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भारत की ग्रीन एनर्जी को चाहिए मजबूत ग्रिड, सस्ती बैटरी और घरेलू तकनीक
REI एक्सपो और द बैटरी शो इंडिया में 1,080 से अधिक प्रदर्शक और 1,400 वैश्विक ब्रांड शामिल, ऊर्जा भंडारण, घरेलू विनिर्माण और ग्रिड की क्षमता बढ़ाने पर जोर
रितु राणा 2 hours ago
भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस राह में बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, बैटरी स्टोरेज और घरेलू तकनीक का विकास बड़ी चुनौतियां हैं. सीएसटीईपी इंडिया के कार्यकारी निदेशक डॉ. जय असुंडी ने बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में कहा कि स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ रिसर्च, तकनीकी विकास और ऊर्जा भंडारण पर भी ध्यान देना जरूरी है.
ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो मार्ट में 22 से 24 अक्टूबर तक आयोजित रिन्यूएबल एनर्जी इंडिया (REI) एक्सपो, द बैटरी शो इंडिया (TBSI) और एनर्जी स्टोरेज समिट इंडिया में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो रही है. इन कार्यक्रमों में 1,080 से अधिक प्रदर्शक, 1,400 वैश्विक ब्रांड और 54,000 से अधिक उद्योग पेशेवर हिस्सा ले रहे हैं. भारत के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए अब बड़ी चुनौती केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसकी निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना, ऊर्जा का भंडारण करना और बैटरी तकनीक के क्षेत्र में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना भी है.
ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार बड़ी चुनौती
सीएसटीईपी इंडिया के कार्यकारी निदेशक डॉ. जय असुंडी ने बिजनेसवर्ल्ड से बातचीत में कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना एक बड़ी चुनौती है. पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में बदलाव हुए हैं, लेकिन मौजूदा जरूरतों के मुकाबले ये पर्याप्त नहीं हैं. जिन क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है, वहां से बिजली को दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार करना जरूरी है.
असुंडी के मुताबिक, मौजूदा बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने में समय लगता है. इसके लिए राइट ऑफ वे (Right of Way) की मंजूरी, पर्याप्त श्रमबल और अन्य संसाधनों की आवश्यकता होती है. ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ट्रांसमिशन व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि उत्पादित बिजली को जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सके.
भारत में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है. लेकिन इन स्रोतों से बिजली का उत्पादन हर समय एक समान नहीं रहता. ऐसे में मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण की व्यवस्था बिजली आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है.
बैटरी तकनीक में रिसर्च से घटेगी आयात पर निर्भरता
असुंडी ने कहा कि बैटरी तकनीक के क्षेत्र में भारत को रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. इससे बैटरियों की लागत कम करने, उनकी क्षमता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है. इसके लिए भारतीय शोधकर्ताओं और कंपनियों को नई बैटरी तकनीकों, वैकल्पिक केमिस्ट्री और स्वदेशी समाधानों के विकास पर काम करना होगा.
भारत अभी भी बैटरी निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई तरह के कच्चे माल के आयात पर निर्भर है. इस निर्भरता को कम करने और घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए नई बैटरी केमिस्ट्री पर शोध महत्वपूर्ण है. सोडियम-आयन बैटरी जैसी वैकल्पिक तकनीकों पर काम करना इस दिशा में एक संभावित रास्ता हो सकता है.
हालांकि, इन तकनीकों को बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप से अपनाने के लिए पर्याप्त रिसर्च, तकनीकी विकास और निवेश की जरूरत होगी. घरेलू स्तर पर तकनीक विकसित करने से भारत को बैटरी की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने और वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है.
500 गीगावाट के लक्ष्य के लिए मजबूत ऊर्जा ढांचा जरूरी
भारत 300 गीगावाट गैर-जीवाश्म आधारित स्थापित बिजली क्षमता का आंकड़ा पार कर चुका है. अब देश का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता हासिल करना और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ना है.
डॉ. जय असुंडी के मुताबिक, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए घरेलू विनिर्माण, ऊर्जा भंडारण, ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा. इसके साथ कुशल कार्यबल तैयार करना और उद्योग-अकादमिक साझेदारी को मजबूत करना भी जरूरी है.
ऊर्जा संक्रमण की सफलता केवल स्थापित क्षमता के आंकड़ों से तय नहीं होगी. इसके लिए यह भी जरूरी है कि बिजली की आपूर्ति स्थिर रहे और स्वच्छ ऊर्जा का लाभ घरों, किसानों तथा कारोबारों तक पहुंचे. मजबूत ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और तकनीकी नवाचार इस बदलाव के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.
