनाने का हमारा रिकॉर्ड अब भी असमान रहा है.
एक शहर एक प्रणाली है. रेलवे नेटवर्क एक प्रणाली है. औद्योगिक गलियारा एक प्रणाली है. विमानन इकोसिस्टम एक प्रणाली है. इनकी सफलता केवल भौतिक बुनियादी ढांचे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संस्थागत ढांचे, शासन, वित्त, तकनीक, मानव संसाधन और दीर्घकालिक उद्देश्य पर भी निर्भर करती है.
भारत-जापान सहयोग का उद्देश्य इसी चुनौती से निपटने में मदद करना था.
गलियारों को अर्थव्यवस्थाएं बनानी चाहिए
दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे की परिकल्पना सामाजिक-आर्थिक बदलाव के एक बहुत बड़े दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में की गई थी. हमारी मूल सोच में औद्योगिक, कृषि, स्वास्थ्य सेवा और अन्य विशिष्ट आर्थिक इकोसिस्टम सहित कई विकास गलियारे शामिल थे.
इनका उद्देश्य बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाना नहीं था. उद्देश्य संपूर्ण आर्थिक प्रणालियां तैयार करना था.
कल्पना कीजिए कि हजारों की संख्या में जापानी उद्यमियों, छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों तथा प्रौद्योगिकी कंपनियों को व्यवस्थित रूप से उनके भारतीय समकक्षों से जोड़ा जाए. कल्पना कीजिए कि औद्योगिक क्षेत्र विनिर्माण, अनुसंधान, कृषि, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य सेवा, लॉजिस्टिक्स, स्वच्छ ऊर्जा और मानव विकास को एकीकृत करें.
उद्देश्य केवल जमीन हासिल करना, बुनियादी ढांचा बनाना और कंपनियों को कारखाने स्थापित करने के लिए आमंत्रित करना नहीं था. इसका उद्देश्य नई अर्थव्यवस्थाएं, नए रोजगार और नई उत्पादक क्षमताएं तैयार करना था.
इन इकोसिस्टम की परिकल्पना कई विकास संबंधी मानकों के आधार पर की गई थी: आर्थिक उत्पादकता, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता, मानवीय कल्याण और विकास का व्यापक सामाजिक उद्देश्य.
प्रधानमंत्री वाजपेयी का प्रोत्साहन, डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पर्याप्त समर्थन और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में प्रमुख पहलों को आगे बढ़ाना, लगातार बदलती सरकारों के बावजूद इस साझेदारी की निरंतरता को दर्शाता है.
हालांकि, मेरा मानना है कि अब हमें यह जांचना चाहिए कि क्या औद्योगिक गलियारों ने अपनी मूल सामाजिक-आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया है. क्या उन्होंने परिकल्पित एकीकृत इकोसिस्टम बनाए हैं? क्या उन्होंने जापानी और भारतीय उद्यमियों को आवश्यक पैमाने पर एक साथ लाया है? क्या उन्होंने नई औद्योगिक संस्कृति और आर्थिक अवसर पैदा किए हैं, जो उनके मूल उद्देश्य का हिस्सा थे?
कुछ पहल सफल हुई हैं, कुछ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं और कुछ अभी अधूरी हैं. हमें इनकी रचनात्मक समीक्षा करनी चाहिए, किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि मूल महत्वाकांक्षा को फिर से स्थापित करने के लिए.
एक औद्योगिक गलियारे को अर्थव्यवस्था बनानी चाहिए, केवल औद्योगिक क्षेत्र नहीं.
हाई-स्पीड रेल के लिए राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत
हाई-स्पीड रेलवे की पहल एक और महत्वपूर्ण सबक देती है. जब हमने भारत में जापान की शिंकानसेन तकनीक लाने की वकालत की थी, तो हमारी महत्वाकांक्षा केवल मुंबई और अहमदाबाद को जोड़ने वाली रेलवे लाइन तक सीमित नहीं थी. हमने लगभग 20,000 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क की परिकल्पना की थी, जो प्रमुख शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और आर्थिक केंद्रों को जोड़ने में सक्षम हो.
