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केरल से पनामा तक: ब्लैकरॉक का अदृश्य साम्राज्य

भारत के विझिंजम बंदरगाह को अडानी और MSC के बीच एक सामान्य लेनदेन के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन दस्तावेज कहीं अधिक बड़ी कहानी बताते हैं. 'उस गुप्त हाथ के पीछे का साम्राज्य' का दूसरा भाग

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

2025 की शुरुआत में वॉशिंगटन ने यह तय कर लिया कि पनामा नहर पर चीन का प्रभाव अब अस्वीकार्य हो चुका है.

खुद नहर नहीं, 1999 से उसका संचालन पनामा कर रहा है और गंभीरता से कोई भी इसे बदलने का प्रस्ताव नहीं दे रहा था.

निशाना थे वे दो बंदरगाह जो नहर के प्रवेश द्वारों की रक्षा करते हैं, बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल, जिनका संचालन दो दशकों से अधिक समय से हांगकांग की CK Hutchison कर रही थी.

जो इन बंदरगाहों को नियंत्रित करता है, वही तय करता है कि किन जहाजों को प्राथमिकता मिलेगी, माल कितनी तेजी से निकलेगा और प्रभावी रूप से दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनियों में से एक पर किसका हाथ रहेगा.

वॉशिंगटन ने नौसेना नहीं भेजी.

उसने पूंजी भेजी.

राष्ट्रपति ट्रंप के सीधे दबाव में, मार्च 2025 में Hutchison ने अपने पूरे वैश्विक पोर्ट कारोबार का 80 प्रतिशत हिस्सा बेचने पर सहमति जताई, जिसमें 23 देशों के 43 टर्मिनल शामिल थे, जिनमें पनामा के दोनों बंदरगाह भी थे. यह सौदा लगभग 22.8 अरब डॉलर का बताया गया.

इस कंसोर्टियम का नेतृत्व ब्लैकरॉक कर रहा था.

एक वर्ष से कुछ अधिक समय बाद, यही वित्तीय संरचना ऐसी जगह दिखाई दी जहां किसी की नजर नहीं थी, भारत के दक्षिणी तट, केरल में 1.397 अरब डॉलर के एक बंदरगाह सौदे के भीतर.

अडानी के 1.4 अरब डॉलर के विझिंजम पोर्ट सौदे के माध्यम से.

पनामा की चाल

बीजिंग ने Hutchison की इस बिक्री को आसानी से स्वीकार नहीं किया.

चीन ने संकेत दिया कि वह इस सौदे को तभी मंजूरी देगा जब उसकी सरकारी शिपिंग कंपनी COSCO को इस कंसोर्टियम में 20–30 प्रतिशत हिस्सेदारी और उन बंदरगाहों पर वीटो अधिकार दिए जाएं जिनमें चीन की सबसे अधिक रुचि है.

बातचीत ठहर गई.

लेकिन फिर पनामा के अपने सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग रास्ते से वॉशिंगटन को वही परिणाम दे दिया जिसकी उसे तलाश थी.

2026 की शुरुआत में अदालत ने फैसला सुनाया कि बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल बंदरगाहों पर Hutchison को 1997 में दिया गया मूल कंसेशन असंवैधानिक था और उसे पूरी तरह निरस्त कर दिया.

इसके बाद अंतरिम नियंत्रण, अधिकतम 18 महीनों के लिए, Hutchison की दो प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को सौंप दिया गया.

बाल्बोआ APM Terminals को मिला, जो Maersk का पोर्ट व्यवसाय है.

क्रिस्टोबाल TiL को मिला.

TiL, Mediterranean Shipping Company (MSC) का पोर्ट व्यवसाय है.

और यह संयुक्त रूप से ब्लैकरॉक का भी है, उस लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी और वीटो अधिकारों के माध्यम से, जो ब्लैकरॉक को 2024 में 12.5 अरब डॉलर में Global Infrastructure Partners का अधिग्रहण करने के बाद विरासत में मिले.

पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी मीडिया ने सीधी भाषा में लिखा कि वॉशिंगटन ने पनामा नहर को औपचारिक रूप से छुए बिना ही उसके प्रवेश द्वारों को फिर से अमेरिकी प्रभाव के दायरे में लाने का तरीका खोज लिया था.

दोनों घटनाओं के ऊपर अब एक ही बोर्ड सीट मौजूद है.

Adebayo Ogunlesi, Global Infrastructure Partners (GIP) के चेयरमैन, ब्लैकरॉक के भी निदेशक हैं और TiL के भी निदेशक हैं.

अब एक व्यक्ति का मत पनामा नहर के प्रवेश द्वारों पर होने वाली गतिविधियों पर भी प्रभाव डालता है और विझिंजम में होने वाली गतिविधियों पर भी.

इसका अर्थ यह है कि अब वही स्वामित्व संरचना एक साथ दो पूरी तरह अलग समुद्री रणनीतिक बिंदुओं के भीतर मौजूद है, एक, जो पनामा के माध्यम से अटलांटिक और प्रशांत महासागर तक पहुंच को नियंत्रित करता है, और दूसरा, जो अरब सागर में भारत के अपने रणनीतिक समुद्री व्यापारिक गलियारे के दक्षिणी छोर पर स्थित है.

पिछले सप्ताह तक ये दोनों पूरी तरह अलग-अलग कहानियां थीं.

विझिंजम का यह सौदा चुपचाप इन्हें आपस में जोड़ गया.

पैटर्न

पनामा कोई अकेला मामला नहीं है.

Global Infrastructure Partners के अधिग्रहण के माध्यम से ब्लैकरॉक अब लंदन, सिडनी और कुआलालंपुर के हवाई अड्डों, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के रेल नेटवर्क, डेटा सेंटर अवसंरचना, यूरोप में लाखों परिवारों को सेवा देने वाली एक जल उपयोगिता कंपनी और ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूनाइटेड किंगडम तक फैली प्रमुख बंदरगाह परिसंपत्तियों में मौजूद है.

इसका वास्तविक पैमाना तब तक समझ में नहीं आता, जब तक आप पर्याप्त दूरी बनाकर पूरी तस्वीर को एक साथ न देखें.

वही संस्था, जो लाखों सामान्य निवेशकों की सेवानिवृत्ति की बचत का प्रबंधन करती है, अब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन हवाई अड्डों के नीचे मौजूद है, जहां से लोग यात्रा करते हैं. उन रेल प्रणालियों के नीचे, जिनसे लोग रोज़ सफर करते हैं. उन बंदरगाहों के नीचे, जहां वैश्विक माल उतरता है. उन डेटा सेंटरों के नीचे, जहां इंटरनेट का भौतिक अस्तित्व टिका है. उन पाइपलाइनों के नीचे, जो ऊर्जा पहुंचाती हैं. और उन जल उपयोगिता प्रणालियों के नीचे, जो पूरे शहरों को पानी उपलब्ध कराती हैं.

इन व्यवस्थाओं पर सरकारें अब भी संप्रभु दिखाई देती हैं.

लेकिन इन व्यवस्थाओं के नीचे मौजूद स्वामित्व तेजी से कहीं और केंद्रित होता जा रहा है.

सरकारें अब भी इन व्यवस्थाओं पर संप्रभु दिखाई देती हैं.

लेकिन इनके नीचे का स्वामित्व लगातार किसी और के हाथों में सिमटता जा रहा है.

अलग-अलग देखने पर इनमें से हर सौदा एक सामान्य अवसंरचना लेनदेन जैसा दिखाई देता है, जिसकी एक बार रिपोर्टिंग होती है और फिर उसे भुला दिया जाता है.

लेकिन सामूहिक रूप से ये कुछ कहीं बड़ा उजागर करते हैं.

वही कुछ वित्तीय संस्थान धीरे-धीरे उस अवसंरचना के नीचे अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप से संचालित होती है.

वही नाम बार-बार क्यों दिखाई देते हैं

इस पैटर्न के पीछे एक कारण है.

और वह छिपा हुआ नहीं है.

बस उसके बारे में शायद ही कभी स्पष्ट शब्दों में बात की जाती है.

दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों ने यह समझ लिया है कि अवसंरचना पर नियंत्रण रखना, शेयरों में कारोबार करने से कहीं अधिक लाभदायक है.

आर्थिक मंदी आने पर हवाई अड्डे गायब नहीं हो जाते.

बंदरगाह रातोंरात अप्रासंगिक नहीं हो जाते.

जल उपयोगिता कंपनियों को शायद ही कभी वास्तविक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.

टोल सड़कें अर्थव्यवस्था के तेज़ी में होने या मंदी में होने, दोनों ही स्थितियों में नकदी उत्पन्न करती रहती हैं.

और लगभग हर दूसरी परिसंपत्ति श्रेणी के विपरीत, भौतिक अवसंरचना अपने मालिक को केवल प्रतिफल (Yield) ही नहीं देती.

वह उससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज़ देती है.

आवागमन पर नियंत्रण

माल.

ऊर्जा.

यात्री.

सप्लाई चेन.

व्यापार.

आधुनिक अर्थव्यवस्था भौतिक धमनियों पर चलती है.

और धीरे-धीरे वही कुछ संस्थान इन धमनियों को खरीद रहे हैं, किसी एक बड़े नाटकीय अधिग्रहण के माध्यम से नहीं, बल्कि सौदा-दर-सौदा, बंदरगाह-दर-बंदरगाह, हवाई अड्डा-दर-हवाई अड्डा.

जब तक कि दुनिया का नक्शा चुपचाप बदल नहीं जाता.

आर्थिक भूगोलवेत्ता ब्रेट क्रिस्टोफर्स ने इस स्थिति को एक नाम दिया है "एसेट मैनेजर सोसाइटी."

एक ऐसा छोटा-सा समूह, जिसकी कंपनियां अब उन सड़कों, जल पाइपलाइनों, ऊर्जा ग्रिडों और लगातार बढ़ते हुए बंदरगाहों तथा हवाई अड्डों की मालिक बनती जा रही हैं, जिन पर दुनिया निर्भर करती है.

ऐसे संस्थान, जिन्हें लोगों ने कभी चुना नहीं.

और जिनकी लेखा-पुस्तकों को देखने की क्षमता भी उनके पास नहीं है.

केरल पर वापस

इस पूरी प्रक्रिया में किसी को कोई कानून तोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी.

अडानी ने अपनी हिस्सेदारी ऐसी कंपनी को बेची, जिसके साथ वह पहले भी दो बार साझेदारी कर चुका था. कीमत ऐसी थी, जिससे उस विस्तार परियोजना को वित्तपोषित किया जा सके, जिसके लिए अन्यथा उसे पूरी पूंजी स्वयं जुटानी पड़ती.

कागज़ों पर हर कदम पूरी तरह सामान्य दिखाई देता है.

भारत मानता है कि वह भविष्य के लिए रणनीतिक अवसंरचना का निर्माण कर रहा है.

लेकिन पूरी दुनिया में एक कहीं अधिक शांत बदलाव पहले से ही जारी है.

राष्ट्र बंदरगाह बनाते हैं.

लेकिन उनका स्वामित्व धीरे-धीरे वैश्विक पूंजी के हाथों में जाता जा रहा है.

विझिंजम को अडानी और MSC के बीच एक सामान्य लेनदेन के रूप में प्रस्तुत किया गया था.

लेकिन दस्तावेज़ कहीं अधिक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं.

अब वही पूंजी संरचना पनामा नहर पर मौजूद है, यूरोप के हवाई अड्डों के भीतर मौजूद है, महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में मौजूद है और अब भारत की सबसे रणनीतिक समुद्री परिसंपत्तियों में से एक के भीतर भी मौजूद है.

देश यह मानते हैं कि वे अपने भविष्य के लिए संप्रभु अवसंरचना का निर्माण कर रहे हैं.

लेकिन धीरे-धीरे उसकी चाबियां कोई और खरीदता जा रहा है.

