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हमारी मुंबई, उनकी बैलेंस शीट

वह अनकही कहानी कि कैसे गुजराती और जैन व्यापारी समुदायों ने बॉम्बे की वित्तीय संरचना खड़ी की, जबकि बाद में राजनीति ने उस पर दावा करने की कला को सिद्ध कर लिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

पलक शाह

अगली बार जब कोई जोर से कहे "आमची मुंबई", तो उससे एक बहुत ही सरल सवाल पूछिए.

आखिर कौन-सा हिस्सा?

क्या वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, जिसे 1875 में गुजराती व्यापारियों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे स्थापित किया था? वह हीरा बाजार, जिसे जैन व्यापारिक नेटवर्क ने वित्तपोषित किया और जो आज दुनिया के अधिकांश कच्चे हीरों का कारोबार संभालता है? वे अस्पताल, जिन पर उनके दादा-दादी निर्भर हैं और जिन्हें कुछ व्यापारी परिवारों ने एक सदी पहले चुपचाप ट्रस्ट के माध्यम से वित्तपोषित किया था? वे विश्वविद्यालय, जिनकी मीनारें आज भी इसलिए खड़ी हैं क्योंकि एक जैन स्टॉकब्रोकर ने अपनी निजी संपत्ति को सार्वजनिक विरासत में बदल दिया? या फिर वे बाजार, जहां उनके पिता को रोजगार मिला क्योंकि नेताओं के आर्थिक असंतोष की राजनीति सीखने से बहुत पहले किसी ने व्यापार का पूरा तंत्र तैयार कर दिया था?

साठ वर्षों के राजनीतिक नाटक के नीचे एक बेहद असहज सच छिपा हुआ है.

जिन लोगों ने मुंबई बनाई, उन्होंने उस पर दावा करने में बहुत कम समय बिताया. जिन लोगों ने उस पर सबसे ज्यादा दावा किया, उन्होंने उसे बनाने में बहुत कम योगदान दिया.

इतिहास का सबसे बड़ा छल

पिछले छह दशकों से मुंबई आधुनिक भारत के सबसे सफल राजनीतिक छल का शिकार रही है. एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया गया कि मुंबई इसलिए समृद्ध हुई क्योंकि वह महाराष्ट्रीयों की थी.

इतिहास बिल्कुल उल्टा कहता है.

मुंबई इसलिए अमीर बनी क्योंकि किसी ने यह परवाह नहीं की कि उसका मालिक कौन है. इस शहर ने अजनबियों को अवसर दिए. इसने प्रवासियों को अवसर दिए. इसने व्यापारियों को अवसर दिए. इसने जोखिम उठाने वालों को पुरस्कृत किया. इस शहर की समृद्धि पहचान से नहीं पैदा हुई. वह पहचान के प्रति उदासीनता से पैदा हुई. और जिस क्षण राजनीति ने लोगों को यह सिखाना शुरू किया कि योगदान से अधिक महत्व मालिकाना हक़ का है, उसी क्षण मुंबई के पतन की शुरुआत हो चुकी थी.

वह सवाल जो इस पूरी कहानी की कुंजी है और जो किसी तरह मुंबई की सार्वजनिक बहस के केंद्र में कभी नहीं रहा, यह है कि आखिर मुंबई (बॉम्बे) भारत की व्यावसायिक राजधानी क्यों बनी, दिल्ली क्यों नहीं, कलकत्ता क्यों नहीं और मद्रास क्यों नहीं?

दिल्ली ने शासक पैदा किए. कलकत्ता ने नौकरशाह पैदा किए. मद्रास ने प्रशासक पैदा किए. लेकिन मुंबई ने व्यापारी पैदा किए. और इतिहास की एक अजीब आदत है कि वह बाज़ार बनाने वालों को सरकारें बनाने वालों की तुलना में कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत करता है.

बॉम्बे कभी सात द्वीपों का दलदली समूह था, जिसे पुर्तगालियों ने इतना महत्वहीन समझा कि दहेज में दे दिया.

भौगोलिक स्थिति ने निश्चित रूप से मदद की. यहां प्राकृतिक बंदरगाह था और व्यापारिक मार्गों तक पहुंच थी. लेकिन कलकत्ता के पास हुगली नदी थी और मद्रास के पास समुद्री तट. इसलिए केवल भूगोल इस सफलता की व्याख्या नहीं कर सकता.