इसके बाद चीन में हाई-स्पीड रेल के तेजी से विस्तार ने दिखाया कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के माध्यम से क्या हासिल किया जा सकता है. हमारा मानना था कि भारत को भी व्यक्तिगत मार्गों तक सीमित रहने के बजाय इसी तरह बड़े पैमाने पर सोचना चाहिए.
उद्देश्य उपयुक्त मार्गों पर घरेलू विमानन के लिए एक वास्तविक विकल्प तैयार करना था. भारत ऐतिहासिक रूप से वाणिज्यिक विमानन तकनीक के आयात पर काफी निर्भर रहा है. इसके विपरीत, हाई-स्पीड रेल ने सटीक इंजीनियरिंग, उन्नत विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिग्नलिंग, बुनियादी ढांचे और ट्रेन तकनीक से जुड़े व्यापक घरेलू औद्योगिक इकोसिस्टम के निर्माण का अवसर दिया.
आधुनिक हाई-स्पीड ट्रेनें व्यावसायिक रूप से लगभग 350 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल सकती हैं. भविष्य की तकनीकें इससे काफी अधिक गति की अनुमति दे सकती हैं, हालांकि इसके लिए उपयुक्त बुनियादी ढांचे, सुरक्षा प्रणालियों और आर्थिक औचित्य की आवश्यकता होगी.
उपयुक्त मार्गों पर हाई-स्पीड रेल ऊर्जा दक्षता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लाभ प्रदान करते हुए शहर से शहर तक की कुल यात्रा अवधि के मामले में विमानन को टक्कर दे सकती है. लेकिन हमारी मूल सोच में एक और बुनियादी तत्व था - इस राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सफल बनाने के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचा.
जिस तरह दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम की स्थापना एक नया औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करने के लिए की गई थी, उसी तरह हमने एक समर्पित भारत-जापान हाई-स्पीड रेलवे संस्थान की कल्पना की थी, जो पूरी तरह से नई परिवहन प्रणाली विकसित करने में सक्षम हो. इसके पास राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क तैयार करने के लिए आवश्यक स्वायत्तता, तकनीकी विशेषज्ञता, वित्तीय ढांचा और नेतृत्व होना चाहिए.
दिल्ली मेट्रो की सफलता एक महत्वपूर्ण संस्थागत सबक देती है. इसके विकास में एक समर्पित निगम, पेशेवर नेतृत्व और पारंपरिक भारतीय रेलवे से अलग परिचालन संरचना का लाभ मिला. यह भारतीय रेलवे की आलोचना नहीं है, जो एक बहुत बड़ी और आवश्यक राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाता है.
लेकिन एक विशाल पारंपरिक रेलवे नेटवर्क चलाने के लिए बनाई गई संस्था से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह उसी संस्थागत संस्कृति और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए एक बिल्कुल अलग परिवहन प्रणाली भी तैयार कर लेगी. एक नए विकास मॉडल के लिए उसी के अनुरूप संस्थानों की आवश्यकता होती है. यह केवल पुराने मॉडल का विस्तार नहीं हो सकता.
भारत पहले ही नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थापना कर चुका है, लेकिन रेलवे मंत्रालय के साथ इसके संस्थागत संबंध और इसके व्यापक कार्यक्षेत्र पर फिर से विचार करने की जरूरत है.
मेरे विचार में, हाई-स्पीड रेल कार्यक्रम के लिए कहीं अधिक स्वायत्त राष्ट्रीय संस्थान की आवश्यकता है, जिसमें भारत-जापान की स्पष्ट तकनीकी साझेदारी, स्वतंत्र पेशेवर नेतृत्व और मौजूदा मुंबई-अहमदाबाद परियोजना से आगे बढ़कर काम करने का अधिकार हो.
इसका नेतृत्व एक अनुभवी तकनीकी विशेषज्ञ को करना चाहिए, जिसे परिवहन, इंजीनियरिंग, विनिर्माण, वित्त और संस्थागत विकास के विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त हो. ऐसा संस्थान पारदर्शी जवाबदेही और पेशेवर स्वतंत्रता बनाए रखते हुए सरकार के सर्वोच्च स्तर पर सीधे रणनीतिक निगरानी के तहत काम कर सकता है.
