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दूसरों का ख्याल रखने से पहले खुद का रखें ध्यान, क्यों जरूरी है आत्म-देखभाल?
BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4Media के संस्थापक डॉ. अनुराग बत्रा ने लेखिका, प्रमाणित मेटाफिजिशियन, माइंडसेट कोच, सामाजिक उद्यमी और Maheshwari Foundation की संस्थापक संगीता माहेश्वरी के साथ विचारोत्तेजक बातचीत की.
डॉ. अनुराग बत्रा 1 hour ago
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम काम, परिवार और रिश्तों की जिम्मेदारियां निभाते हुए अक्सर खुद की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं. दूसरों को समय और महत्व देने के बीच यह भूल जाते हैं कि अपनी भावनात्मक और मानसिक सेहत का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है. आत्म-देखभाल का मतलब सिर्फ खुद के लिए समय निकालना नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को समझना, खुद को महत्व देना और दूसरों से मान्यता पाने की जरूरत से बाहर निकलना भी है. BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4Media के संस्थापक डॉ. अनुराग बत्रा ने लेखिका, माइंडसेट कोच और Maheshwari Foundation की संस्थापक संगीता माहेश्वरी से बातचीत में आत्म-देखभाल, भावनात्मक संतुलन और खुद को बेहतर ढंग से समझने के महत्व पर चर्चा की. प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:
आपको किताबें लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती है?
मुझे अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरणा मिलती है. मुझे चीजों को देखना, उन पर विचार करना और खुद से गहरे सवाल पूछना पसंद है. आत्मचिंतन मुझे परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है. दुनिया भर में यात्रा करने और विभिन्न संस्कृतियों तथा जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों से मिलने और बातचीत करने के दौरान जीवन ने मुझे कई सबक सिखाए हैं. किताबें लिखने का मेरा उद्देश्य इन सीखों और बातचीत से मिले अनुभवों को साझा करना है, ताकि उन लोगों को इसका लाभ मिल सके, जो इस समय अपने जीवन में किसी न किसी तरह की मुश्किल का सामना कर रहे हैं.
आपकी किताब 'फिल योर ओन कप' किस बारे में है?
यह मेरी तीसरी किताब है और पारंपरिक आत्म-देखभाल से जुड़ी किताबों से थोड़ी अलग है. यह उन सभी लोगों के लिए है, जो कई भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे वे विद्यार्थी हों, युवा कामकाजी पेशेवर हों या किसी की देखभाल करने वाले व्यक्ति हों. 'फिल योर ओन कप' का मतलब है खुद की जिम्मेदारी लेना और दूसरों से अपनी अहमियत की पुष्टि की अपेक्षा नहीं करना.
आपने प्रकाशन कंपनी सोल स्क्राइब की स्थापना की है. इसका उद्देश्य क्या है?
सोल स्क्राइब की संस्थापक बनने का मुख्य उद्देश्य अपनी किताब प्रकाशित करना था. 'सोल' का अर्थ हमारी चेतना से जुड़ी किसी चीज से है और 'स्क्राइब' का अर्थ लिखना है. मेरी सभी किताबें आत्म-परिवर्तन की यात्रा के बारे में हैं और मुझे लगता है कि उनमें आत्मा से जुड़ी गहराई है.
इसके पीछे उद्देश्य लोगों तक परिवर्तनकारी संदेश और नए दृष्टिकोण पहुंचाना है, ताकि वे उनसे लाभ उठा सकें. इसके अलावा, यह उन दूसरे लेखकों की मदद करने का भी प्रयास है, जो ऐसा मंच तलाश रहे हैं, जहां उनकी बात सुनी जा सके. केवल व्यावसायिक लाभ की संभावना न होने के कारण किसी किताब को प्रकाशित होने से वंचित नहीं रहना चाहिए. उसके संदेश पाठकों तक पहुंचने चाहिए और दुनिया तक परिवर्तनकारी विचारों को पहुंचने का अवसर मिलना चाहिए.
आपके विचार में इस किताब को पढ़ने वाले व्यक्ति को किस तरह की भावनाओं से गुजरना पड़ सकता है?
खुद पर काम करने और खुद को बदलने की प्रक्रिया में व्यक्ति कई तरह की भावनाओं से गुजरता है. यह कोई सीधी रेखा नहीं है. आपको आश्चर्य हो सकता है कि आप किसी बात से पहले अनजान थे. इसके अलावा, आप दुख, पीड़ा, उदासी और गुस्से जैसी भावनाओं का अनुभव भी कर सकते हैं. हो सकता है कि आपने इन भावनाओं से निपटने के बजाय उन्हें दबाकर रखा हो, लेकिन अब समय है कि आप उनका सामना करें और उन्हें अपने भीतर से बाहर निकालें.
