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क्या है BRICS करेंसी जिसको बताया जा रहा डॉलर का विकल्प, ऐसा हुआ तो क्या होगा बदलाव?
दुनिया की इन 3 महाशक्तियों के अलावा ब्रिक्स समूह में शामिल 7 अन्य देशों ने आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्रा के इस्तेमाल पर सहमति जताई.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
रूस के कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में इस बार ‘पूरब बनाम पश्चिम’ के मुद्दे को खासतौर से हवा दी गई. दुनिया की 3 बड़ी आर्थिक शक्तियां जब एक मंच पर पहुंचीं तो पूरे पश्चिम की निगाहें इसी तरफ लगी रही. सम्मले में भारत, रूस और चीन ने अमेरिका को सीधे तौर पर व्यापारिक चुनौती देने का संकेत भी दे दिया. ब्रिक्स में शामिल देशों ने आपसी कारोबार के लिए अब डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्रा में लेनदेन करने की बात कही है. इसका मतलब है कि भारत इन देशों से डॉलर के बजाय रुपये में लेनदेन कर सकेगा. अभी ग्लोबल ट्रेड में ज्यादातर ट्रांजेक्शन डॉलर में ही होता है. आइए-समझते हैं कि ब्रिक्स देश कैसे डॉलर के दबदबे को खत्म कर सकते हैं और ब्रिक्स की मुद्रा का वजन कितना होगा.
कितना महत्वपूर्ण है BRICS?
वैश्विक लिहाज से BRICS काफी महत्वपूर्ण संगठन है. विश्व की लगभग 44% जनसंख्या इसके सदस्य देशों में निवास करती है. इसके अलावा BRICS में शामिल देश विश्व की अर्थव्यवस्था में 28% की हिस्सेदारी रखते हैं. यह देश विश्व के लगभग 30% भूभाग पर फैले हुए हैं. इसके अलावा, BRICS में भारत और चीन के रूप में बड़े बाजार और सबसे तेजी से बढ़ने वाली दो अर्थव्यवस्थाएँ हैं. साथ ही इसके सभी सदस्यों में तीन परमाणु हथियार वाले देश हैं. विश्व की पांच बड़ी सेनाओं में तीन बड़ी सेनाओं वाले देश BRICS में हैं. BRICS का विस्तार भी विश्व के सभी महाद्वीपों में है, ऐसे में प्रतिनिधित्व की चिंताएं नहीं है. कुल मिलाकर देखा जाए तो BRICS, पश्चिमी देशों के समानांतर सबसे बड़ा समूह है और उतना ही प्रभावशाली भी है.
BRICS करेंसी क्या है?
पश्चिमी देशों की दादागिरी को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया यह समूह अब सहयोग के नए तरीके तलाश रहा है. वर्तमान में रूस को छोड़ कर BRICS में शामिल देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए SWIFT सिस्टम इस्तेमाल करते हैं. यह सिस्टम पश्चिमी देशों के नियंत्रण में है. अपनी मनमानी से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने और दबाव डालने की नीति से पश्चिमी देश SWIFT और ऐसी व्यवस्थाओं का उपयोग करने से रोक सकते हैं. वर्तमान में पश्चिमी देशों ने रूस के अरबों डॉलर इसी इन्हीं देशों ने दबा रखे हैं. ऐसे में BRICS देश अपनी एक समानांतर व्यवस्था बनाने पर भी विचार कर रहे हैं.
ब्राजील और रूस इन देशों के बीच एक कॉमन करेंसी के उपयोग की बात कर चुके हैं. भारत और चीन, रूस से पहले ही अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं. भारत और रूस आपस में तेल का व्यापार इसी तरीके से हो रहा है. इस तरीके से व्यापार ककरे इन देशों ने पश्चिमी देशों की व्यवस्थाओं को दरकिनार किया है. पीएम मोदी ने 2024 कजान समिट में इसका समर्थन भी किया है. ऐसे में यदि सभी देश किसी एक करेंसी में व्यापार करने को राजी होते हैं तो यह पश्चिमी देशों के लिए बड़ा झटका होगी. ऐसे में यह देश डॉलर के एकाधिकार को भी चुनौती दे सकेंगे.
ब्रिक्स देश नई करेंसी क्यों बनाना चाहते हैं?
रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में जंग समेत हाल की वैश्विक वित्तीय चुनौतियों और आक्रामक अमेरिकी विदेश नीतियों ने ब्रिक्स देशों को संभावना तलाशने के लिए प्रेरित किया है. वे अमेरिकी डॉलर और यूरो पर वैश्विक निर्भरता को कम करते हुए अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पूरा करना चाहते हैं. ब्रिक्स मुद्रा कब जारी की जाएगी? इकसी अभी तक लॉन्च की कोई निश्चित तारीख नहीं है, लेकिन इन देशों ने इस संभावना पर विस्तार से चर्चा की है. 2022 में 14वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी पुतिन ने नई वैश्विक आरक्षित मुद्रा की वकालत की थी. अप्रैल, 2023 में ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डिसिल्वा ने ब्रिक्स मुद्रा का समर्थन किया.
ब्रिक्स मुद्रा के क्या फायदे हो सकते हैं?
नई मुद्रा से ब्रिक्स देशों को कई लाभ हो सकते हैं, जिनमें अधिक कुशल सीमा पार लेनदेन और वित्तीय समावेशन में बढ़ोतरी शामिल है. ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी, डिजिटल करेंसी और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स का लाभ उठाकर ब्रिक्स मुद्रा वैश्विक वित्तीय प्रणाली में क्रांति ला सकती है. निर्बाध सीमा पार भुगतान के लिए यह ब्रिक्स देशों और उससे परे व्यापार और आर्थिक एकीकरण को भी बढ़ावा दे सकता है.
क्या ब्रिक्स मुद्रा संभव है, क्या हैं अड़चनें?
कुछ वित्तीय विश्लेषक इस बात के प्रमाण के रूप में 1999 में यूरो के निर्माण की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिक्स मुद्रा संभव हो सकती है. हालांकि, इसके लिए वर्षों की तैयारी, एक नए केंद्रीय बैंक की स्थापना और 5 देशों के बीच अपनी संप्रभु मुद्राओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक समझौते की जरूरत होगी. इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के लिए संभवतः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समर्थन की भी जरूरत होगी. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स मुद्रा एक जटिल विचार है, क्योंकि यह बहुत अलग अर्थव्यवस्था वाले देशों को एकजुट करेगा. ऐसी भी चिंताएं हैं कि डॉलर के नहीं होने पर चीन के युआन पर निर्भरता बढ़ सकती है.
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