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दो दुनियाओं के बीच जिंदगी: उथल-पुथल भरे समय की चुनौती
लेखक के अनुसार, हमारे आसपास की दुनिया उतनी नहीं बदली है, जितनी हमारे दिमाग के भीतर की दुनिया बदल गई है. लगातार आती खबरों, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाली चिंताओं के इस दौर में चुनौती है अपना ध्यान फिर से अपने नियंत्रण में लेना और उन चीजों पर फोकस करना, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 hours ago
पिछले सप्ताह मैं एक शिक्षण कार्य के सिलसिले में दिल्ली में था और मालवीय नगर मार्केट घूमने गया. दक्षिण दिल्ली के इस मध्यवर्गीय बाजार में आधुनिकता के रंगों के बीच 90 के दशक की झलक दिखाई दी. वही रंग, वही गंध और वही शोर, जो भारत के किसी भी दूसरे बाजार की पहचान हैं. बस, वहां बिकने वाली चीजें अलग हो सकती हैं. वापसी की उड़ान में मेरे एक पूर्व छात्र ने मुझे पहचान लिया और उसका पहला सवाल था, 'नौकरी के बाजार पर एआई के प्रभाव को लेकर आपकी क्या राय है?'
मुझे अपने विचारों की दिशा बदलनी पड़ी. दोपहर के प्रत्यक्ष अनुभव से निकलकर शाम को विमान में बौद्धिक सवालों के हमले का सामना करना था. मुझे कुछ आंकड़े जुटाने पड़े, ताकि मेरी बात तर्कसंगत और विश्वसनीय लगे. बातचीत को सार्थक रूप से आगे बढ़ाना भी जरूरी था, क्योंकि दिल्ली से बेंगलुरु की ढाई घंटे की यात्रा के अभी शुरुआती कुछ ही मिनट बीते थे. हमारी पूरी तरह सैद्धांतिक चर्चा, या यूं कहें कि एक के बाद एक विचारों की बौछार, किसी के कानों को अच्छी नहीं लग रही थी. शुक्र है कि एयर होस्टेस ने आकर हमें इससे राहत दिलाई. इस बीच, मैं उस खाई के बारे में सोचने को मजबूर हुआ, जो हमारे रहने वाली दुनिया और हमारे दिमाग में बसने वाली दुनिया के बीच है.
अगर आप चाहते हैं कि लोग तुरंत आपका मजाक उड़ाएं, तो किसी स्थानीय दुकानदार से एआई के दुष्प्रभावों या बुद्धिजीवियों के मन में चल रहे तमाम सवालों के बारे में पूछना शुरू कर दीजिए. क्या मैं अकेला हूं, जो हमारी रोजमर्रा की वास्तविकताओं और मीडिया (और सोशल मीडिया) से पैदा होने वाली चिंताओं के बीच बढ़ती इस खाई को देख पा रहा है? दरअसल, हम दो दुनियाओं में जी रहे हैं.
शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो, जब अशांति, आगजनी, सरकारों के गिरने और लंबे समय से जारी युद्धों की खबर न सुनाई दे. चौबीसों घंटे चलने वाले मीडिया को महज 20 मिनट देखने के बाद ही आप इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि सब कुछ खत्म हो चुका है और जीवन पूरी तरह अर्थहीन है. वैश्विक व्यापार के निर्माता ही वैश्वीकरण के अंत की घोषणा कर रहे हैं. हमें बड़े पैमाने पर रचनात्मकता के नए और चतुर उपकरण देने वाले आविष्कारक ही अब सर्वनाश की भविष्यवाणी कर रहे हैं. ऐसी खबरें, या कहें कि ऐसे विचार, हमारे जीवन के सबसे निजी और पवित्र हिस्सों तक पहुंच रहे हैं. मनोरंजन भी तीखी राय और ध्रुवीकरण के बीज से बच नहीं पा रहा है. जब तक आप अखबारों, न्यूज चैनलों, सोशल मीडिया और ऐसी ही दूसरी चीजों में डूबे रहते हैं, तब तक यही आपकी दुनिया है. लेकिन जैसे ही आप अपना ध्यान आसपास की दुनिया की ओर ले जाते हैं, आपको पता चलता है कि उसमें शायद ही कोई बदलाव आया है.