असल कारण यह था कि जब दूसरे शहर राजनीतिक शक्ति के इर्द-गिर्द संगठित हो रहे थे, किसका किस पर नियंत्रण है, कौन किसे रिपोर्ट करेगा, कौन-सा समुदाय सत्ता के सबसे करीब है, तब बॉम्बे एक बिल्कुल अलग सवाल के इर्द-गिर्द संगठित हो रहा था.

क्या खरीदा जा सकता है? क्या बेचा जा सकता है? ऐसी कौन-सी चीज़ है जो अभी मौजूद नहीं है, लेकिन होनी चाहिए?

इतिहास की हर महान व्यावसायिक राजधानी के पीछे एक मजबूत व्यापारी वर्ग रहा है. एम्स्टर्डम के पास उसकी व्यापारिक कंपनियां थीं. लंदन के पास उसके व्यापारी गिल्ड थे. हांगकांग के पास शंघाई से आए व्यापारी थे. न्यूयॉर्क के पास लगातार आने वाले व्यावसायिक प्रवासियों की लहरें थीं. बॉम्बे के पास बनिया, सेठ, शरॉफ और शाह थे. और उनमें भी अनुपात से कहीं अधिक संख्या जैनों की थी.

ब्रिटिशों ने बॉम्बे पर शासन किया. लेकिन शासन करना और निर्माण करना एक ही बात नहीं है. बॉम्बे का उत्थान औपनिवेशिक योजना की जीत नहीं था. यह उन समुदायों की जीत थी जो व्यापार को औपनिवेशिक सरकारों और महाराष्ट्र के आधुनिक राजनेताओं से कहीं बेहतर समझते थे.

वह धर्म जिसने एक बाजार बनाया

अपने आप से पूछिए कि भारत की आधे प्रतिशत से भी कम आबादी वाला एक समुदाय देश के व्यावसायिक जीवन का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा कैसे बन गया?

ईमानदार उत्तर जितना सरल है, उतना ही असाधारण भी.

जैन धर्म ने मानव इतिहास की सबसे प्रभावशाली व्यापारी संस्कृतियों में से एक का निर्माण किया. यह किसी रणनीति या योजना के तहत नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि धर्म ने कुछ चीज़ों की मांग की और कुछ चीज़ों को असंभव बना दिया.

अहिंसा के सिद्धांत ने खेती, पशु वध और जीवों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने वाले अधिकांश व्यवसायों के रास्ते बंद कर दिए. परिणामस्वरूप, लगभग दो हजार वर्षों तक धार्मिक जैन परिवारों के लिए व्यापार, वित्त, लेखांकन और वाणिज्य ही प्रमुख व्यवसाय बचे.

जब राज्य विजय में व्यस्त थे, तब जैन समुदाय हिसाब-किताब में व्यस्त था. जब साम्राज्य युद्ध लड़ रहे थे, तब जैन व्यापारी ऋण व्यवस्था को बेहतर बना रहे थे. जब शासक भूमि इकट्ठा कर रहे थे, तब जैन व्यापारी विश्वास अर्जित कर रहे थे.

इतिहास ने अंततः विजय की तुलना में विश्वास को कहीं अधिक उदारता से पुरस्कृत किया.

शहर की सैर

कुछ देर के लिए मुंबई के राजनीतिक नक्शे को भूल जाइए. असली शहर में चलकर देखिए, फोर्ट, कालबादेवी, भुलेश्वर, ओपेरा हाउस, मरीन लाइंस और ध्यान दीजिए कि सड़कों के नाम किसके नाम पर हैं, इमारतें किसकी याद दिलाती हैं और बाज़ार किन लोगों को याद रखते हैं. दक्षिण मुंबई कोई साधारण शहर नहीं है. यह व्यापारी पूंजी का एक पुरातात्विक संग्रहालय है. हर गली एक सबूत है. हर बाज़ार एक गवाही है. हर पुरानी इमारत एक साक्षी बयान है.

