होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / समुद्र मंथन का अर्थशास्त्र: समृद्धि के लिए विरोधी शक्तियों की जरूरत क्यों है
समुद्र मंथन का अर्थशास्त्र: समृद्धि के लिए विरोधी शक्तियों की जरूरत क्यों है
लेखिका प्रियंका शर्मा कैंतुरा इस लेख में बताती हैं कि देवताओं, असुरों और लक्ष्मी के प्राकट्य की प्राचीन कथा प्रतिस्पर्धा, सहयोग और धन सृजन के बारे में क्या सीख देती है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
प्रियंका शर्मा कैंतुरा
हर दिवाली, लाखों घरों और कारोबारी प्रतिष्ठानों में धन, सौभाग्य और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है. हम उनका आशीर्वाद मांगते हैं, अपने आसपास रोशनी करते हैं और प्रचुरता की उम्मीद के साथ त्योहार मनाते हैं. लेकिन लक्ष्मी के प्राकट्य की परिस्थितियों में एक असाधारण बात छिपी है, जो स्वयं देवी के समान ही ध्यान देने योग्य है.
लक्ष्मी का प्राकट्य समुद्र मंथन से हुआ था, जो ब्रह्मांडीय महासागर का महान मंथन था. और यह मंथन केवल देवताओं ने नहीं किया था, बल्कि देवताओं और उनके चिर प्रतिद्वंद्वियों, असुरों के बीच एक अप्रत्याशित सहयोग से संभव हुआ था.
समृद्धि के लिए दो विरोधी शक्तियों की भागीदारी क्यों जरूरी थी? और दोनों में से कोई भी इस कार्य को अकेले क्यों पूरा नहीं कर सकता था?
इसका उत्तर आधुनिक अर्थव्यवस्था में भी धन के सृजन, वितरण और उसे बनाए रखने की प्रक्रिया को समझने का एक दिलचस्प तरीका प्रस्तुत करता है.
क्या असुर वास्तव में खलनायक थे?
पौराणिक कथाओं के लोकप्रिय वर्णनों में देवताओं को अक्सर अच्छाई का प्रतिनिधित्व करने वाले दिव्य प्राणियों और असुरों को बुराई का प्रतिनिधित्व करने वाले दानवीय प्राणियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन यह सुविधाजनक विभाजन उनकी भूमिकाओं और एक-दूसरे के साथ उनके संबंधों की जटिलता के साथ न्याय नहीं करता.
सबसे पहले, उनकी वंशावली एक ही है. पुराणों के अनुसार, महर्षि कश्यप ने दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियों से विवाह किया था. इनमें अदिति, दिति और दनु शामिल थीं. इंद्र सहित आदित्य, जिन्हें देवता भी कहा जाता है, अदिति के वंशज थे; दैत्य दिति से और दानव दनु से उत्पन्न हुए. ये दोनों वंश व्यापक रूप से असुरों के रूप में पहचाने जाते हैं. इस प्रकार, एक-दूसरे का बार-बार सामना करने वाले कई देवता और असुर एक ही विस्तृत परिवार से संबंधित हैं.
उनके बीच प्रतिद्वंद्विता लगातार बनी रहती है, लेकिन पौराणिक कथाओं में किसी भी पक्ष को हमेशा नैतिक रूप से सही या गलत नहीं दिखाया गया है. इंद्र का अहंकार उन्हें बार-बार मुश्किलों में डालता है. असुर वंश में जन्मे प्रह्लाद भगवान विष्णु के प्रति अपनी अटूट भक्ति के लिए पूजनीय हैं. उनके पौत्र महाबली को उनकी उदारता और दृढ़ता के लिए याद किया जाता है. स्पष्ट है कि सद्गुण और दुर्गुण के बीच कोई सरल विभाजन नहीं है, जो देवताओं और असुरों को अलग-अलग खांचों में बांट सके.
देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं, जबकि असुरों का मार्गदर्शन शुक्राचार्य करते हैं. दोनों पक्षों के पास ज्ञान, महत्वाकांक्षा और असाधारण क्षमताएं हैं. फिर भी, सत्ता और संपत्ति को लेकर उनके दृष्टिकोण अक्सर उन्हें संघर्ष की ओर ले जाते हैं.
अपनी पुस्तक महादेवी - द अनसीन ट्रुथ बिहाइंड एग्जिस्टेंस में मैंने इस संबंध को एक अलग दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया है. इसमें असुरों को अंतर्ज्ञान, जुनून और संरक्षण की शक्तियों के रूप में, जबकि देवताओं को तर्क, अर्जन और उत्पादक गतिविधियों की शक्तियों के रूप में देखा गया है.
