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Exclusive: दुकानदार हो या ग्राहक सभी की आदत बदलने में समय लगता है: CEO ONDC 

CEO ONDC टी कोशी कहते हैं कि जनवरी में हमारे पास लगभग 800 व्यापारी थे, जबकि आज ये संख्‍या 2,00,000 से अधिक जा चुकी है और ये लगातार बढ़ रही है.

ललित नारायण कांडपाल 2 years ago

पिछले कुछ सालों में ई-कॉमर्स बाजार में एक नाम तेजी से सफलता की ओर आगे बढ़ा है. अब भले ही बिजनेस हो या ग्राहक हो इसने सभी को समाहित करने का जो अवसर पैदा किया है उसने सभी को फायदा पहुंचाया है. जिस नाम ने सभी को प्रभावित किया है वो है ONDC (Open Network for Digital Commerce). आज से सात साल पहले शुरू हुए सरकार के इस वेंचर को लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई जा रही थी लेकिन आज इसने बाजार में अपनी सफलता से सभी को हैरान कर दिया है. ONDC को इस मुकाम पर पहुंचाने वाले इसके सीईओ टी कोशी के साथ हमारे प्रिंसिपल कॉरेसपोंडेंट ललित नारायण कांडपाल ने कई मामलों को लेकर बात की है. इसमें टी कोशी बताते हैं कि आखिर उन्‍होंने ONDC के लिए क्‍या सपना देखा है?

सवाल: ONDC के साथ ई-कॉमर्स बाजार को पूरी तरह से बदलने के लिए आपने अब तक कितना लंबा सफर तय किया है? 

जवाब : टी कोशी कहते हैं कि UPI की शुरुआत 7 साल पहले हुई थी. इस प्रोजेक्‍ट को लाने के पीछे विचार ये था कि भारत के ई-कॉमर्स बाजार को पूरी तरह से बदल दिया जाए, इसके लिए कुछ सालों तक फाउंडेशन तैयार करने के बाद आज ये हमारे सामने दिख रहा है. ONDC के लिए हमने पिछले कैलेंडर वर्ष में जनवरी के महीने से बेंगलुरु के लोगों के लिए व्यापक रूप से सेवाओं को देने की शुरुआत की थी, और यह तब से लगातार आगे बढ़ रहा है.

देखिए किसी भी चीज में बदलाव आने में समय लगता है. कोई भी चीज अब वो भले ही खरीददार के लिए हो या विक्रेता के लिए हो उनकी आदतों को बदलने में समय लगता है. ONDC में एक बड़ी चुनौती इस बारे में है कि यह व्यापार के बारे में है जबकि UPI धन के बारे में था. जोकि पूरी तरह से डिजिटल था और  जो बैंक्स और फिनटेक कंपनियों के माध्यम से हो रहा था. लेकिन ONDC में यहां हम एक लेन-देन के साथ एक डिजिटल समझौता होने और इसमें भाग लेने वाली कई कंपनियों जैसे यूनिलीवर (Unilever), पेप्सी (Pepsi), कोका-कोला (Coca-Cola.) और दूसरी कई कंपनियों सहित, विभिन्न प्रकार के गारमेंट कंपनियों के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन की बात कर रहे हैं.

टी कोशी कहते हैं कि जनवरी में हमारे पास लगभग 800 व्यापारी थे, जबकि आज ये संख्‍या 2,00,000 से अधिक जा चुकी है और ये लगातार बढ़ रही है. अगले साल इस समय तक, मैं उम्मीद करता हूं कि इसमें 2,00,000 व्यापारी और जुड़ जाएंगे और ये दो मिलियन तक पहुंच सकते हैं. हमें आईटीसी जैसे बड़े एंटिटीज़ से महत्वपूर्ण स्वीकृति मिल रही है. उसी तरह, आप देखेंगे कि हमारे पास लगभग 1,00,000 टैक्सी ड्राइवर्स और ऑटो ड्राइवर्स हैं, जो पहले से ही 2000 फार्मर्स प्रोड्यूसिंग आर्गेनाइजेशन्स (FPOs) से जुड़ चुके हैं.

सवाल: ONDC पर आप किस सेक्‍टर की बड़ी भागीदारी को देख रहे हैं? 

जवाब: अगर हम किसी व्यापारिक लेन-देन को समझें तो उसमें होता ये है कि खरीददार विक्रेता को पैसे देता है, दूसरी ओर, विक्रेता सामान या सेवाएँ देता है. यूपीआई ने वही काम किया. चाहे आप कुछ भी खरीद रहे हों, पैसे पैसे होते हैं. लेकिन जब सेलर की बात आती है तो ये प्रोडक्‍ट हो सकता है, सर्विस हो सकती है, B2B हो सकता है, B2C हो सकता है, इसलिए यदि आप ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों की ओर देखते हैं, तो कुछ उपभोक्ता सामान के लिए हैं, कुछ खाने-पीने के लिए हो सकता है, क्योंकि यह उनके लिए सब कुछ है साथ ही कई अन्य क्षेत्रों के साथ कैसे निपट सकते हैं.