शुरुआत झावेरी बाज़ार से कीजिए. इस नाम का अर्थ गुजराती में "जौहरियों का बाजार" है. इसका नाम किसी सरकार ने नहीं रखा. इसका नाम उन परिवारों ने दिया जिन्होंने इसे बसाया  जैन और गुजराती व्यापारी परिवार, जो एक सदी से भी अधिक समय से इसी सड़क पर सोने, चांदी और हीरों का कारोबार करते आ रहे हैं. आज इन गलियों से होकर गुजरने वाला हीरे और सोने का व्यापार बॉम्बे को एंटवर्प, दुबई और न्यूयॉर्क से जोड़ता है. यह नेटवर्क किसी विधानसभा ने नहीं बनाया. यह विश्वास के आधार पर बना, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक-एक सौदे के साथ और मजबूत होता गया.

अब मंगलदास मार्केट जाइए, जिसका नाम गुजराती कपास व्यापारी मंगलदास नाथुभाई के नाम पर रखा गया. उन्होंने एक ऐसी बात समझ ली थी जिसे उनके दौर का कोई राजनेता नहीं समझ पाया था, किसी शहर को स्मारकों से पहले बाज़ारों की जरूरत होती है. आज भी उनका नाम बाज़ार के प्रवेश द्वार पर दर्ज है. और बाजार आज भी उसी तरह काम कर रहा है.

अब कालबादेवी जाइए, जहां थोक व्यापार महाराष्ट्र के एक राजनीतिक इकाई बनने से भी कहीं पहले से लगातार चलता आ रहा है. कारोबारी समय में वहां खड़े होकर यह कोशिश कीजिए कि कोई ऐसा क्षण मिल जाए जब कुछ न कुछ खरीदा, बेचा, स्थानांतरित, वित्तपोषित या बातचीत के जरिए तय न किया जा रहा हो. यहां व्यापार कोई क्षेत्र नहीं है. यह यहां का वातावरण है.

अब दलाल स्ट्रीट पहुंचिए. वर्ष 1875 में स्टॉकब्रोकरों के एक समूह, जिनमें अधिकांश गुजराती थे, बरगद के एक पेड़ के नीचे होने वाली अपनी बैठकों को औपचारिक रूप देते हुए "नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन" की स्थापना की. "नेटिव" यानी भारतीय, यानी ब्रिटिश नहीं. यानी ये लोग स्वतंत्रता आंदोलन के एक संगठित राजनीतिक परियोजना बनने से भी कई दशक पहले एक स्वदेशी वित्तीय संस्था का निर्माण कर रहे थे. यही संस्था आज बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज है, जिसका बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स हर शाम लाखों लोग देखते हैं, बिना यह जाने कि इसे उन्हीं व्यापारियों ने बनाया था, जिन्हें उनके राजनेताओं ने दशकों तक खलनायक के रूप में पेश किया.

इसके बाद बॉम्बे विश्वविद्यालय जाइए और राजाबाई क्लॉक टॉवर के सामने खड़े हो जाइए. वर्ष 1878 में निर्मित अरब सागर की ओर देखता हुआ 85 मीटर ऊंचा यह गोथिक पत्थर का टॉवर किसी सरकारी परियोजना का हिस्सा नहीं था. यह कोई औपनिवेशिक स्मारक भी नहीं था. इसे प्रेमचंद रायचंद ने वित्तपोषित किया था, जो एक जैन स्टॉकब्रोकर के पुत्र थे, कपास व्यापार के उछाल के दौर के सबसे प्रभावशाली वित्तीय व्यक्तित्व और बॉम्बे के "कॉटन किंग" कहलाते थे. उन्होंने यह टॉवर अपनी मां राजाबाई की स्मृति में बनवाया, जो दृष्टिहीन हो चुकी थीं और समय नहीं जान पाती थीं. उन्होंने ऐसा टॉवर बनवाया ताकि उनकी मां घंटियों की आवाज़ से समय सुन सकें. उन्होंने उसका नाम अपने नाम पर नहीं रखा. उन्होंने उसे विश्वविद्यालय में बनवाया ताकि पूरा शहर उसका उपयोग कर सके.

