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आज़ादी के अमृत महोत्सव में नौकरी नहीं, काम को सम्मान चाहिए

यदि कामगार आरक्षण की वजह से अपने पारंपरिक हुनर को छोड़ देंगे, तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

पूरन डावर
(सामाजिक चिंतक एवं आर्थिक विश्लेषक)

जिन जातियों की काम के नाम से पहचान थी, जो देश के रोज़गार-स्वरोज़गार की नींव थे, देश की अर्थव्यवस्था को यदि ज्यादा सुदृढ़ नहीं कर रहे थे, तो कम से कम उस पर भार भी नहीं थे. उनके श्रम का सम्मान कम था या नहीं, यह एक अलग विषय है, लेकिन उन्हें अच्छी शिक्षा देकर लघु एवं मध्यम उद्योगों में बदला जा सकता था, मगर विडम्बना है कि उन्हें आरक्षण का झुनझुना पकड़ाकर जीवन पर्यन्त दलित घोषित ही नहीं, बल्कि दलित बना दिया गया.

नौकरी में आरक्षण बंद हो
चंद लोग असल मायनों आरक्षण का लाभ लेते हैं और वह भी सांसद,विधायक, आईएएस,सरकारी अधिकारी बनकर जीवन पर्यन्त दलित कहलाते हैं. बाकियों के हाथों से उनका काम छिन गया. डिग्री लेकर घूम रहे हैं और बेरोज़गारी का रोना रोने के अतिरिक्त उनके पास कुछ बचा नहीं है. आज़ादी के 75वें वर्ष में सरकार को, देश की संसद को कुछ सोचना होगा. डिग्री के साथ उनके पारम्परिक रोज़गारों के स्तर को उठाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना होगा. नौकरी में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था को बंद करना होगा. इसके बजाए आर्थिक आरक्षण पर ध्यान देना होगा. 

तो देश कैसे बढ़ेगा?
यदि कामगार आरक्षण की वजह से अपने पारंपरिक हुनर को छोड़ देंगे, तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा. उन्हें मुफ्त शिक्षा, सस्ती दरों में उच्च तकनीक प्रदान करना और इसके अलावा, कामकाज में विस्तार के लिए सस्ती ऋण व्यवस्था कारगर हो सकती है. पारंपरिक नाई (बाल काटने वाला) पढ़-लिखकर मेकओवर आर्टिस्ट बन सकता है, मसाज वाला स्पा या थेरेपी सेंटर खोल सकता है, मोची शू क्लीनिक में बदल सकता है, चर्मकार जूता कारख़ाने का मालिक बन सकता है, चायवाला कॉफी कैफे डे खोल सकता है, पकौड़े वाला मैकडॉनल्ड्स खड़ा कर सकता है, हलवाई 'हल्दी राम' बन सकता है, रसोइया शेफ़, गाय-भैंस पालने वाला डेरी मालिक हो सकता है. पढ़-लिखकर शाक्य या कुशवाह आधुनिक खेती कर फार्म मालिक बन सकते हैं, धोबी वॉशिंग हाउस खोल सकता है, ये महज जातियां नहीं लोगों के काम थे, लेकिन ज्यादा पढ़ा-लिखा न होने के कारण सम्मान नहीं था.

पूर्व के निर्णयों पर विचार ज़रूरी
आज़ादी का अमृत महोत्सव सही मायने में तभी सफल होगा, जब पूर्व के निर्णयों पर पुनर्विचार हो. सरकारी नौकरियों में आरक्षण उस समय की मांग हो सकती, उस समय के निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह नहीं है, लेकिन सभी कामगारों को नौकर नहीं बनाया जा सकता. आजादी के 75वें वर्ष में इन कामगार जातियों को दलित न मानकर कामगार का दर्जा देना होगा. सरकारी नौकरी नहीं प्रारम्भिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा के साथ उनको उद्यमियों के रूप में खड़ा करना होगा.
 


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