यह राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे मास्टर प्लान विकसित कर सकता है, घरेलू तकनीकी क्षमताएं स्थापित कर सकता है, टिकाऊ वित्तपोषण तंत्र तैयार कर सकता है और चरणबद्ध नेटवर्क विस्तार का समन्वय कर सकता है. वर्तमान चर्चा अक्सर निर्माण की समयसीमा, लागत में बढ़ोतरी और अलग-अलग खंडों को चालू करने तक सीमित रहती है.
ये महत्वपूर्ण परिचालन संबंधी सवाल हैं, लेकिन बुनियादी रणनीतिक सवाल नहीं हैं. बड़ा मुद्दा यह है कि क्या हम भारत की हाई-स्पीड रेलवे महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जरूरी संस्थागत प्रणाली बना रहे हैं. अभी भी देर नहीं हुई है.
प्रधानमंत्री और सरकार द्वारा जापान के समर्थन से किया गया निर्णायक संस्थागत सुधार इस कार्यक्रम को नई राष्ट्रीय दिशा दे सकता है. हमें हाई-स्पीड रेल की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि पहली ट्रेन कब चलना शुरू करती है.
हमें यह देखना चाहिए कि क्या भारत अंततः एक आधुनिक, किफायती, तकनीकी रूप से उन्नत और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत हाई-स्पीड परिवहन प्रणाली तैयार कर पाता है.
द्विपक्षीय व्यापार से आगे
आज 2030 तक भारत-जापान द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक बढ़ाने को लेकर काफी चर्चा हो रही है. यह एक सराहनीय महत्वाकांक्षा है, लेकिन व्यापार को साझेदारी के अंतिम उद्देश्य के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए.
व्यापार आर्थिक गतिविधियों का परिणाम है. जरूरी नहीं कि यह आर्थिक बदलाव को मापने का सबसे सार्थक पैमाना हो. किसी भारतीय औद्योगिक इकोसिस्टम में जापानी निवेश कई दशकों तक रोजगार, तकनीक हस्तांतरण, घरेलू विनिर्माण, निर्यात और उत्पादकता में सुधार पैदा कर सकता है. इसका आर्थिक योगदान द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़ों में दिखाई देने वाले योगदान से कहीं अधिक हो सकता है.
हमने मूल रूप से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की पूरक क्षमताओं में तालमेल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था. जापान के पास उन्नत तकनीक, औद्योगिक क्षमताएं, वित्तीय संसाधन और संस्थागत अनुभव है. भारत के पास मानवीय क्षमता, उद्यमशीलता की ऊर्जा, एक बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था और विकास की विशाल आवश्यकताएं हैं.
जापान जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है और टिकाऊ विकास के नए स्रोत तलाश रहा है. भारत को उत्पादक रोजगार पैदा करने, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और अपनी तकनीकी एवं औद्योगिक क्षमताओं का विस्तार करने की जरूरत है. ये पूरक परिस्थितियां पारंपरिक व्यापार से कहीं आगे सहयोग का अवसर प्रदान करती हैं.
इस साझेदारी को ऐसे संस्थान बनाने चाहिए, जो जापानी उद्यमियों, वित्तीय संस्थानों और तकनीकी विकासकर्ताओं को भारतीय व्यवसायों, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और समुदायों के साथ निरंतर सहयोग में लाएं. बाजार आधारित निवेश जारी रहना चाहिए. लेकिन इसके साथ राष्ट्रीय स्तर पर सोच-समझकर प्रणाली निर्माण भी होना चाहिए.
कुछ कंपनियां स्वतंत्र रूप से किसी बाजार में प्रवेश कर सकती हैं. लेकिन पूरी तरह नया आर्थिक इकोसिस्टम बनाने में हजारों उद्यमों की भागीदारी के लिए बुनियादी ढांचे, संस्थानों, समन्वय और साझा विकास ढांचे की जरूरत होती है. बाजार सफल प्रणाली निर्माण का परिणाम होने चाहिए, उसका विकल्प नहीं.