प्रेमचंद रायचंद बाद में दिवालिया भी हुए, जैसा कि बड़े बाजारों में बड़ा जोखिम उठाने वाले लोगों के साथ कभी-कभी होता है. उनकी संपत्ति कपास के व्यापारिक चक्र के साथ बढ़ी भी और घटी भी. लेकिन वह टॉवर आज भी वहीं खड़ा है और उस शहर के ऊपर समय बता रहा है, जो लगभग भूल चुका है कि उसे किसने बनाया था. यही जैन और गुजराती व्यापारी परंपरा की सबसे सशक्त तस्वीर है, ऐसा कुछ बनाओ जो तुम्हारे अपने उतार-चढ़ाव से भी अधिक समय तक टिके और दूसरों के काम आए.

ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता एक ऐसा सबक समझती थी जिसे आधुनिक राजनीति आज भी पूरी तरह नहीं समझ पाई है.

साम्राज्य भाषणों से नहीं बनते. वे उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जो व्यापार को समझते हैं.

वह शहर जो अपने निर्माताओं को किराया चुकाता है

हर दिन लाखों मुंबईकर उन संस्थानों के भीतर रहते हैं, काम करते हैं, व्यापार करते हैं, पढ़ते हैं, इलाज कराते हैं और निवेश करते हैं जिन्हें व्यापारी पूंजी ने खड़ा किया. वे उन बाज़ारों से होकर गुजरते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन स्टॉक एक्सचेंजों पर कारोबार करते हैं जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन कॉलेजों में पढ़ते हैं जिन्हें उन ट्रस्टों ने स्थापित किया जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. उन अस्पतालों में इलाज कराते हैं जिन्हें व्यापारी परिवारों की परोपकार भावना ने वित्तपोषित किया, जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया. वे उन व्यावसायिक इलाकों में कारोबार करते हैं जिनकी पूरी भौतिक और संस्थागत संरचना उन समुदायों ने बनाई, जिनके प्रति उन्हें पिछले साठ वर्षों से नाराज़ होना सिखाया गया.

फिर वे घर जाते हैं और टेलीविजन पर राजनेताओं को देखते हैं, ऐसे राजनेता जिन्होंने अपने पिछले चुनावी कार्यकाल से अधिक समय तक टिकने वाली कोई चीज़ नहीं बनाई और वे उन्हें बताते हैं कि यह शहर उनका है.

अगर इसके परिणाम इतने गंभीर न होते, तो यह दुस्साहस हास्यास्पद लगता.

हर वर्ष जब किसी प्रतिभाशाली उद्यमी ने राजनीतिक माहौल देखकर दक्षिण मुंबई के बजाय सिंगापुर को चुना, तब मुंबई ने उसकी कीमत चुकाई. हर वह कारोबार जिसने इसलिए अपना ठिकाना बदला क्योंकि शहर व्यावसायिक विश्वास के लिए प्रतिकूल होता जा रहा था, उसकी कीमत भी मुंबई ने चुकाई. महाराष्ट्रीय युवाओं की हर उस पीढ़ी ने कीमत चुकाई जिसे यह बताया गया कि उनकी समस्या बाहरी व्यापारी हैं, बजाय इसके कि उन्हें स्वयं व्यापारी बनना चाहिए.

किसी शहर को बहिष्कारी राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का नहीं होता जिसे वह नष्ट कर देती है. सबसे बड़ा नुकसान उस चीज़ का होता है जिसे वह बनने ही नहीं देती.

आप उस बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को नहीं देख सकते जो कभी बना ही नहीं. आप उस प्रेमचंद रायचंद के लिए शोक नहीं मना सकते जो शत्रुतापूर्ण माहौल को भांपकर कभी यहां आए ही नहीं. लेकिन यही "आमची मुंबई" की साठ वर्षों की राजनीति की वास्तविक कीमत है.

साठ वर्ष. अब अपना काम दिखाइए

"भूमिपुत्र" की राजनीति 1966 से महाराष्ट्र की सार्वजनिक चेतना पर हावी रही है. इसलिए अब एक उचित सवाल पूछा जाना चाहिए.

