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3C फ्रेमवर्क से बंगाल की आर्थिक पुनर्बहाली को मिलेगी नई दिशा

बंगाल की चुनौती संसाधनों की कमी नहीं है. वास्तविक समस्या यह है कि राज्य अपनी मौजूदा संपत्तियों को एक प्रभावी आर्थिक रणनीति में बदलने में विफल रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

बाल्टिक क्षेत्र के शांत और सौम्य वातावरण में समय बिताते हुए मैं अक्सर अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल और वहां हाल के राजनीतिक परिवर्तनों के बाद सामने आने वाले विशाल अवसरों के बारे में सोचता हूं.

इसी दौरान मुझे लंदन बिजनेस स्कूल में स्लोन फेलोशिप कार्यक्रम के दौरान मेरे मार्गदर्शक और प्रोफेसर दिवंगत सुमंत्र घोषाल की बातें याद आती हैं. उनका मानना था कि किसी भी संकटग्रस्त संस्था के रणनीतिक परिवर्तन की शुरुआत उन मूलभूत संपत्तियों की पहचान से होनी चाहिए जो उसके पास अब भी मौजूद हैं, भले ही दुनिया का ध्यान उसकी कमजोरियों पर केंद्रित हो.

1990 के दशक के उत्तरार्ध में यह विचार ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के संदर्भ में सामने आया था, लेकिन प्रोफेसर घोषाल की यह सार्वभौमिक सीख आज 2026 के पश्चिम बंगाल पर भी समान रूप से लागू होती है.

पश्चिम बंगाल की आर्थिक बहस अक्सर इस बात से शुरू होती है कि राज्य ने क्या खो दिया है. खोए हुए उद्योग, खोए हुए निवेश, खोए हुए अवसर और खोए हुए दशक.

लेकिन आज अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है कि बंगाल ने क्या बचाकर रखा है.

उत्तर है, बहुत कुछ.

कई ऐसे क्षेत्रों के विपरीत जिन्हें विकास की बुनियादी संरचना पहले तैयार करनी पड़ती है, पश्चिम बंगाल के पास पहले से ही तीन ऐसी संपत्तियां मौजूद हैं जिनकी अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं कामना करती हैं. राज्य के पास रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, विशाल मानव संसाधन और व्यापार व वित्त की पुरानी परंपरा है. समस्या इन संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि यह है कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध से लगातार सरकारें इन्हें एक समन्वित विकास रणनीति में बदलने में असफल रही हैं.

पहली संपत्ति है, भूगोल.

पश्चिम बंगाल दक्षिण एशिया में सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थितियों में से एक पर स्थित है. यह भारत का बांग्लादेश, नेपाल और भूटान के लिए प्रवेश द्वार है. यह पूर्वोत्तर भारत का प्रमुख गलियारा है और दक्षिण-पूर्व एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं से प्राकृतिक रूप से जुड़ा हुआ है. बहुत कम राज्यों को इतना बड़ा आर्थिक क्षेत्र उपलब्ध है.

क्षेत्रीय व्यापार के बढ़ने के साथ बंगाल पूर्वी दक्षिण एशिया के लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और वितरण केंद्र के रूप में उभर सकता है. हर ट्रक, रेल संपर्क, गोदाम, माल टर्मिनल और व्यापारिक गतिविधि रोजगार, निवेश और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है.

दूसरी संपत्ति है, मानव पूंजी.

पीढ़ियों से बंगाल ने देश को उत्कृष्ट वैज्ञानिक, इंजीनियर, शिक्षाविद, प्रशासक और पेशेवर दिए हैं. आज भी बंगाली भारत के प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, परामर्श, स्वास्थ्य सेवा और अनुसंधान क्षेत्रों में नेतृत्वकारी भूमिकाओं में मौजूद हैं.

विडंबना यह है कि बंगाल निवेश आकर्षित करने की तुलना में प्रतिभा के निर्यात में अधिक सफल रहा है. आज राज्य का सबसे बड़ा निर्यात चाय, जूट या अन्य उत्पाद नहीं, बल्कि उसके युवा हैं.

हर वर्ष हजारों शिक्षित युवा बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, मुंबई और विदेशों का रुख करते हैं. उनकी सफलता शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि स्थानीय अवसरों की कमी को दर्शाती है. राज्य प्रतिभा की कमी से नहीं, बल्कि प्रतिभा को रोक पाने में विफलता से जूझ रहा है.

