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अनिश्चित दौर में करियर की नई परिभाषा: मूल्य, सहयोग और सीख बन रहे हैं सफलता की असली नींव
समिट से उभरकर आने वाला संदेश साफ है. अनिश्चितता भले ही अपरिहार्य हो, लेकिन करियर की दिशा पूरी तरह परिस्थितियों के हवाले नहीं होती. अनुशासन, सहयोग, मूल्य, जिज्ञासा और सीखने की निरंतर इच्छा ऐसे आधार हैं, जिन पर टिकाऊ और सार्थक करियर खड़े होते हैं.
रितु राणा 2 months ago
तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, अस्थिर जॉब मार्केट और करियर के कम पूर्वानुमेय होते रास्तों के बीच, सफलता की पारंपरिक परिभाषा पर सवाल खड़े हो रहे हैं. वरिष्ठ पेशेवरों का मानना है कि अब दीर्घकालिक करियर स्थिरता केवल पद, वेतन या रैखिक प्रगति से नहीं, बल्कि मूल्यों, सहयोग, अनुशासन और निरंतर सीखने की क्षमता से तय होती है. यही विमर्श हाल ही में आयोजित सनावर सक्सेस समिट के केंद्र में रहा. इस समिट में मुख्य अतिथि के रुप में शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव आईएएस संजय कुमार भी शामिल हुए.
नेतृत्व की समझ कैसे बदली
समित के तीसरे सत्र की शुरुआत करते हुए कंसोर्टियम गिफ्ट्स के संस्थापक गौरव भगत ने भारत सरकार के नेचुरल रिसॉर्स मैनेजमेंट और एग्रोइकोलॉजी विभाग के निदेशक राजीव अहल से पूछा कि क्या समय के साथ उनके लिए सफलता और व्यक्तिगत उपलब्धि का अर्थ बदला है, और कब यह सोच लोगों और संस्थानों की जिम्मेदारी की ओर मुड़ने लगी.
इस पर राजीव अहल ने कहा कि नेतृत्व हमेशा उस संदर्भ से परिभाषित होता है जिसमें व्यक्ति काम कर रहा होता है. अलग-अलग प्रणालियों और चुनौतियों के लिए नेतृत्व के अलग रूप होते हैं. उनके अनुसार, सतत विकास से जुड़ा काम, जैसे जंगलों का संरक्षण, जल प्रबंधन और ग्रामीण गरीबों की आय बढ़ाना, किसी एक व्यक्ति के प्रयास से संभव नहीं है.
बड़े बदलाव के लिए सहयोग क्यों जरूरी है
राजीव अहल ने कहा कि भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और शासन जैसे क्षेत्र आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं. ऐसे में व्यापक और टिकाऊ बदलाव लाने के लिए सहयोग अनिवार्य हो जाता है. उन्होंने प्रसिद्ध कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि अगर तेज जाना है तो अकेले जाओ, लेकिन अगर दूर तक जाना है तो साथ चलना होगा.
उनके अनुसार, चाहे वह किसी गांव में छोटे एनजीओ के साथ काम कर रहे हों या आज बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर कई मंत्रालयों और राज्यों के साथ काम कर रहे हों, अनुभव ने यही सिखाया है कि साझा प्रयास के बिना ठोस नतीजे नहीं मिलते.
पदनाम नहीं, भूमिका पर फोकस
अहल ने बताया कि उनके लिए सबसे प्रभावी तरीका पदनामों से आगे बढ़कर भूमिकाओं पर ध्यान देना रहा है. भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना और लोगों को उन्हें सही मायनों में निभाने के लिए सशक्त बनाना बेहतर परिणाम देता है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नेतृत्व में प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता. कई बार अहंकार और पहचान अनावश्यक प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है, जबकि असल जरूरत सहयोग की होती है.
जोड़ी में काम करने की रणनीति
अपने अनुभव साझा करते हुए राजीव अहल ने बताया कि उनके लिए एक कारगर रणनीति यह रही है कि हर अहम विषय पर हमेशा दो लोग साथ काम करें. इससे विचारों और दृष्टिकोण में विविधता आती है और काम की निरंतरता बनी रहती है. अगर एक व्यक्ति अनुपलब्ध हो, तो दूसरा काम को आगे बढ़ा सकता है.
अनिश्चितता में मूल्य बनते हैं सहारा
समिट में अनिश्चितता के दौर में मूल्यों की भूमिका पर भी गहन चर्चा हुई. गौरव भगत ने कहा कि विश्वास के संकट से जूझती दुनिया में, दीर्घकालिक सफलता के लिए मूल्य ही एकमात्र गैर-समझौता योग्य आधार हैं. उनके अनुसार, आज सफलता को केवल वित्तीय नतीजों से नहीं आंका जा रहा, बल्कि उद्देश्य, विश्वसनीयता और सामाजिक योगदान भी उतने ही अहम हो गए हैं. जिन करियरों में नैतिक आधार नहीं होता, वे समय के साथ अपनी गति खो देते हैं.
जिज्ञासा और सीख की भूमिका
भारत के योजना आयोग के पूर्व सदस्य अरुण मैरा ने करियर में अनुकूलन क्षमता विकसित करने में जिज्ञासा की अहमियत पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि जिज्ञासा आजीवन सीखने की नींव है. जब कोई चीज अप्रासंगिक लगती है, वही पल गहरे सवाल पूछने का होता है. उनके अनुसार, बदलते समय में वही पेशेवर आगे बढ़ पाते हैं जो सीखने के लिए खुले रहते हैं और नए संदर्भों को समझने की कोशिश करते हैं.
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