असुरों से परंपरागत रूप से जुड़ा स्थान पाताल लोक है, जो धरती के नीचे स्थित लोक है. मानव समृद्धि को संभव बनाने वाली बहुत-सी चीजें भी धरती की सतह के नीचे मौजूद हैं. खनिज, धातुएं, जीवाश्म ईंधन और बहुमूल्य रत्न तब तक छिपे रहते हैं, जब तक कोई शक्ति उन्हें उपयोगी बनाने के लिए बाहर नहीं लाती. यहां तक कि बीज को भी फसल बनने से पहले मिट्टी की सुरक्षा छोड़नी पड़ती है.
इस व्याख्या के अनुसार, असुर संसाधनों को अपने पास रखते हैं और उनकी रक्षा करते हैं. वे अपने अधिकार क्षेत्र में मौजूद चीजों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर, देवता उन संसाधनों को निकालने, उनका रूपांतरण करने और उपयोग में लाने का प्रयास करते हैं. एक पक्ष उन्हें बाहर आने से रोकता है, जबकि दूसरा उन्हें प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करता है.
यही संघर्ष दुनिया के लिए संपदा को उपलब्ध कराता है. दोनों में से कोई भी शक्ति अनावश्यक नहीं है.
यह निश्चित रूप से इस कथा की एक दार्शनिक व्याख्या है, न कि पुराणों द्वारा निर्धारित कोई शाब्दिक आर्थिक वर्गीकरण. लेकिन यह एक दिलचस्प सवाल उठाती है: क्या एक-दूसरे के विपरीत काम करने वाली शक्तियों के बीच परस्पर क्रिया के बिना धन का सृजन संभव है?
समुद्र को दोनों पक्षों की जरूरत क्यों पड़ी?
समुद्र मंथन की परिस्थितियां इस संबंध में महत्वपूर्ण संकेत देती हैं.
देवताओं के राजा इंद्र ने ऋषि दुर्वासा का अपमान करके उनका क्रोध मोल ले लिया था. इसके परिणामस्वरूप मिले श्राप ने देवताओं की शक्ति और समृद्धि छीन ली, जिससे वे असुरों के सामने कमजोर पड़ गए.
देवताओं ने सहायता के लिए भगवान विष्णु का रुख किया. उनका समाधान एक और युद्ध करना नहीं था. इसके बजाय, उन्होंने देवताओं को अपने विरोधियों से सहयोग मांगने और अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर का मंथन करने की सलाह दी.
मंदराचल पर्वत मथानी बना, सर्प वासुकि ने रस्सी का काम किया और जब पर्वत डूबने लगा, तो भगवान विष्णु ने अपने कूर्म अवतार में उसे सहारा दिया.
देवताओं और असुरों ने विपरीत दिशाओं से रस्सी खींची. इस प्रसंग की सबसे उल्लेखनीय बात यही है. सत्ता और संपत्ति के लिए लड़ने वाले वही प्रतिद्वंद्वी अब एक साझा उद्देश्य के लिए काम करने को मजबूर थे. दोनों में से कोई भी अकेले मनचाहा परिणाम प्राप्त नहीं कर सकता था. महत्वाकांक्षा के मामले में वे प्रतिस्पर्धी थे, लेकिन काम को पूरा करने में भागीदार थे.
मंथन से तुरंत वे खजाने नहीं निकले, जिनकी उन्हें तलाश थी. सबसे पहले हलाहल नामक भयानक विष निकला, जिससे समस्त सृष्टि के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया. भगवान शिव ने हस्तक्षेप करके उस विष को अपने भीतर धारण किया. मंथन जारी रहने पर ही समुद्र से असाधारण संपदाएं निकलीं, जिनमें लक्ष्मी भी शामिल थीं. बाद में लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना.
इस क्रम का महत्व है. समृद्धि स्थिरता, केवल संपत्ति पर अधिकार या बिना प्रयास मिली जीत से पैदा नहीं हुई. वह एक कठिन प्रक्रिया के बाद सामने आई, जिसमें प्रतिद्वंद्विता, सहयोग, जोखिम, हस्तक्षेप और निरंतर प्रयास शामिल थे.
विरोधी शक्तियों का कारोबार
आधुनिक कारोबार में भी इसी तरह के तनाव देखने को मिलते हैं.