उसने कौन-सा स्टॉक एक्सचेंज बनाया? कौन-सा वैश्विक कमोडिटी बाज़ार खड़ा किया? कौन-सा ऐसा व्यापारिक नेटवर्क तैयार किया जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह को नियंत्रित करता हो? कौन-सा ऐसा धर्मार्थ अस्पताल बनाया, जिस पर आज भी शहर के गरीब निर्भर हों? कौन-सा ऐसा निजी धन से निर्मित स्थापत्य आज भी सौ वर्ष बाद खड़ा है? किस प्रवासी ने शून्य से शुरुआत कर सौ अरब डॉलर की कंपनी बनाई?

आराम से सोचिए.

अब देखिए कि उन समुदायों के साथ क्या आया, जिन्हें राजनीति ने वर्षों तक निशाना बनाया. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज. कपास व्यापार के दौर की पूरी वित्तीय संरचना. प्रेमचंद रायचंद की परोपकार परंपरा. मंगलदास नाथुभाई के बाज़ार. झावेरी बाज़ार. पश्चिमी भारत का हीरा व्यापार. अस्पतालों के ट्रस्ट. विद्यालयों के लिए दिए गए दान. दक्षिण मुंबई की स्थापत्य विरासत.

यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी चीज़ पर मालिकाना हक़ का दावा करना, वास्तव में उसे बनाने का विकल्प कभी नहीं हो सकता.

एक पक्ष ने संस्थान बनाए. दूसरे पक्ष ने नाराज़गी पैदा की.

और जैसा कोई भी व्यापारी आपको बताएगा, **नाराज़गी का बाज़ार में कोई पुनर्विक्रय मूल्य नहीं होता.**

एक स्कूल शिक्षक का बेटा

न कोई पारिवारिक विरासत. न कोई विरासत में मिला कारोबारी साम्राज्य. न कोई राजनीतिक समर्थन. न कोई प्रसिद्ध उपनाम. केवल जोखिम उठाने की इच्छा और ऐसी संस्कृति, जिसने सदियों तक उसी प्रवृत्ति को निखारा था.

धीरूभाई अंबानी का जन्म गुजरात के चोरवाड़ में एक गांव के स्कूल शिक्षक के घर हुआ था. किशोरावस्था में उन्होंने अदन में एक पेट्रोल पंप पर काम किया. वे बॉम्बे आए तो उनके पास कुछ भी नहीं था, सिवाय उस व्यावसायिक समझ के जिसे गुजराती सभ्यता हजारों वर्षों से विकसित करती आ रही थी.

उन्होंने शहर से कोई अनुमति नहीं मांगी. उन्होंने केवल एक बाज़ार मांगा.

और उसी बाज़ार के आधार पर उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बना दिया, जो पूरे देश में लाखों लोगों को रोजगार देती है.

बॉम्बे ने धीरूभाई अंबानी को नहीं बनाया.

उसने केवल उनके रास्ते में रुकावट नहीं डाली.

वह इतना ही पर्याप्त था.

एक उचित प्रश्न

पिछले कुछ दशकों से एक पूरा राजनीतिक आंदोलन लोगों से यह अपेक्षा करता रहा है कि वे मुंबई को गुजराती और जैन व्यापारियों से "बचाने" के लिए उसका आभार व्यक्त करें, क्योंकि उन्हें बाहरी करार दिया गया.

तो एक उचित सवाल उठता है.

आखिर किस चीज से बचाया गया?

क्या उन व्यापारियों से जिन्होंने इसके बाजार बनाए?

क्या उन उद्यमियों से जिन्होंने इसकी संपदा पैदा की?

क्या उन समुदायों से जिन्होंने इसके संस्थानों को वित्तपोषित किया?

क्या उन लोगों से, जिनके करों से वही सरकारें चलती रहीं जो उन्हें अपनापन सिखाने का दावा करती हैं?

यह इतिहास के सबसे विचित्र दृश्यों में से एक है.

एक ऐसा शहर, जिसकी नींव व्यापार पर टिकी है, बार-बार उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा होता रहा है जो व्यापार को सबसे अच्छी तरह समझते हैं.

दो तरह के लोग

हर पीढ़ी में दो तरह के लोग होते हैं. पहला वर्ग यह पूछता है, "यह किसका है?" दूसरा वर्ग यह पूछता है, "ऐसी कौन-सी चीज है जो अभी तक अस्तित्व में नहीं है?"