और यदि वही कुछ संस्थान उन बंदरगाहों, रेल प्रणालियों, हवाई अड्डों और ऊर्जा गलियारों का अधिग्रहण करते रहे, जिनके माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था वास्तव में संचालित होती है, तो असहज करने वाला प्रश्न केवल यह नहीं रहेगा कि विझिंजम का मालिक कौन है.

प्रश्न उससे कहीं बड़ा हो जाएगा.

आखिर धीरे-धीरे पूरी दुनिया का मालिक कौन बनता जा रहा है?

स्रोत एवं टिप्पणियां

1. पनामा के बंदरगाहों को लेकर CK Hutchison पर ट्रंप प्रशासन का दबाव और ब्लैकरॉक के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम को 22.8 अरब डॉलर (कुछ रिपोर्टों में लगभग 23 अरब डॉलर) में बिक्री की घोषणा. स्रोत: CBS News, Foreign Policy, FDD Analysis.

2. चीन द्वारा COSCO को कंसोर्टियम में शामिल करने तथा वीटो अधिकार देने की मांग, जिसके कारण Hutchison की व्यापक बिक्री प्रक्रिया रुक गई. स्रोत: SupplyChainBrain.

3. पनामा के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2026 की शुरुआत में CK Hutchison को 1997 में दिया गया कंसेशन निरस्त करना तथा बाल्बोआ (APM Terminals) और क्रिस्टोबाल (TiL) का अंतरिम नियंत्रण प्रतिद्वंद्वी ऑपरेटरों को सौंपना. स्रोत: CNBC.

4. ब्लैकरॉक द्वारा 12.5 अरब डॉलर में Global Infrastructure Partners (जनवरी 2024 में घोषित, अक्टूबर 2024 में पूर्ण) का अधिग्रहण तथा TiL में उसकी हिस्सेदारी. स्रोत: BlackRock Corporate Newsroom, MSC Group Shareholder Disclosures.

5. TiL और BlackRock के बोर्ड में Adebayo Ogunlesi की दोहरी निदेशक भूमिका. स्रोत: BlackRock Corporate Leadership Page, StockTitan.

6. GIP/BlackRock पोर्टफोलियो- गैटविक, एडिनबर्ग, सिडनी एयरपोर्ट, मलेशिया एयरपोर्ट्स होल्डिंग्स, CyrusOne, Pacific National, Italo, Peel Ports, Port of Melbourne तथा SUEZ (जल एवं अपशिष्ट उपयोगिता कंपनी, जिसका स्वेज नहर से कोई संबंध नहीं है). स्रोत: Global Infrastructure Partners Company Disclosures, SUEZ Company Disclosures तथा संबंधित सेक्टर प्रेस.

7. "Asset Manager Society" की अवधारणा. स्रोत: Brett Christophers की पुस्तक Our Lives in Their Portfolios: Why Asset Managers Own the World (Verso, 2023), तथा Jacobin, LSE Review of Books और Public Books में प्रकाशित समीक्षाएं.

8.  विझिंजम सौदे की शर्तें (1.397 अरब डॉलर, 49 प्रतिशत हिस्सेदारी). स्रोत: Adani Ports Disclosures, Business Standard, Business Today.

टिप्पणी

इस लेख में केवल उन्हीं तथ्यों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो कंपनी के आधिकारिक खुलासों, न्यायालय एवं नियामकीय अभिलेखों तथा ऊपर उद्धृत नामित स्रोतों की रिपोर्टिंग में दर्ज हैं.

अवसंरचना निवेश की आर्थिक तर्कशक्ति को उद्योग में प्रचलित दस्तावेज़ित व्यवहार और अकादमिक विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है. इसे किसी भी नामित कंपनी द्वारा किसी प्रकार की अनियमितता या गलत कार्य करने का आरोप नहीं माना जाना चाहिए.

पनामा नहर स्वयं पनामा के नहर प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में ही बनी हुई है. यहां जिन बंदरगाहों का उल्लेख किया गया है, वे नहर के प्रवेश द्वारों पर स्थित कंटेनर टर्मिनल हैं, न कि स्वयं पनामा नहर या उसका पारगमन संचालन.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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