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क्‍या पैदा हो रहा है अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को खतरा?

 ब्राजील और चीन ने हाल ही में चीनी युआन और ब्राजीलियाई रियल का उपयोग करके व्यापार करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अनमोल दास, हेड आफ रिसर्च, तेजी मंदी

क्या आप जानते हैं कि दुनिया की नंबर वन सुपरपावर का खिताब किसके पास है? जी हां, आपने सही अनुमान लगाया. यह संयुक्त राज्य अमेरिका है और जब रिजर्व करेंसी की बात आती है, तो अमेरिकी डॉलर के सामने कोई मुकाबला ही नहीं होता है. दशकों से संयुक्त राज्य अमेरिका की दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सेना पर एक उल्लेखनीय पकड़ रही है, जिसने इस देश को हर दृष्टि से एक महाशक्ति बना दिया है. अमेरिकी डॉलर का महत्व इतना है कि इसे वित्तीय दुनिया का बेताज बादशाह कहा जा सकता है. लेकिन कई देश अब नहीं चाहते कि डॉलर इस महत्व को बनाए रखे. इसलिए अमेरिकी डॉलर के बहिष्कार की पहल शुरू हो गई है. 

क्या है मामला? 
छह बड़े देशों ने अमेरिकी डॉलर को छोड़ कर अपनी स्थानीय करेंसी में व्यापार करना शुरू कर दिया है. क्या आपको याद है, साल 2022 के मध्य के दौरान भारत ने अपनी करेंसी का अंतर्राष्ट्रीयकरण किया और भारतीय रुपये का उपयोग करके रूस के साथ अपने तेल व्यापार को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया था? यह सिर्फ शुरुआत थी. अब तक भारत 18 देशों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है जो हमारी स्थानीय करेंसी का उपयोग करके व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए तैयार हैं. मलेशिया को सूची में हाल ही में जोड़ा गया था. यह एक बड़ा गेम चेंजर है क्योंकि व्यापार के लिए करेंसी की वैल्यू सबसे ज्यादा मायने रखती है.

यह बदलाव निश्चित रूप से अमेरिका को नुकसान पहुंचाएगा. भारत के अलावा, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित ईरान ने चीन और रूस के साथ व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह से साइड कर दिया है. OPEC का दाया हाथ माने जाने वाले सऊदी अरब ने भी घोषणा की है कि वह पेट्रो-डॉलर को छोड़ देगा और पेट्रो-युआन को स्वीकार करना शुरू करेगा. इसका मूल रूप से मतलब है कि तेल का व्यापार डॉलर में नहीं बल्कि युआन में तय होगा.

रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान रूस को अमेरिकी डॉलर के उपयोग को छोड़ना पड़ा और इन दिनों रूस अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में चीनी युआन का भी उपयोग करता रहा है. रूस एक ज्वाइंट ब्रिक्स (BRICS) करेंसी लॉन्च करने की भी योजना बना रहा है. इसका उपयोग ब्राजील, चीन, भारत और रूस के बीच किया जाएगा. इसके अलावा, चीन भी OPEC देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए युआन को अमेरिकी डॉलर की वैकल्पिक मुद्रा के रूप में पेश करने की योजना बना रहा है.

सभी अचानक अमेरिकी डॉलर के खिलाफ क्यों ?
अमेरिका के पास एक विशेष लाभ है क्योंकि अमेरिकी डॉलर विश्व की रिजर्व करेंसी है. तेल और सोने जैसी महत्वपूर्ण खरीद के लिए ट्रेड को निपटाने के लिए हर देश को अमेरिकी डॉलर रखने की जरूरत होती है. अन्य देश अपनी खुद की करेंसी का इस्तेमाल नहीं कर सकते. यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि इसका मतलब है कि अन्य सभी देशों को यूएस डॉलर कमाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, जिससे अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ती है. दूसरा, जब कोई देश अपनी करेंसी का उपयोग करके दूसरे देशों के साथ व्यापार करता है, तो उसे व्यापार को निपटाने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग नहीं करना पड़ता है. इसलिए वह देश अपने विदेशी भंडार का ज्यादा प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकता है.

व्यापार में अनिवार्य रूप से अपनी करेंसी का उपयोग करने से कोई भी देश अपने वित्तीय संसाधनों पर ज्यादा अच्छे से नियंत्रण कर सकता है. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अपनी करेंसी का उपयोग करके किसी भी देश के आर्थिक हितों की रक्षा की जा सकती है. उदाहरण के लिए भारत को रूसी तेल की आवश्यकता थी, लेकिन पश्चिमी देशों के कारण बाधाओं का सामना करना पड़ा. भारत ने भुगतान निपटाने के लिए भारतीय रुपये का इस्तेमाल किया और रूसी बाजारों तक अपनी पहुंच बनाए रखी.

भविष्य की बातें
करेंसी के अंतर्राष्ट्रीयकरण में कुछ कमियां हैं क्योंकि इसमें करेंसी की वैल्यू पर अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव पड़ता है, लेकिन, लाभ जोखिमों से ज्यादा है बदलाव महत्वपूर्ण रूप से देखा जाएगा, क्योंकि कई देश अपनी स्थानीय करेंसी में व्यापार को निपटाने के लिए हाथ मिला रहे हैं. हालांकि, डॉलर अभी भी एक प्रमुख स्थान रखता है, लेकिन यह भी साफ है कि डॉलर के वर्चस्व का युग धीरे-धीरे खत्म हो रहा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)


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