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BW Class: आखिर क्या होता है FPO और IPO? दोनों में क्या है अंतर? यहां जानें सब कुछ

क्या आप जानते हैं कि FPO और IPO क्या होता है और कोई कंपनी इसे क्यों लेकर आती है? साथ ही, FPO और इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में फर्क क्या है? आइए आज इसी को समझते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

आजकल कंपनिया शेयर मार्केट में IPO और FPO लॉन्च कर रही हैं. जब किसी कंपनी को अपनी क्षमता या बिजनेस का विस्तार करने या अपने कर्ज को कम करने के लिए पैसे की आवश्यकता होती है, तो वे सार्वजनिक हो जाते हैं. IPO और FPO दोनों ही प्रोसेस हैं जो उन्हें इन्वेस्टर से पैसे प्राप्त करने और अपने बिजनेस के उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करते हैं. IPO का अर्थ प्रारंभिक पब्लिक ऑफर है और FPO का अर्थ है फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर. आइए जानते हैं कि FPO क्या है? यह कैसे काम करता है? IPO और FPO में क्या अंतर है?

क्या है इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO)?

जब कोई कंपनी पहली बार शेयर बाजार से पैसा जुटाना चाहती है, तो वह अपनी पूरी योजना के साथ SEBI में आवेदन करती है. मंजूरी मिलने के बाद ही IPO लॉन्च किया जा सकता है. कोई भी IPO एक तय समय के लिए खुलता और बंद होता है. यह समय प्रायः तीन से पांच दिन तक के लिए हो सकता है. ज्यादातर तीन वर्किंग दिन में ही यह प्रक्रिया पूरी की जाती है. अगर किसी कंपनी ने 10 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है और 20 हजार करोड़ रूपये के आवेदन आ गए तो इसे अच्छा माना जाता है. अगर 10 हजार करोड़ के अगेंस्ट कम से कम नौ हजार करोड़ यानि कि 90 फीसदी रकम निवेशकों से नहीं आई तो IPO रद्द हो जाएगा और निवेशकों का पैसा उनके खाते में वापस चला जाएगा. IPO ज्यादा कम्पनियां लाती हैं.

क्या है फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर (FPO)?

जब भी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कोई कंपनी निवेशकों को नए शेयर्स जारी करते हुए फंड जुटाती है, तो सीधी भाषा में इसे ही FPO कहते हैं. इसके लिए कंपनी को SEBI से अनुमति लेनी होती है. कोई भी FPO तय दिन के लिए खुल सकता है. उसी समय में कोई भी व्यक्ति या कंपनी FPO के लिए अप्लाई कर सकती है. भारत सरकार के नियम के मुताबिक यह तभी कामयाब माना जाएगा जब कुल लक्ष्य का 90 फीसदी रकम बाजार से जुट जाए. अगर इससे कम रकम जुटती है तो FPO फेल माना जाएगा और निवेशकों का पैसा उन्हें वापस कर दिया जाएगा.

IPO और FPO में अंतर? 

कंपनियां अपने एक्सपेंशन के लिए IPO या FPO का इस्तेमाल करती हैं. कारोबार बढ़ाने के लिए फंड की जरूरत पड़ने पर कंपनियां IPO या FPO का सहारा लेती हैं. कैश फ्लो की जरूरतों को पूरा करने या फिर कारोबार बढ़ाने के लिए इस फंड का इस्तेमाल होता है. 

- IPO के जरिए कंपनी पहली बार बाजार में अपने शेयर्स उतारती है. 
- FPO में अतिरिक्त शेयर्स को बाजार में लाया जाता है. 
- IPO में शेयरों की बिक्री के लिए फिक्स्ड प्राइस होता है, जिसे प्राइस बैंड कहते हैं. कंपनी शेयर का प्राइस बैंड लीड बैंकर्स तय करते हैं. 
- FPO के वक्त शेयरों का प्राइस बैंड बाजार में मौजूद शेयरों की कीमत से कम रखा जाता है. इसको शेयरों की संख्या के हिसाब भी तय किया जाता है. 
 


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