बॉम्बे लगभग पूरी तरह दूसरे प्रकार के लोगों ने बनाया था. लेकिन इसकी राजनीति पर धीरे-धीरे पहले प्रकार के लोगों का प्रभुत्व बढ़ता गया.

निर्माण करने वालों और दावा करने वालों के बीच का यही अंतर, एक वाक्य में समेटा जाए तो, मुंबई का पूरा इतिहास है.

यह न तो केवल गुजरातियों की कहानी है, न जैनों की और न ही महाराष्ट्रीयों की.

यह उस स्थिति की कहानी है, जब व्यापारिक विश्वास पर खड़ा हुआ एक शहर राजनीतिक असंतोष को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बना लेता है.

घंटी

हर कार्यदिवस की सुबह 9:15 बजे दलाल स्ट्रीट पर एक घंटी बजती है. ट्रेडर अपनी-अपनी जगह लेते हैं. स्क्रीनें जगमगा उठती हैं. हजारों करोड़ रुपये का कारोबार उस संस्था के माध्यम से शुरू हो जाता है, जिसे लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले गुजराती स्टॉकब्रोकरों ने एक बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा किया था.

वे लोग यह नहीं पूछते थे कि मुंबई किसकी है.

वे यह पूछते थे कि मुंबई को किस चीज़ की जरूरत है.

उसे बाजार चाहिए थे. उन्होंने बाज़ार बनाए.

उसे पूंजी चाहिए थी. उन्होंने पूंजी उपलब्ध कराई.

उसे ऐसे संस्थानों की जरूरत थी जो किसी एक परिवार, किसी एक संपत्ति और किसी एक राजनीतिक दौर से अधिक समय तक टिक सकें. उन्होंने वे संस्थान भी बनाए.

और जब कई दशक बाद राजनेता उस शहर पर दावा करने पहुंचे जिसे उन व्यापारियों ने बनाया था, तब बॉम्बे ने वही किया जो व्यापार पर बने शहर हमेशा करते आए हैं.

वह काम करता रहा

बॉम्बे और बाद में मुंबई इसलिए समृद्ध बने क्योंकि व्यापारियों ने पहचान को महत्व नहीं दिया.

मुंबई बेचैन तब हुई जब राजनेताओं ने उसकी खोज की.

एक समूह ने इस शहर में संभावनाएं देखीं.

दूसरे समूह ने इसमें केवल मालिकाना हक़ देखा.

एक ने बाजार बनाए.

दूसरे ने नारे बनाए.

एक ने संपदा पैदा की.

दूसरे ने असंतोष पैदा किया.

जिन लोगों ने बॉम्बे बनाया, उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि इसका मालिक कौन है.

वे इसे बनाने में व्यस्त थे.

और हर सुबह 9:15 बजे, जब दलाल स्ट्रीट पर घंटी बजती है, इतिहास एक बार फिर चुपचाप अपना फैसला सुनाता है.

निर्माण करने वाले जीतते हैं

दावा करने वाले केवल वही विरासत पाते हैं जो निर्माण करने वाले उनके लिए छोड़ जाते हैं.

शहर अपने वास्तविक संस्थापकों का परिचय बहुत सरल तरीके से देते हैं.

देखिए कि क्या बचा रहता है

मूर्तियां गायब हो जाती हैं.

सरकारें बदल जाती हैं.

राजनीतिक आंदोलन समाप्त हो जाते हैं.

चुनावी नारे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं.

लेकिन इमारतें बनी रहती हैं.

संस्थान बने रहते हैं.

बाजार बने रहते हैं.

ट्रस्ट बने रहते हैं.

मुंबई की सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में जहां भी नजर डालिए, वहां बची हुई संरचनाओं पर राजनेताओं के नहीं, बल्कि व्यापारियों के निशान दिखाई देते हैं.

यही मुंबई है.

हमेशा से यही मुंबई रही है.

और कोई भी नारा चाहे वह कितना भी ऊंची आवाज में लगाया जाए, कितना भी गुस्से से भरा हो या कितनी भी बार दोहराया जाए, कभी भी उतनी स्थायी चीज़ नहीं बना सका.

मुंबई का सबसे बड़ा दुश्मन कभी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं था. उसका सबसे बड़ा दुश्मन यह विचार था कि दावा करना, निर्माण करने से श्रेष्ठ है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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