हमारी रोजमर्रा की जद्दोजहद अब भी लगभग वैसी ही है. दैनिक दिनचर्या और छोटी-छोटी अनगिनत परेशानियां तकनीक के जादुई छड़ी घुमाने भर से गायब नहीं हो जातीं. जरा सोचिए, तकनीक ने आपका कितना समय बचाया है, ताकि आप अपना कोई पुराना शौक फिर से अपना सकें या किसी पुराने दोस्त को फोन कर सकें? अगर तकनीक आपको थोड़ी राहत देती भी है, तो वह आपके सामने ऐसे दस रास्ते खोल देती है, जिनमें आपकी बैंडविड्थ और समय खपने लगते हैं. नतीजा यह होता है कि आप जल्द ही परेशान हो जाते हैं. खासकर सूचना प्रौद्योगिकी, जिसने दुनिया को छोटा कर दिया है, दूर कहीं ऑनलाइन होने वाली किसी घटना पर भी वैसी ही तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करती है, जैसे आप खुद उसके शिकार हों. एक तरह से आप खुद ही इसे अपनी जिंदगी में जगह देकर इसके शिकार बन जाते हैं.
मैं अब भी ऐसे दुकानदारों से सब्जियां खरीदता हूं, जिनकी धार्मिक पहचान में मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं है. मैं बिना किसी तकनीक, यहां तक कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के किसी इस्तेमाल के बिना बाल कटवाता हूं. मैं आज भी ऐसे पार्क में जाता हूं, जहां वैसे ही झूले और फिसलपट्टियां हैं, जिन पर बचपन में खेला करता था. और मैं अब भी उन्हीं तरह की चिंताओं से जूझ रहा हूं, जो मेरे परदादा-परदादाओं को परेशान करती थीं. शब्दावली बदल गई है, लेकिन परेशानियां नहीं बदली हैं. बाहरी दुनिया में हुई तमाम प्रगति भी हमारे भीतर की चिंताओं को कम नहीं कर पाई है. यही वजह है कि ऑनलाइन सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सामग्री में आत्म-सहायता, आध्यात्मिकता और इस तरह के विषय शामिल हैं.
इन दोनों दुनियाओं को समझना बेहद जरूरी है: वह दुनिया जिसमें आप रहते हैं और वह दुनिया जो आपके दिमाग में रहती है. जिस दुनिया में आप रहते हैं, वह वास्तव में उतनी नहीं बदली है, जितना आप सोचते हैं. आपकी दिनचर्या अब भी काफी हद तक वैसी ही है. आपके खान-पान की आदतें, पहनावा, मनोरंजन के तरीके, शिष्टाचार और बुरी आदतें भी लगभग वैसी ही हैं. लेकिन आपके दिमाग में रहने वाली दुनिया हर इंस्टाग्राम रील, चौंकाने वाली हेडलाइन या एआई से तैयार की गई तस्वीर के साथ बदलती और दूषित होती रहती है. हर बात की जानकारी रखने की आपकी चाहत वास्तविक दुनिया से आपका समय और ध्यान छीन रही है. इससे भी बुरी बात यह है कि यह वास्तविकता को देखने के आपके नजरिए को बदल रही है.
अगर आप पेरिस या गाजा, होर्मुज जलडमरूमध्य या जंतर-मंतर पर क्या हो रहा है, इसकी पुष्टि करने की कोशिश किए बिना अपनी दुनिया में रह सकें और इसके बजाय अपने घर, अपनी जिम्मेदारियों और अपने रोजमर्रा के व्यवहार पर ध्यान दें, तो आपको एहसास होगा कि हालात उतने खराब नहीं हैं, जितने उन्हें दिखाया जा रहा है.
अपने ध्यान पर ध्यान देने की क्षमता आज पहले से कहीं ज्यादा मूल्यवान हो गई है. अब समय आ गया है कि आप अपनी 'चिंता के दायरे' को छोटा करें और कम से कम चीजों की परवाह करें. ऐसा इस हद तक करें कि आपका 'प्रभाव का दायरा' आपकी चिंताओं से मेल खाने लगे. इससे आप असहाय महसूस करने से बच सकेंगे. इसे अधिक सटीक रूप से कहें, तो आप उस सीखी हुई असहायता से खुद को बचा सकेंगे, जिसमें व्यक्ति यह मानने लगता है कि वह कुछ नहीं कर सकता.
मुझे उम्मीद है कि आप समझेंगे कि आप अब भी ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जिसे अपनी पसंद के मुताबिक बना सकते हैं. आप उस दुनिया में जीने के लिए बाध्य नहीं हैं, जिसे दूसरे लोगों ने आपके दिमाग में बदलकर रख दिया है. बुनियादी चीजों की ओर लौटिए, क्योंकि चीजें ठीक ही चल रही हैं.
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को भी दर्शाते हों.
अतिथि लेखक: डॉ. पवन सोनी
(डॉ. पवन सोनी तीन पुस्तकों 'डिजाइन योर थिंकिंग', 'डिजाइन योर करियर' और 'एवरीडे क्रिएटिविटी' के बेस्टसेलिंग लेखक हैं.)
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