क्वाड के विकास का अवसर
भारत-जापान वैश्विक साझेदारी का हमारा मूल दृष्टिकोण कभी भी भारत की सीमाओं तक सीमित रहने के लिए नहीं था. हमारा मानना था कि दोनों देश अंततः अपनी पूरक क्षमताओं को अफ्रीका, मध्य पूर्व, लैटिन अमेरिका और अन्य ऐसे क्षेत्रों तक ले जा सकते हैं, जिन्हें टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास की जरूरत है.
यह व्यापक सोच क्वाड की संभावनाओं के बारे में मेरी समझ को भी दिशा देती है. क्वाड में भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. क्वाड का औपचारिक राजनयिक विकास अपना अलग इतिहास रखता है, जिसमें 2004 की हिंद महासागर सुनामी के बाद सहयोग और 2007 में शुरू हुआ चतुर्भुज संवाद शामिल हैं.
लेकिन इसकी भविष्य की संभावनाएं केवल भू-राजनीतिक और समुद्री सुरक्षा संबंधी विचारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. चारों देशों के पास तकनीक, वित्त, प्राकृतिक संसाधन, शिक्षा, विनिर्माण, नवाचार और मानव पूंजी के क्षेत्र में असाधारण पूरक क्षमताएं हैं.
वे मिलकर बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए नई प्रणालियां विकसित कर सकते हैं. क्वाड पहले से ही रक्षा से आगे बढ़कर सहयोग करता है, लेकिन मेरा मानना है कि इसके सामाजिक-आर्थिक विकास के मिशन का काफी विस्तार किया जाना चाहिए.
वास्तविक सुरक्षा केवल राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करना नहीं है. इसमें लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा, रोजगार और आर्थिक अवसरों तक पहुंच सुनिश्चित करने की क्षमता भी शामिल है. भारत और जापान इस व्यापक विकास दर्शन को अंतरराष्ट्रीय सहयोग में शामिल करने में मदद कर सकते हैं.
मूल योजना की ओर लौटने का समय
भारत-जापान संबंधों के साथ लगभग तीन दशकों तक काम करने के बाद, मेरा मानना है कि अब ईमानदारी और रचनात्मकता के साथ यह आकलन करने का समय आ गया है कि हमने मूल रूप से क्या परिकल्पना की थी और क्या हासिल किया है. इंडिया सेंटर फाउंडेशन के माध्यम से हमने जो आंदोलन खड़ा किया था, वह केवल निवेश को बढ़ावा देने या राजनयिक संपर्कों तक सीमित नहीं था.
यह विचारों, संवाद और दृढ़ विश्वास का आंदोलन था, जिसका उद्देश्य दो महान देशों के बीच एक नई सामाजिक-आर्थिक साझेदारी स्थापित करना था. भारत और जापान में इस समझ को विकसित करने के लिए काफी प्रयास किए गए कि यह संबंध एक साझा उद्देश्य पर आधारित होना चाहिए: सशक्तीकरण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण. इस बौद्धिक और संस्थागत निवेश को अपना उद्देश्य नहीं खोना चाहिए.
इसलिए, मैं भारत और जापान की सरकारों से अपील करता हूं कि वे प्रमुख बुनियादी ढांचा और विकास पहलों के पीछे मौजूद मूल सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण की व्यापक समीक्षा करें. औद्योगिक गलियारों का मूल्यांकन संपूर्ण आर्थिक इकोसिस्टम तैयार करने की उनकी मूल महत्वाकांक्षा के आधार पर किया जाना चाहिए.
हाई-स्पीड रेलवे कार्यक्रम की समीक्षा केवल निर्माण परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय परिवहन और तकनीकी प्रणाली की नींव के रूप में की जानी चाहिए. साझेदारी के संस्थागत ढांचे को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि सरकारों, उद्यमियों, वित्तीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी विकासकर्ताओं और नागरिक समाज को एकीकृत किया जा सके.