प्रतिस्पर्धा कंपनियों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने, कार्यकुशलता बढ़ाने और पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती देने के लिए प्रेरित करती है. वहीं, सहयोग उन्हें ऐसा बुनियादी ढांचा, मानक और नेटवर्क तैयार करने में मदद करता है, जिनके बिना पूरे उद्योगों का काम करना मुश्किल हो सकता है.
डिजिटल भुगतान इसका एक उदाहरण है. बैंक, भुगतान कंपनियां, व्यापारी और प्रौद्योगिकी प्रदाता ग्राहक, लेनदेन और बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. लेकिन भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) साझा प्रोटोकॉल, आपसी अनुकूलता और एक साझा संस्थागत ढांचे पर निर्भर करता है. भागीदार ग्राहक हासिल करने के लिए भले ही जोरदार प्रतिस्पर्धा करें, लेकिन इस व्यवस्था को चलाने के लिए समन्वय जरूरी है.
यह एक सरल सिद्धांत को दर्शाता है: प्रतिस्पर्धा बाजार के भीतर मूल्य पैदा कर सकती है, जबकि सहयोग बाजार के निर्माण में मदद कर सकता है.
यह सिद्धांत केवल प्रतिस्पर्धी कंपनियों तक सीमित नहीं है.
निवेशकों और उद्यमियों को एक-दूसरे की जरूरत होती है, भले ही उनकी प्राथमिकताएं काफी अलग हों. निवेशक लाभ और वित्तीय अनुशासन चाहते हैं, जबकि उद्यमियों को पूंजी, प्रयोग करने की स्वतंत्रता और कारोबार खड़ा करने के लिए समय चाहिए. नियोक्ता कर्मचारियों के कौशल और प्रतिबद्धता पर निर्भर करते हैं. वहीं, कर्मचारी अपने कौशल के लिए उचित वेतन, प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करने वाली सुरक्षा और आगे बढ़ने के अवसर चाहते हैं.
उत्पादकों को बाजार तक पहुंचने के लिए वितरकों की जरूरत होती है, जबकि वितरक उन तक बाजार पहुंचाने के लिए भरोसेमंद उत्पाद और व्यावहारिक लाभ मार्जिन चाहते हैं. नवोन्मेषक संभावनाओं की सीमाओं को आगे बढ़ाते हैं, जबकि नियामकों को सुरक्षा, जवाबदेही और जनहित पर विचार करना होता है. यहां तक कि खरीदार और विक्रेता भी किसी सौदे को विपरीत दिशाओं से देखते हैं. एक उचित कीमत पर मूल्य चाहता है, जबकि दूसरा ऐसा प्रतिफल चाहता है जो उसके लिए फायदेमंद हो.
उनके हित हमेशा एक जैसे नहीं होते. इससे कठिन बातचीत, असहमति और कभी-कभी टकराव भी पैदा हो सकता है. लेकिन यही परिस्थितियां प्रत्येक पक्ष को अपनी सीमाएं समझने, अपने प्रस्ताव में सुधार करने और ऐसे समझौतों तक पहुंचने के लिए प्रेरित करती हैं, जो आर्थिक गतिविधियों को संभव बनाते हैं.
जिस अर्थव्यवस्था में हर कोई केवल अपने मौजूदा लाभ को बनाए रखने का प्रयास करता है, वहां ठहराव का खतरा होता है. वहीं, जिस अर्थव्यवस्था में हर कोई बिना किसी नियंत्रण के विस्तार करना चाहता है, वहां अस्थिरता पैदा होने का जोखिम रहता है.
न तो केवल संरक्षण पर्याप्त है और न ही केवल बदलाव. चुनौती इन दोनों के बीच परस्पर क्रिया को उत्पादक बनाना है.
संपत्ति का मालिक होना और धन पैदा करना एक बात नहीं
समुद्र मंथन का एक और पहलू ध्यान देने योग्य है. मंथन शुरू होने से पहले ही समुद्र के भीतर खजाने मौजूद थे. लेकिन केवल उनके मौजूद होने से वे पूरी सृष्टि के लिए उपलब्ध या उपयोगी नहीं हो गए थे.
उन्हें बाहर लाने के लिए कुछ करना जरूरी था.
पहले की गई व्याख्या के अनुसार, संसाधनों को अपने पास बनाए रखने की असुरों की प्रवृत्ति और उनका उत्पादक उपयोग करने का देवताओं का संकल्प उस तनाव को जन्म देते हैं, जिसके माध्यम से निष्क्रिय संपदा धन में बदलती है.