लेकिन हमने सबसे मुश्किल पर काम करने का तय किया, जो ग्रोसरी और फूड है, हम सोचते थे कि अगर हम इन दो क्षेत्रों की जरूरत को सीखने में कामयाब हो गए तो हम दूसरों में भी आसानी से बेहतर कर लेंगे. हमने तुरंत मोबाइलिटी की ओर बढ़ना शुरू किया. हमारे पास लगभग 1,00,000 टैक्सी चालक पहले से ही पंजीकृत हैं, औसतन दिन में लगभग 1,00,000 लेन-देन कर रहे हैं. ग्रोसरी के मामले में शायद सबसे बड़ी चुनौती थी, जहां छोटे व्यापारी द्वारा ऑनलाइन लेन-देन पर पहले एक जीएसटी में रजिस्‍टर्ड होना जरूरी था लेकिन सरकार ने इस महीने से उस प्रतिबंध को हटा दिया है. हमने प्रयोग के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स, फैशन, सौंदर्य और व्यक्तिगत हर क्षेत्र में काम करना शुरू किया.  B2B में लाइव होने के बाद हमने पिछले महीने 30,000 लेन-देन देखे. हमें इस व्यवसाय में विभिन्न उद्यमों को इस तरीके से समझाना होगा कि यह ई-कॉमर्स कैसे बदल रहा है. कुछ लोग जल्दी अपनाने वाले होते हैं, और कुछ देरी से अपनाते हैं. 

सवाल: आपने ONDC के लिए कौन सा सपना देखा है? आप इसे कहां लेकर जाना चाहते हैं?

जवाब: मेरा ONDC को लेकर एक विजन है. हम चाहते हैं कि 4 या 5 साल में, हिंदुस्तान में कोई भी व्यापारी, जिसमें कोई उत्पाद या सेवा है, उसका कैटलॉग बना सकता है. कैटलॉग का मतलब है कि ज्यादा लोग इसमें रुचि ले सकते हैं. प्रत्येक व्यापारी अपना कैटलॉग डिजिटल रूप से ONDC नेटवर्क पर दिखा सकता है. वे एक ऑर्डर के बारे में जान सकते हैं, एक समझौता कर सकते हैं और सामान पहुंचा सकते हैं. एक खरीदी एप्लिकेशन आएगा, जो हर नागरिक के लिए मौजूद सामान को खरीदने में मदद करेगा. हम इस नेटवर्क में सभी व्यापार और सभी खरीददारों से संभावित भागीदारी की उम्मीद करते हैं, जिसमें आज की तरह बहुत सी सीमा होती है.

इसका मतलब यह नहीं है कि यह 100 प्रतिशत डिजिटल होगा, लेकिन डिजिटल व्यापार का स्तर 4 गुना हो जाएगा. आने वाले 5-7 साल में, लगभग 20-30 प्रतिशत सभी लेन-देन डिजिटल होंगे. हमारे पास भारत में पहले स्तर की भागीदारी देखने के लिए बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय निवेशक भी हैं और संभावना है कि वे इसे वैश्विक रूप से कैसे ले जा सकते हैं. हमारी कोशिश ये है कि भारतीय उपभोक्‍ताओं के लिए मददगार हो और सार्थक हो. हमारे व्‍यापारियों को इसके जरिए एक बड़ा बाजार मिले और जिसमें यह स्वाभाविक रूप से आकर्षित हो.

सवाल: व्‍यापारियों को इस प्लेटफार्म पर लाने में आप किस प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं?
जवाब: ONDC के सीईओ टी कोशी कहते हैं कि इसमें लाभ यह है कि सभी की भागीदारी संभव है. बड़े लोग, छोटे लोग, सभी डिजिटल वाणिज्य में आ सकते हैं. चुनौती दो पहलुओं में है. पहली बाजार में पहले से मौजूद खिलाडि़यों से चुनौती है और दूसरी ये है कि लोगों को बताना है कि ONDC क्या है और कैसे काम करता है, और उन्हें इसका पूरी तरह से उपयोग करना कैसे सिखाना है, ताकि वे ONDC के लाभ को सही तरीके से समझ सकें. हम मंत्रालयों के साथ संयुक्त अभियान भी चला रहे हैं.

सवाल: आपने डिजिटल अर्थव्यवस्था के बारे में बात की है। क्‍या आपने इसका अनुमान लगाया है कि एक बार लागू करने के बाद ये कैसे हमारी अर्थव्‍यवस्‍था पर असर डाल सकता है? 
जवाब: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप किसी भी व्‍यापार को एक बड़े किस्म के बाजार में और अंतराष्ट्रीय रूप से अपने बाजार को बढ़ाने के अवसर प्रदान कर रहे हैं. हम ऐसा कह सकते हैं कि उत्तर भारत के लोगों को दक्षिण भारत के लोग नहीं जानते हैं. अब जब यह आसानी से उपलब्ध हो रहा है, ये एक सेतू का काम कर रहा है. इससे सामान की स्वीकार्यता में और ज्‍यादा इजाफा होगा और शायद अंतरराष्ट्रीय रुचि भी पैदा होगी क्योंकि विक्रेता इंटरफ़ेस, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, प्रमाणन जैसे विभिन्न बिल्डिंग ब्लॉक डिजिटल रूप से प्रासंगिक हो गए हैं.
 


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