इसे ऐसे समझिए, जैसे किसी कार में दो इंजन हों और आप केवल आधे इंजन के सहारे काम कर रहे हों, जबकि बाकी डेढ़ इंजन काम ही नहीं कर रहा हो. मूल रूप से, भावनाएं हमें रोक सकती हैं, लेकिन उनका पूरी तरह सामना करना और उन्हें समझना ही सही तरीका है.
कोई व्यक्ति कैसे जान सकता है कि उसके शरीर का संतुलन बिगड़ गया है और वह इसे दोबारा कैसे बहाल कर सकता है?
दर्द हमें संकेत देते हैं. जैसे सिरदर्द, शरीर में दर्द, अस्वस्थ महसूस करना और दिमाग में धुंधलापन महसूस होना आदि. शरीर में कई तरह के लक्षण दिखाई देते हैं, जिनसे हमें पता चलता है कि किसी चीज पर ध्यान देने और उसमें सुधार करने की जरूरत है.
आज हम दवाओं और चिकित्सा संबंधी उपायों पर काफी हद तक निर्भर हैं. लेकिन ये संकेत हमें बताते हैं कि हमें रुककर एक कदम पीछे हटना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हमने किन समस्याओं का समाधान नहीं किया है. हो सकता है कि हमारे मन के किसी कोने में कोई ऐसी परिस्थिति हो, जिससे हमने अभी तक निपटने की कोशिश न की हो. कई बार दर्द उन्हीं अनसुलझी परिस्थितियों के रूप में सामने आते हैं.
कोई व्यक्ति खुद को दोबारा ऊर्जावान और संतुलित कैसे बना सकता है?
खुद को फिर से ऊर्जावान बनाने का मतलब है अपने लिए समय निकालना, खुद को महत्व देना और यह समझना कि आप भी मायने रखते हैं. काम, परिवार, रिश्तों और जीवनसाथी सहित कई लोगों को समय और ध्यान देते हुए हम अक्सर खुद को उतना ही महत्व देना भूल जाते हैं.
इसका मतलब है खुद को वह सम्मान देना, जिसके आप हकदार हैं. यह समझना जरूरी है कि आपकी भी अपनी जिंदगी है. कुछ रिश्तों के आपकी जिंदगी में आने से पहले भी आपका अपना जीवन था.
कभी-कभी दूसरों पर निर्भरता इतनी बढ़ जाती है कि वे हमारे लिए इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि हमें लगता है कि हम उनके या उन रिश्तों के बिना नहीं रह सकते. इसी स्थिति में हम खुद को खोने लगते हैं.
अपने भीतर ताकत तलाशना, आत्मचिंतन करना, रुकना, चीजों को ध्यान से देखना, सुनना, खुद का ख्याल रखना, व्यायाम करना, अच्छा पोषण लेना और पर्याप्त आराम करना जरूरी है. इसके साथ ही प्रेरणादायक लोगों से मिलना और सकारात्मक, रचनात्मक तथा नए विचारों पर बातचीत करना भी फायदेमंद है.
आजकल चारों ओर फैली नकारात्मकता के बीच हमें उससे कुछ समय के लिए दूरी बनानी चाहिए और अंधेरे बादलों के बीच उम्मीद की किरण तलाशनी चाहिए. हम तभी खुद को संपूर्ण महसूस कर सकते हैं, जब हम खुद को बेहतर बनाने और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सही कदम उठाते हैं. अपने भीतर के खालीपन को भरने का मतलब है खुद को समझना और अपने लिए कुछ करके सकारात्मक बने रहना.
क्या कोई किताब कोच की जगह ले सकती है?
दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है. कोई भी किताब एक अच्छी साथी हो सकती है. इस किताब में संदेश, सवाल और जवाब एक टूलकिट की तरह हैं, जिनकी मदद से जरूरत पड़ने पर मार्गदर्शन लिया जा सकता है. आप अपनी गति और अपने समय के अनुसार इस पर काम कर सकते हैं. हालांकि, कोई किताब कोच की जगह नहीं ले सकती.
कोच वह व्यक्ति होता है, जिसके पास आप अपनी विशिष्ट भावनाओं और समस्याओं पर काम करने के लिए जाते हैं. किताब आपको अपने व्यवहार के पैटर्न पहचानना, अपना नजरिया व्यापक बनाना और अलग-अलग सीखों, सबकों तथा अनुभवों से गुजरना सिखाती है. लेकिन किसी खास भावना से जुड़ी समस्या को समझने और उससे निपटने के लिए कोच की मदद की जरूरत हो सकती है. हर व्यक्ति के काम करने का अपना तरीका होता है.
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