इसलिए एक सफल आर्थिक रणनीति का लक्ष्य केवल रोजगार सृजन नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे रोजगार तैयार करना होना चाहिए जो महत्वाकांक्षी युवाओं को अपने घर में भविष्य बनाने और वापस लौटने के लिए प्रेरित करें.

तीसरी संपत्ति है, पूंजी.

कोलकाता कभी भारत की व्यावसायिक और वित्तीय राजधानी हुआ करता था. हालांकि यह स्थिति अब बदल चुकी है, लेकिन शहर आज भी देश के सबसे अनुभवी कारोबारी समुदायों में से एक का केंद्र है.

मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी और बंगाली कारोबारी परिवारों ने पीढ़ियों के दौरान पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में व्यापार, विनिर्माण, वित्त और वितरण नेटवर्क का निर्माण किया. क्या कोलकाता पूर्वी भारत के लिए गिफ्ट सिटी जैसा वित्तीय केंद्र बन सकता है?

इस विरासत के महत्व को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. पूंजी केवल धन नहीं होती. यह नेटवर्क, रिश्ते, विश्वास, जोखिम उठाने की क्षमता और पीढ़ियों से संचित व्यावसायिक ज्ञान भी होती है.

कई सफल अर्थव्यवस्थाएं इसलिए आगे बढ़ती हैं क्योंकि वित्त और उद्यमिता एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. कारोबारी समुदाय अवसरों की पहचान करते हैं, पूंजी जुटाते हैं और नए उद्यम स्थापित करते हैं. सरकार की भूमिका इस प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करना नहीं, बल्कि स्थिर नीतियों, प्रभावी प्रशासन और गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे के माध्यम से इसे प्रोत्साहित करना है.

कल्पना कीजिए कि यदि बंगाल की ये तीनों संपत्तियां एक साथ काम करें.

एक ऐसा राज्य जो पूर्वी दक्षिण एशिया का व्यापारिक प्रवेश द्वार बने. एक ऐसा राज्य जो अपने शिक्षित युवाओं को रोककर रखे. एक ऐसा राज्य जहां स्थानीय उद्यमी पूंजी को बाहर जाने के बजाय घर में निवेश के पर्याप्त अवसर मिलें.

आर्थिक सफलता किसी एक बजट या एक निवेश सम्मेलन से नहीं आती. यह तब आती है जब भूगोल, प्रतिभा और पूंजी एक-दूसरे को मजबूत करने लगते हैं और टिकाऊ नीतियों के माध्यम से विकास का सकारात्मक चक्र बनता है.

लंबे समय से पश्चिम बंगाल को केवल उसके पतन के संदर्भ में देखा गया है. नई सरकार के पास इस विमर्श को संभावनाओं की दिशा में मोड़ने का अवसर हो सकता है.

इसके लिए किसी क्रांतिकारी नीति की आवश्यकता नहीं है. आवश्यकता है प्रभावी क्रियान्वयन की, बेहतर लॉजिस्टिक्स, पारदर्शी नियम, तेज मंजूरियां, मजबूत शहरी बुनियादी ढांचा और विश्वसनीय कानून व्यवस्था.

ऐसी संस्थाएं जो लोगों में भरोसा पैदा करें और ऐसी सरकार जो राष्ट्र निर्माण की सोच और जमीनी कार्यों के माध्यम से कार्य संस्कृति में आई गिरावट को दूर करे.

राज्य का भविष्य उसके अतीत से निर्धारित होने की आवश्यकता नहीं है. उसे उन संसाधनों के आधार पर आकार दिया जा सकता है जो उसके पास पहले से मौजूद हैं.

और उसके पास इतना सब कुछ है कि वह एक समृद्ध भविष्य का निर्माण कर सके, यदि वह अपनी तीन प्रमुख पूंजीगत संपत्तियों को अपनाने में सफल होता है.

मैं इसे 3C फ्रेमवर्क कहता हूं.

अतिथि लेखक- प्रबल बसु रॉय

(प्रबल बसु रॉय लंदन बिजनेस स्कूल के स्लोन फेलो हैं. वे विभिन्न कॉर्पोरेट बोर्डों के चेयरमैन के सलाहकार और निदेशक रह चुके हैं तथा पूर्व में कई कंपनियों में समूह मुख्य वित्तीय अधिकारी (Group CFO) के पद पर कार्य कर चुके हैं.)
 


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