हमें आर्थिक उत्पादकता, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता, मानव विकास और दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमताओं के आधार पर सफलता के स्पष्ट मानक भी स्थापित करने चाहिए. यह समीक्षा राजनीतिक आलोचना का अभ्यास नहीं बननी चाहिए. वाजपेयी और मनमोहन सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी तक, लगातार बनी रही सरकारों ने भारत-जापान संबंधों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया है.
अब काम उन योगदानों को आगे बढ़ाने और उन संस्थागत कमियों को दूर करने का है, जो हमारी महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह साकार करने में अब भी बाधा बन रही हैं. हमारे कुछ प्रयास उल्लेखनीय रूप से सफल रहे हैं. दूसरे प्रयासों से वह परिणाम नहीं मिला, जिसकी हमने मूल रूप से उम्मीद की थी. कई प्रयासों में अभी और काम करने की जरूरत है.
इसे स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है. वास्तविक विफलता सीखना बंद कर देना होगा.
अगली पीढ़ी के लिए संदेश
मैं विशेष रूप से भारत और जापान की युवा पीढ़ियों से कहना चाहता हूं कि वे समझें कि यह साझेदारी दो सरकारों के बीच संबंध या दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यावसायिक व्यवस्था से कहीं अधिक है. यह ऐसी नई प्रणालियां, उद्योग, तकनीकें और संस्थान बनाने का अवसर है, जो लाखों लोगों को सशक्त बना सकें.
भारत को केवल विनिर्माण केंद्र बनने की जरूरत नहीं है, हालांकि विनिर्माण आवश्यक बना रहेगा. हमारे भविष्य में विज्ञान, इंजीनियरिंग, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, नवाचार और अन्य उत्पादक क्षेत्रों को भी शामिल होना चाहिए. जापान को केवल पूंजी और तकनीक के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और न ही भारत को केवल बाजार या मानव संसाधन के स्रोत के रूप में.
दोनों देशों को खुद को पूरी तरह नया विकास ढांचा बनाने वाले साझेदारों के रूप में देखना चाहिए. यह ढांचा टिकाऊ, आर्थिक रूप से उत्पादक, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और मानव सशक्तीकरण पर केंद्रित होना चाहिए.
वैकल्पिक विकास मॉडल एक साझा उद्देश्य के इर्द-गिर्द विचारधारा, प्रणालियों, परियोजनाओं और उत्पादों को एक साथ लाकर इस महत्वाकांक्षा के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है. अगली पीढ़ी को इस सोच को आगे बढ़ाना चाहिए, मौजूदा मान्यताओं को चुनौती देनी चाहिए और ऐसे संस्थान बनाने चाहिए, जो उस पैमाने पर परिणाम दे सकें, जिसे हम अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं.
अधूरा मिशन
पिछली चौथाई सदी में भारत-जापान साझेदारी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि दोनों देशों के एक-दूसरे को देखने के नजरिए में बदलाव आया है. हम सीमित संवाद और अपर्याप्त जुड़ाव से आगे बढ़कर कहीं व्यापक रणनीतिक और आर्थिक संबंधों तक पहुंचे हैं.
प्रमुख बुनियादी ढांचा पहलों की परिकल्पना की गई, नए संस्थान अस्तित्व में आए और बड़ी साझेदारी की नींव रखी गई. लेकिन यात्रा अभी अधूरी है. द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे मंजिल के बजाय एक पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए. असली सवाल यह है कि क्या भारत और जापान ऐसी प्रणालियां बना रहे हैं, जो उन्हें कहीं बड़े पैमाने पर टिकाऊ आर्थिक और सामाजिक मूल्य पैदा करने में सक्षम बनाएंगी.
हमें मूल योजना की ओर लौटना चाहिए, हासिल की गई उपलब्धियों को खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि उस काम को पूरा करने के लिए जिसकी परिकल्पना की गई थी. आइए, हम अपने संस्थानों को मजबूत करें, अपने विकास गलियारों की समीक्षा करें, अपने हाई-स्पीड रेलवे ढांचे पर फिर से विचार करें और उद्यमियों, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों तथा युवाओं को नए सिरे से संवाद में शामिल करें.
