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RBI ने बैंकिंग सिस्टम में डाले ₹2.5 लाख करोड़, SBI रिसर्च ने मौद्रिक नीति के रुख पर उठाए सवाल
SBI रिसर्च के मुताबिक, आरबीआई की ओर से नकदी डालने और मौद्रिक सख्ती की रणनीति एक-दूसरे से मेल नहीं खाती. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची बनी रह सकती है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति और नकदी प्रबंधन के बीच विरोधाभास नजर आ रहा है. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक ने एक ओर मौद्रिक नीति के तहत धीरे-धीरे सख्ती बरतने का रुख अपनाया है, वहीं दूसरी ओर बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली है. इससे आरबीआई की नीतिगत रणनीति की निरंतरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
23 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी ताजा Ecowrap रिपोर्ट में एसबीआई रिसर्च ने कहा कि अक्टूबर की मौद्रिक नीति में आरबीआई के संचार में अगस्त के मुकाबले अधिक स्पष्टता और एकरूपता दिखी है. हालांकि, नकदी प्रबंधन के लिए उठाए गए कदमों ने केंद्रीय बैंक के मौद्रिक रुख को लेकर असमंजस पैदा किया है.
अक्टूबर की मौद्रिक नीति में दिखी एकरूपता
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अगस्त में मौद्रिक नीति से जुड़े दस्तावेज, आरबीआई गवर्नर का बयान और मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स अलग-अलग संकेत देते नजर आए थे. इसके विपरीत, अक्टूबर की नीति में इन तीनों के संदेश अपेक्षाकृत एकसमान रहे.
अक्टूबर की मौद्रिक नीति के प्रस्ताव में महंगाई को लेकर अधिक सख्त रुख अपनाया गया. इसमें कहा गया कि महंगाई की स्थिति अब पहले जैसी अनुकूल नहीं है और नीतिगत रुख में बदलाव की जरूरत है. मौद्रिक नीति समिति के सभी छह सदस्यों ने नीतिगत दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी करने का समर्थन किया.
हालांकि, एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, समिति के छह में से चार सदस्य ही मौद्रिक नीति में संतुलित और चरणबद्ध सख्ती के रुख के पक्ष में थे, जबकि दो सदस्य तटस्थ रुख बनाए रखने के पक्षधर थे.
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई गवर्नर के बयान में महंगाई संबंधी चिंताओं के साथ आर्थिक वृद्धि, वित्तीय स्थिरता और बाहरी आर्थिक सुरक्षा को भी महत्व दिया गया. वहीं, बैठक के मिनट्स में सदस्यों के बीच महंगाई की उम्मीदों, लागत बढ़ने का असर कीमतों पर पड़ने और भविष्य में ब्याज दरों की दिशा को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए.
₹2.5 लाख करोड़ की नकदी डालने पर सवाल
एसबीआई रिसर्च ने आरबीआई के नकदी प्रबंधन को लेकर चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक खुले बाजार परिचालन (OMO) और वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी जैसे उपायों के जरिए नकदी की स्थिति को नियंत्रित कर रहा था. इसके बावजूद 19 अक्टूबर से आरबीआई ने तीन रेपो परिचालन के जरिए बैंकिंग सिस्टम में कुल 2.5 लाख करोड़ रुपये डाले.
रिपोर्ट में कहा गया कि यह कदम मौद्रिक सख्ती के घोषित रुख से पूरी तरह मेल नहीं खाता. एसबीआई रिसर्च ने सवाल उठाया कि क्या आरबीआई अब 'चरणबद्ध सख्ती' से हटकर अपेक्षाकृत नरम रुख की ओर बढ़ रहा है.
रिसर्च टीम ने माना कि वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चिंताओं के कारण केंद्रीय बैंक को नकदी डालने की जरूरत महसूस हुई होगी. हालांकि, उसका तर्क है कि नकदी प्रबंधन के तहत एक साथ नकदी डालने और निकालने की रणनीति बाजार के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है.
एसबीआई रिसर्च ने नकदी समायोजन सुविधा (LAF) के कॉरिडोर को व्यापक बनाने की अपनी सिफारिश भी दोहराई. रिपोर्ट के मुताबिक, इससे अनिश्चितता के दौर में नकदी प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
सरकारी बॉन्ड पर यील्ड ऊंची रहने की आशंका
एसबीआई रिसर्च का मानना है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आने के बावजूद भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-sec) की यील्ड में बड़ी कमी की संभावना सीमित है. रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड का ऊपरी स्तर करीब 7.6 फीसदी रह सकता है.
रिपोर्ट में भारतीय और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड के बीच करीब 250 आधार अंकों के अंतर का भी उल्लेख किया गया है. यह अंतर धीरे-धीरे सामान्य स्तर की ओर बढ़ रहा है.
हालांकि, एसबीआई रिसर्च ने आगाह किया कि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हालिया गिरावट अस्थायी साबित हो सकती है. अमेरिका में सरकारी बॉन्ड की नीलामी का कैलेंडर और लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी इस दिशा को प्रभावित कर सकती है.
रिपोर्ट में अमेरिका के 20 साल की अवधि वाले ट्रेजरी बॉन्ड की हालिया नीलामी का भी जिक्र किया गया. इसमें कट-ऑफ यील्ड 5.47 फीसदी रही, जबकि बिड-टू-कवर अनुपात 2.73 दर्ज किया गया. यह बॉन्ड के लिए निवेशकों की अच्छी मांग का संकेत देता है.
इसके अलावा, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी भारतीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट की गुंजाइश सीमित कर सकती हैं. तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई और देश के बाहरी संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका असर बाजार की धारणा पर पड़ सकता है.
रुपये में निचले स्तर से करीब 2 फीसदी की रिकवरी
एसबीआई रिसर्च ने रुपये की चाल का भी आकलन किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 20 मई को 96.8 रुपये प्रति डॉलर के निचले स्तर पर पहुंचने के बाद रुपये में करीब 2 फीसदी की मजबूती आई है. हालांकि, 31 मार्च 2026 के स्तर की तुलना में रुपया अब भी करीब 0.1 फीसदी कमजोर है.
रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है. ऐसे माहौल में आरबीआई के लिए महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाए रखना अहम होगा.
दूसरी तिमाही में 7.5 फीसदी GDP ग्रोथ का अनुमान
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.5 फीसदी रहने की संभावना है. हालांकि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बनी रह सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई की अक्टूबर की मौद्रिक नीति में महंगाई को लेकर चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई दी. साथ ही, बाहरी स्थिरता पर जोर से यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले जोखिमों को भी ध्यान में रख रहा है.
एसबीआई रिसर्च का निष्कर्ष है कि मौद्रिक नीति के संचार में स्पष्टता और एकरूपता सकारात्मक है, लेकिन नकदी प्रबंधन के कदम केंद्रीय बैंक के सख्त मौद्रिक रुख को समझने में बाजार के सामने चुनौती पैदा कर सकते हैं. रिपोर्ट एसबीआई की आर्थिक शोध टीम का आकलन है और इसे भारतीय स्टेट बैंक का आधिकारिक नीतिगत बयान नहीं माना जाना चाहिए.
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