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आज के एजुकेशन सिस्टम में क्या है सबसे जरूरी, जिससे गारंटीड मिलेगी Job

भारत में लोग बड़े स्तर पर जॉब की तलाश में हैं, पर एक सबसे जरूरी क्वालिटी उनके अंदर है ही नहीं और इसके जिम्मेदार संस्थान हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: जब भारत सरकार ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 (NEP 2020) के तहत शिक्षा प्रणाली में बदलाव की घोषणा की, तो उम्मीद की एक नई किरण जगी. यह बदलाव ऐसे मोड़ पर आया जब शिक्षक और संस्थान दुनिया की पुरानी संरचना को ही फॉलो कर रहे थे. वह मॉडल ठीक तरीके से काम नहीं कर रहा था, जिसे ब्राजील के शिक्षक पॉल फ्रायर 'शिक्षा का बैंकिंग मॉडल' कहते हैं. पुराने सिस्टम में छात्रों ने जो कुछ भी सीखा, वो आज के दौर में नई दुनिया के लिए प्रासंगिक नहीं था. छात्र अपना समग्र विकास करना चाहते थे, बड़े विचारक बनना चाहते थे, आज की दुनिया के हिसाब से प्रैक्टिकल नॉलेज हासिल करना चाहते थे और ऐसा स्किल सेट करना चाहते थे, जिससे उन्हें रोजगार मिल सके.

सूचना का अर्थ शिक्षा नहीं
AISECT में हमेशा यह माना जाता रहा है कि सूचना का अर्थ शिक्षा नहीं है और यह एक-दूसरे का पर्याय नहीं हैं. 1985 में अपनी स्थापना के बाद से ही AISECT ने व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करने पर पूरा फोकस किया और यह प्रयास किया कि उनकी पहुंच भारत के जमीनी स्तर तक हो. व्यावहारिक शिक्षा कुशल और रोजगार योग्य युवा बनने में मदद करती है. जब संतोष चौबे ने AISECT की शुरुआत की, तब शिक्षा में कई स्तर पर गैप था, जिसे व्यावहारिक शिक्षा ने भरने का काम किया. AISECT में शुरू से ही इस बात को माना जाता है कि शिक्षा और ज्ञान की ताकत उस माध्यम पर डिपेंड करती है जो इसे प्रदान किया जाता है. इस दिशा में सबसे पहले जो कदम उठाया गया, वो है- क्षेत्रीय भाषाओं में सिलेबस पेश करना, जिसे NEP भी मान्यता देता है और पूरा समर्थन करता है.

जॉब और स्किलिंग इंडस्ट्री ने कई बदलाव देखे
आज जॉब और स्किलिंग इंडस्ट्री ने कई बदलाव देखे हैं. हालांकि, आज भारत में जितनी आबादी नौकरी की तलाश में है, उसके सामने एक बड़ी चुनौती शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल का नहीं होना है. आज के समय में उद्योग जिस स्किल की तलाश करते हैं, नौकरी की खोज में जुटे लोगों में वो है नहीं. 

कैसे लोगों की तलाश में हैं एम्प्लॉयर्स
एम्प्लॉयर्स इन दिनों सिर्फ उन्हीं लोगों की तलाश नहीं कर रहे, जिन्हें सिर्फ टेक्निकल नॉलेज हो. वे ऐसे लोगों की तलाश में हैं, जिनके पास टेक्निकल नॉलेज के साथ-साथ सॉफ्ट स्किल्स, जैसे- कम्यूनिकेशन, क्रिटिकल थिंकिंग और समस्या को समाधान करने की क्षमता भी हो. इसके अलावा उनके अंदर लीडरशिप, टीमवर्क और इमोशनल इंटेलिजेंस क्वालिटी भी होनी चाहिए. यह जिम्मेदारी मूल रूप से विश्वविद्यालयों और संस्थानों की होनी चाहिए कि वे ट्रेनिंग, रीस्किलिंग और अपस्किलिंग में समय और संसाधनों का निवेश करें. सरकार का कर्तव्य ऐसी नीतियों को लागू करना है जो भविष्य के अनुकूल करियर के अवसर सुनिश्चित करें और व्यक्तियों को कंपनियों की जरूरतों के हिसाब से तैयार करें.

बाजार की मांग
स्किल को रोजगार और राष्ट्र के आर्थिक विकास में वृद्धि के लिए सबसे जरूरी पिलर माना जाता है. औद्योगिक बाजार की जॉब करने योग्य स्किल की बढ़ती मांग ने हाई एजुकेशन में स्किल-बेस्ड शिक्षा को शामिल करने पर मजबूर कर दिया है. हाई एजुकेशन में स्किल बेस्ड शिक्षा होने से दुनिया के किसी कॉम्पिटीशन में भारतीय छात्र पीछे नहीं हो सकते. स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे देश, जो व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए मशहूर हैं, ने भी इसे पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है. यूनिवर्सिटीज को हाई एजुकेशन सिलेबस में स्किल-बेस्ड और रियलिस्टिक नॉलेज पर जोर देना चाहिए, जिससे छात्र भविष्य के लिए तैयार हो सकें और उन्हें दुनिया के किसी भी कोने में आसानी से जॉब मिल सके.

स्किलिंग के लिए प्रोत्साहन
आज के समय में जब भारत चौथी औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, स्किल, हाई एजुकेशन और जॉब के मौजूदा सिस्टम को नया रूप देने की आवश्यकता है. सही नौकरी में टैलेंट की नियुक्ति में पीपीपी मॉडल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग 400 मिलियन लोगों को प्रशिक्षित करने की महत्वाकांक्षा के साथ 2015 में कौशल भारत पहल की शुरुआत की. इसके लिए हाल में ही मंत्रिमंडल से 12,000 करोड़ रुपये की राशि स्वीकार की गई. यह बताता है कि सरकार स्किल पर कितना फोकस करना चाह रही है.
 


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