यही अंतर अर्थव्यवस्थाओं में धन के सृजन की प्रक्रिया के केंद्र में है.
किसी खनिज भंडार का संभावित मूल्य हो सकता है, लेकिन उसे उपयोगी सामग्री में बदलने के लिए तकनीक, श्रम, पूंजी, बुनियादी ढांचे और उद्यम की जरूरत होती है. कृषि भूमि में अपार उत्पादन क्षमता हो सकती है, लेकिन उसका उत्पादन खेती, पानी, ज्ञान और बाजार तक पहुंच पर निर्भर करता है. कोई आविष्कार कितना भी शानदार क्यों न हो, वह व्यापक आर्थिक मूल्य तभी पैदा करता है, जब उसे विकसित किया जा सके, उसका उत्पादन हो और लोग उसे अपनाएं.
संसाधन और समृद्धि एक ही चीज नहीं हैं. न ही केवल संसाधनों को निकाल लेना समृद्धि की गारंटी देता है. इसी तरह, धन कमाने की कोशिश उन संसाधनों की सीमाओं की अनदेखी नहीं कर सकती, जिन पर यह निर्भर है. अत्यधिक दोहन, प्राकृतिक भंडारों का क्षय, संस्थागत क्षमता के बिना विस्तार या दीर्घकालिक व्यवहार्यता की कीमत पर अल्पकालिक लाभ हासिल करना भविष्य की समृद्धि की बुनियादी स्थितियों को कमजोर कर सकता है.
इसलिए, उत्पादक उपयोग के बिना संरक्षण संभावनाओं को अधूरा छोड़ सकता है, जबकि संरक्षण के बिना उत्पादन भविष्य के धन के स्रोत को समाप्त कर सकता है. लिहाजा, विरोधी शक्तियों को केवल संघर्ष करने से आगे बढ़ना होगा. उन्हें एक व्यावहारिक संबंध स्थापित करना होगा.
एक सफल अर्थव्यवस्था को ऐसे लोगों की जरूरत होती है, जो खोज करते हैं और सृजन करते हैं; जो संरक्षण और सुरक्षा करते हैं; जो स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती देते हैं; और जो यह सुनिश्चित करते हैं कि बदलाव की प्रक्रिया में मूल्यवान चीजें नष्ट न हों.
सवाल यह नहीं है कि किस शक्ति को हमेशा के लिए विजयी होना चाहिए, बल्कि यह है कि उनके प्रतिस्पर्धी उद्देश्यों से ऐसा परिणाम कैसे निकाला जाए, जिसे कोई भी अकेले हासिल नहीं कर सकता.
और विष का बोझ कौन उठाता है?
हलाहल का प्राकट्य इस चर्चा में एक अधिक असहज पहलू जोड़ता है. मंथन से असाधारण पुरस्कार मिलने की उम्मीद थी. लेकिन उन पुरस्कारों के सामने आने से पहले ही ऐसा खतरा पैदा हुआ, जिसे देवता और असुर, दोनों मिलकर भी नियंत्रित नहीं कर सके.
भगवान शिव को हस्तक्षेप करके उस विष को अपने भीतर धारण करना पड़ा.
इस प्रसंग में आधुनिक कारोबार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल छिपा है: जब आर्थिक गतिविधियां धन के साथ नुकसान भी पैदा करती हैं, तो लाभ किसे मिलता है और उसके परिणामों का बोझ कौन उठाता है?
उद्योग रोजगार, नवाचार, बुनियादी ढांचा और संपदा पैदा करते हैं. वे प्रदूषण, कचरा, असुरक्षित कार्य परिस्थितियां और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी पैदा कर सकते हैं. अलग-अलग क्षेत्रों और कारोबारों में इन परिणामों की प्रकृति और स्तर अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल सवाल महत्वपूर्ण बना रहता है.
यदि उद्यम से होने वाला लाभ कुछ लोगों को मिले, जबकि उसकी लागत दूसरों पर डाल दी जाए, तो क्या उस समृद्धि को वास्तव में टिकाऊ कहा जा सकता है? यह कथा कोई तैयार आर्थिक नीति प्रस्तुत नहीं करती. न ही शिव के हस्तक्षेप को इस उम्मीद के रूप में देखना चाहिए कि सामूहिक महत्वाकांक्षा के परिणामों का बोझ हमेशा कोई दूसरा उठाता रहेगा.