हमें याद रखना चाहिए कि भारत-जापान वैश्विक साझेदारी का उद्देश्य कभी भी केवल बाजारों का विस्तार करना नहीं था. इसका उद्देश्य राष्ट्रों को सशक्त बनाना, टिकाऊ समृद्धि पैदा करना और अंततः इस सहयोग के लाभों को व्यापक दुनिया तक पहुंचाना था. मैं एक ऐसी व्यक्तिगत स्मृति के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, जो आज भी मेरे दिल के बेहद करीब है.
कई साल पहले, मेरे प्रिय मित्र और दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे, जिन्हें मैं अपना भाई मानता था, और मैंने एक बुनियादी सवाल पर चर्चा की थी, जो दोनों देशों के संबंधों में बार-बार उठता था.
भारत में लोग पूछते थे: भारत को जापान के साथ इतने करीब से काम क्यों करना चाहिए? जापान हमारे लिए इतना खास क्यों है?
जापान में भी इसी तरह के सवाल उठाए जाते थे: जापान को भारत के साथ काम क्यों करना चाहिए? भारत जापान के लिए इतना खास क्यों है?
ये जायज सवाल थे और इनके जवाब व्यापार, निवेश, कूटनीति या तत्काल राष्ट्रीय हितों से आगे बढ़कर दिए जाने जरूरी थे. हमारी चर्चाओं के दौरान, मैंने एक सरल मंत्र का प्रस्ताव रखा, जिससे शिंजो आबे सहमत थे.
इसने उस साझेदारी के सार को व्यक्त किया, जिसे बनाने का हम प्रयास कर रहे थे: “एक मजबूत जापान, एक मजबूत भारत है. एक मजबूत भारत, एक मजबूत जापान है.” यह केवल मित्रता का वक्तव्य नहीं था. यह पारस्परिक सशक्तीकरण का दर्शन था.
इसका अर्थ था कि एक देश की समृद्धि, तकनीकी प्रगति, संस्थागत मजबूती और वैश्विक प्रतिष्ठा को दूसरे देश की प्रगति और शक्ति में योगदान देना चाहिए. इसका अर्थ था कि हमारे राष्ट्रीय हितों को एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने की जरूरत नहीं है, बल्कि साझा विकास दृष्टिकोण के माध्यम से वे एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं.
इसका यह भी अर्थ था कि भारत और जापान को अपनी साझेदारी की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि प्रत्येक देश को दूसरे से क्या मिलता है, बल्कि इस आधार पर करना चाहिए कि वे अपने लोगों और पूरी मानवता के लिए मिलकर क्या बना सकते हैं. आज मेरा मानना है कि यह मंत्र पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है.
इसी विश्वास के साथ, मैं भारत और जापान के नागरिकों, युवाओं, उद्यमियों, नीति निर्माताओं और नेताओं से अपील करता हूं. आइए, हम एक बार फिर विश्वास, मित्रता और साझा उद्देश्य की उसी भावना के साथ एक साथ आएं. आइए, भारत-जापान वैश्विक साझेदारी के अधूरे मिशन को पूरा करें. आइए, हम एक-दूसरे की कीमत पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सशक्त बनाकर मजबूत संस्थान, मजबूत अर्थव्यवस्थाएं और मजबूत समाज बनाएं.
एक मजबूत जापान, एक मजबूत भारत है. एक मजबूत भारत, एक मजबूत जापान है. आने वाली पीढ़ियों के लिए यही हमारी साझा प्रतिबद्धता, हमारा मार्गदर्शक दर्शन और हमारा सामूहिक मिशन होना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld के विचारों को भी दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: विभव कांत उपाध्याय
(विभव कांत उपाध्याय इंडिया सेंटर फाउंडेशन और इंडिया जापान फाउंडेशन के अध्यक्ष तथा वैकल्पिक विकास मॉडल के संस्थापक और प्रस्तावक हैं. उन्होंने भारत-जापान संबंधों और सामाजिक-आर्थिक विकास के संस्थागत दृष्टिकोणों पर काम करते हुए लगभग तीन दशक बिताए हैं.)
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