ऊर्जा उत्पादन के साथ स्टोरेज का विस्तार जरूरी
इनफॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रस के मुताबिक, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा बाजार में 2030 तक 486 गीगावाट के लक्ष्य की दिशा में 15 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) का अनुमान है. वहीं, बैटरी स्टोरेज बाजार के 2031 तक 8.5 अरब डॉलर से अधिक होने की संभावना है. इसके लिए 33 फीसदी CAGR का अनुमान जताया गया है.
मुद्रस ने कहा कि ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ग्रिड स्टोरेज का विस्तार भी जरूरी है. सौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव के बीच बैटरी स्टोरेज बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकता है.
इस क्षेत्र में निवेश बढ़ने से बैटरी निर्माण, ऊर्जा प्रबंधन और ग्रिड से जुड़ी तकनीकों के विकास के अवसर भी बढ़ सकते हैं. हालांकि, इसके लिए उपयुक्त बुनियादी ढांचे और तकनीकी समाधानों को बड़े पैमाने पर अपनाना जरूरी होगा.
घटती लागत से ग्रीन एनर्जी की प्रतिस्पर्धा बढ़ी
मध्य प्रदेश शासन के ऊर्जा एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव ने कहा कि लागत में कमी और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण नवीकरणीय ऊर्जा पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बन रही है.
उनके मुताबिक, अगले दो से पांच वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा को बड़े पैमाने पर अपनाने के अवसर बढ़ सकते हैं. इससे भारत में निवेश, तकनीक और उद्योग के विस्तार की नई संभावनाएं बनेंगी.
हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा का व्यापक इस्तेमाल बढ़ाने के लिए उत्पादन लागत के साथ बिजली के वितरण, भंडारण और ग्रिड की क्षमता पर भी ध्यान देना होगा. यही वजह है कि ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का दायरा अब सौर और पवन परियोजनाओं से आगे बढ़कर बैटरी स्टोरेज और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच रहा है.
बैटरी और महत्वपूर्ण खनिजों पर वैश्विक साझेदारी
एक्सपो में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी प्रमुख मुद्दा है. स्कॉटलैंड के प्रथम मंत्री जॉन स्विनी ने भारत और स्कॉटलैंड के बीच स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्र में साझेदारी की संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि स्कॉटलैंड की तकनीकी विशेषज्ञता को भारत की विनिर्माण क्षमता के साथ जोड़कर ऊर्जा संक्रमण को गति दी जा सकती है.
भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन ने महत्वपूर्ण खनिजों, इंजीनियरिंग और बैटरी विनिर्माण में सहयोग की जरूरत बताई. लिथियम जैसे खनिज बैटरी उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं और इनकी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना ऊर्जा भंडारण क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है.
ऑस्ट्रेलिया ने 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन और 2030 तक अपने बिजली ग्रिड में 82 फीसदी नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य रखा है. ऐसे में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तकनीक और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं.
भारत-जर्मनी सहयोग से तकनीक और विनिर्माण को बढ़ावा
फ्राउनहोफर ऑफिस इंडिया की निदेशक आनंदी अय्यर ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा अब केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने का विषय नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी है.
उनके मुताबिक, 2025 में वैश्विक स्तर पर करीब 800 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई, जबकि बैटरी स्टोरेज क्षमता 108 गीगावाट तक पहुंच गई. यह पिछले वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि है.
अय्यर ने भारत और जर्मनी के बीच बैटरी अनुसंधान, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत इंजीनियरिंग और औद्योगिक ऑटोमेशन में सहयोग की संभावनाओं को रेखांकित किया. भारत के बड़े बाजार और विनिर्माण क्षमता को जर्मनी की तकनीकी विशेषज्ञता से जोड़ने पर स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
घरेलू विनिर्माण और तकनीकी नवाचार पर जोर
एनर्जी एंड कंस्ट्रक्शन पोर्टफोलियो इंडिया, inD के सीनियर ग्रुप डायरेक्टर रजनीश खट्टर ने भी ऊर्जा क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, बैटरी स्टोरेज, ग्रिड की विश्वसनीयता और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया.
ग्रेटर नोएडा में आयोजित एक्सपो में प्रदर्शित तकनीकों और उद्योग जगत की चर्चाओं से स्पष्ट है कि भारत के ऊर्जा संक्रमण का अगला चरण कई मोर्चों पर एक साथ काम करने पर निर्भर करेगा. उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, बैटरी तकनीक में अनुसंधान, कच्चे माल की आपूर्ति और घरेलू विनिर्माण को गति देना जरूरी होगा.
आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा व्यवस्था कितनी मजबूत और भरोसेमंद बनती है, यह केवल नई नवीकरणीय क्षमता जोड़ने पर नहीं, बल्कि ऊर्जा भंडारण, तकनीकी नवाचार और आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की गति पर भी निर्भर करेगा.
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