इसके बजाय, यह हमें याद दिलाती है कि धन का सृजन और उसके परिणामों का प्रबंधन एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते. विष भी मंथन का ही परिणाम था.
समृद्धि का विरोधाभास
समुद्र मंथन का एक और असहज पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
असुरों ने मंथन में अपनी शक्ति और श्रम का योगदान दिया, फिर भी उन्हें वह अमृत नहीं मिला, जिसे तैयार करने में उन्होंने मदद की थी. भागवत पुराण में वर्णन है कि भगवान विष्णु मोहिनी का रूप धारण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि अमृत केवल देवताओं को मिले.
आर्थिक सहयोग के नजरिए से देखें, तो यह एक कठिन सवाल उठाता है: क्या धन के सृजन में भागीदारी करने से उसके लाभों में उचित हिस्सा मिलना सुनिश्चित हो जाता है? हमेशा नहीं. कारोबार में मूल्य अक्सर कई भागीदारों के योगदान से पैदा होता है, लेकिन उस मूल्य का लाभ किसे मिलता है, यह केवल योगदान पर निर्भर नहीं करता. स्वामित्व, मोलभाव करने की शक्ति, बाजार तक पहुंच और निर्णयों पर नियंत्रण जैसे कारक यह तय कर सकते हैं कि अंततः लाभ किसे मिलेगा.
इसलिए समुद्र मंथन केवल सहयोग का उत्सव नहीं है. देवताओं और असुरों ने अपनी प्रतिद्वंद्विता कभी समाप्त नहीं की. वे इसलिए एक साथ आए, क्योंकि दोनों को इस प्रयास से लाभ मिलने की उम्मीद थी और कोई भी इसे अकेले पूरा नहीं कर सकता था. उनके हित एक जगह मिले, जबकि उनकी महत्वाकांक्षाएं एक-दूसरे के विपरीत बनी रहीं.
यही जटिलता इस कथा को दोबारा देखने लायक बनाती है. समृद्धि अपने आप उसमें भाग लेने वालों को उदार, नैतिक या बुद्धिमान नहीं बना देती. और धन के सृजन में सहयोग करने से उसके बंटवारे में निष्पक्षता की गारंटी भी नहीं मिलती.
शायद यही इस कथा का सबसे दिलचस्प आर्थिक संदेश है.
दोनों पक्ष अमृत चाहते थे. उनमें से किसी ने विशेष रूप से लक्ष्मी को प्रकट करने के उद्देश्य से मंथन नहीं किया था. फिर भी, उनके संयुक्त प्रयास से ऐसी संपदा सामने आई, जिसका महत्व उनकी तात्कालिक महत्वाकांक्षाओं से कहीं अधिक व्यापक था.
इस दिवाली, जब हम लक्ष्मी का स्वागत करें, तो शायद हमें यह याद रखना चाहिए कि उनका प्राकट्य साझा आदर्शों या उदारता से नहीं, बल्कि परस्पर प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाओं की खोज से हुआ था. देवता और असुर अपने लिए अमृत चाहते थे. लेकिन उनके संयुक्त प्रयास से जो सामने आया, वह व्यापक संसार के लिए समृद्धि लेकर आया.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld के विचारों को भी दर्शाते हों.)
अतिथि लेखिका: प्रियंका शर्मा कैंतुरा
(प्रियंका शर्मा कैंतुरा एक लेखिका, वक्ता और ब्रांड, प्रतिष्ठा, बदलाव, संस्कृति एवं संचार के क्षेत्र में विशेषज्ञ हैं. उन्होंने महादेवी – द अनसीन ट्रुथ बिहाइंड एग्जिस्टेंस और माई जिफीज – नैरेशन ऑफ मोमेंट्स अनअडल्टरेटेड एंड अनपैकेज्ड पुस्तकें लिखी हैं. इन पुस्तकों में पौराणिक कथाओं और सामाजिक विषयों की पड़ताल के लिए उन्हें सराहना मिली है.
उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी पुरस्कार 2023 और टाइम्स पावर आइकन 2018 सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. वह मिथक और पौराणिक कथाओं के बीच अंतर स्पष्ट करने तथा सार्थक संवाद को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. प्रियंका प्रमुख प्रकाशनों के लिए लेखन करती हैं और शैक्षणिक एवं साहित्यिक मंचों पर वक्ता के रूप में भी अपनी भागीदारी निभाती हैं.)
टैग्स