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बजट 2026 में क्रिप्टो टैक्स सुधार क्यों बन सकता है भारत के लिए गेमचेंजर

बजट 2026 भारत की क्रिप्टो नीति को नई दिशा देने का निर्णायक अवसर है. पिछले चार वर्षों का अनुभव बताता है कि अत्यधिक कठोर कर ढांचा न तो राजस्व बढ़ा सका और न ही प्रभावी नियमन सुनिश्चित कर पाया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

तेजी से बदलती वैश्विक वित्तीय दुनिया में क्रिप्टोकरेंसी ऐसा क्षेत्र बनकर उभरी है, जिसने उत्सुकता के साथ-साथ आशंकाएं भी पैदा की हैं. भारत, जहां दुनिया के सबसे बड़े और सक्रिय क्रिप्टो उपयोगकर्ता समुदायों में से एक मौजूद है, आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. जैसे-जैसे दुनिया भर में क्रिप्टो से जुड़ी नियामक रूपरेखाएं स्पष्ट हो रही हैं, भारत के लिए भी यह समय आत्ममंथन और संतुलित निर्णयों का है. ऐसे में बजट 2026 से क्रिप्टो समुदाय को न केवल भविष्य की दिशा तय करने वाले सुधारों की उम्मीद है, बल्कि इसलिए भी कि क्रिप्टो टैक्स ढांचे को लागू हुए अब चार वर्ष हो चुके हैं. इस बजट में लिए गए फैसले भारत को नवाचार के पथ पर आगे बढ़ा सकते हैं और उसे वैश्विक वेब3 नेतृत्व की ओर ले जा सकते हैं.

वर्ष 2022 में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर 1% टीडीएस और 30% का फ्लैट कैपिटल गेन टैक्स लागू किया गया था. इसका उद्देश्य बाजार पर निगरानी और कर अनुपालन सुनिश्चित करना था. लेकिन व्यवहार में यह नीति अपने लक्ष्य हासिल करने में असफल रही. फरवरी 2022 में घोषणा और जुलाई में क्रियान्वयन के बाद भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों से बड़े पैमाने पर निवेशकों का पलायन ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की ओर हुआ. 2022 से लेकर 2024 के अंत तक भारतीय निवेशकों ने लगभग 5.8 लाख करोड़ रुपये का कारोबार अनियमित विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर किया, जो भारतीयों द्वारा किए गए कुल क्रिप्टो ट्रेडिंग का 90% से अधिक है. इसके मुकाबले सरकार को टीडीएस के रूप में मात्र 258 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई, जबकि अनुमानित 2,500 से 5,000 करोड़ रुपये का कर राजस्व गंवाना पड़ा. दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक के अनुसार अब तक सरकार को 6,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है और यदि नीति में बदलाव नहीं हुआ तो अगले पांच वर्षों में यह नुकसान 17,700 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.

यह पलायन केवल कर बोझ का परिणाम नहीं है, बल्कि एक गंभीर नियामकीय चुनौती भी है. अनुमानतः 50 लाख भारतीय उपयोगकर्ता टीडीएस से बचने के लिए विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर चले गए. इनमें से कई प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के दायरे से बाहर काम करते हैं और पीयर-टू-पीयर नेटवर्क के जरिए केवाईसी, एएमएल और सीएफटी जैसे नियमों को दरकिनार कर देते हैं. हाल के महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आई मीडिया रिपोर्ट्स ने इस खतरे को उजागर किया है. इस स्थिति का फायदा वे तत्व उठा रहे हैं जो निवेशकों को अवास्तविक मुनाफे का लालच देकर ठगी करते हैं या उन्हें अवैध नेटवर्क्स से जोड़ देते हैं, जिससे न केवल उनकी आर्थिक सुरक्षा बल्कि राष्ट्रीय हित भी प्रभावित होते हैं. जब गतिविधियां भूमिगत हो जाती हैं, तो नियमन और निगरानी दोनों असंभव हो जाते हैं.

यह स्थिति ऐसे समय में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को कमजोर कर रही है, जब देश लगातार तीसरे वर्ष दुनिया में सबसे तेज़ ग्रासरूट क्रिप्टो अपनाने वाला देश बना हुआ है. भारत में 1,000 से अधिक वेब3 स्टार्टअप्स, लगभग 75,000 डेवलपर्स और वैश्विक क्रिप्टो डेवलपर्स का 12% हिस्सा मौजूद है. अनुमान है कि ब्लॉकचेन तकनीक 2032 तक भारत की जीडीपी में 1.1 ट्रिलियन डॉलर का योगदान दे सकती है. इसके बावजूद कठोर कर नीतियां उद्यमियों और प्रतिभाओं को दुबई, सिंगापुर और अमेरिका जैसे देशों की ओर धकेल रही हैं. यूएई में क्रिप्टो पर शून्य व्यक्तिगत आयकर और पूंजीगत लाभ कर है, वहीं अमेरिका ने रणनीतिक बिटकॉइन रिजर्व की स्थापना की है. ऐसे में भारतीय प्रतिभा और पूंजी का पलायन हमारी नीतिगत विफलता को उजागर करता है.

बजट 2026 से क्या अपेक्षित है

अब समय है व्यावहारिक सुधारों का, जो उपयोगकर्ताओं को फिर से नियमन के दायरे में लाएं और सरकार को निगरानी की शक्ति दें. सबसे पहले, यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी क्रिप्टो एक्सचेंज, चाहे वे देशी हों या विदेशी, टीडीएस नियमों का पालन करें. इससे न केवल अनुपालन बढ़ेगा, बल्कि निवेशकों को संदिग्ध ऑपरेटरों से भी सुरक्षा मिलेगी. साथ ही, टीडीएस दर को 1% से घटाकर 0.01% करना निगरानी बनाए रखते हुए ऑफशोर पलायन के सबसे बड़े कारण को खत्म कर सकता है. इससे उपयोगकर्ता दोबारा भारतीय प्लेटफॉर्म्स की ओर लौटेंगे और लेन-देन सरकार की निगरानी में आएगा.

दूसरा, 30% के फ्लैट टैक्स को आयकर स्लैब से जोड़ा जाना चाहिए. एक छात्र और उच्च आय वर्ग के व्यक्ति पर समान कर दर लगाना कर न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है. यह बदलाव वैध निवेश को बढ़ावा देगा और कर चोरी की प्रवृत्ति को कम करेगा.

तीसरा, वेब3 व्यवसायों को घाटे की भरपाई और वैध व्यावसायिक कटौतियों की अनुमति दी जानी चाहिए. वर्तमान व्यवस्था में घाटे में चल रही कंपनियों पर भी कर देनदारी बनना व्यावहारिक नहीं है. वेब3 व्यवसाय भी अन्य क्षेत्रों की तरह मुनाफा और नुकसान दोनों का सामना करते हैं.

अनुपालन और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ

क्रिप्टो उद्योग ने यह साबित किया है कि नवाचार और नियमन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. कम दर पर समान रूप से लागू टीडीएस से कर संग्रह बढ़ेगा, पारदर्शिता आएगी और संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी संभव होगी. मौजूदा व्यवस्था में इन लक्ष्यों में से कोई भी पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है.

अतिथि लेखक- सुमित गुप्ता, सह-संस्थापक, कॉइनडीसीएक्स

 


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