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भारत के इतिहास का सबसे बड़ा IPO, लेकिन एक बड़ा सवाल: आखिर यह किसके लिए है?
जियो के 30,213 करोड़ रुपये के इश्यू का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज चुकाने में जाएगा, कोई भी मौजूदा निवेशक एक भी शेयर नहीं बेच रहा है और रिलायंस के शेयरधारक तीन साल से ठहराव के बाद भी इंतजार कर रहे हैं. देश का सबसे बड़ा IPO अपने सबसे बड़े सवालों को अनुत्तरित छोड़ रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 59 minutes ago
पलक शाह
जब जियो प्लेटफॉर्म्स का 27,000 करोड़ रुपये का पब्लिक इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, तो इसे भारतीय पूंजी बाजार के परिपक्व होने के एक अहम पड़ाव के रूप में पेश किया जाएगा. भारत का सबसे बड़ा IPO. करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाली कंपनी. 52.4 करोड़ से ज्यादा ग्राहक. रिलायंस की लंबे समय से वादा की जा रही ‘वैल्यू अनलॉकिंग’ आखिरकार पूरी हो रही है. लेकिन प्रेस रिलीज के बजाय आंकड़ों को देखें, तो एक कम आकर्षक तस्वीर सामने आती है.
आपका पैसा, उनका कर्ज
सबसे पहले यह देखें कि पैसा कहां जाएगा. इश्यू दस्तावेज के रिपोर्ट किए गए विवरण के मुताबिक, इश्यू से मिलने वाली रकम में से 27,500 करोड़ रुपये तक का इस्तेमाल रिलायंस जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाने या समय से पहले भुगतान करने में किया जाएगा. यह इश्यू के कुल आकार का 90 फीसदी से ज्यादा है. बची हुई छोटी रकम सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होगी. नई स्पेक्ट्रम खरीद या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी उन महत्वाकांक्षाओं के लिए कोई खास रकम निर्धारित नहीं की गई है, जिनका जिक्र रिलायंस की सालाना बैठकों में होता है.
मार्च 2026 तक जियो पर कुल 70,781 करोड़ रुपये का कर्ज था. IPO की रकम मिलने के बाद भी कंपनी की बैलेंस शीट पर 43,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज बना रहेगा. नए शेयरधारक जियो के भविष्य को वित्तपोषित नहीं कर रहे हैं. वे उसके अतीत के कर्ज का पुनर्वित्तपोषण कर रहे हैं.
यह न तो गैरकानूनी है और न ही असामान्य. लेकिन निवेशकों को यह बात साफ-साफ बताई जानी चाहिए.
कोई शेयर नहीं बेच रहा. सवाल पूछिए क्यों
यह इश्यू पूरी तरह नए शेयर जारी करने पर आधारित है. इसमें ऑफर फॉर सेल (OFS) नहीं है. करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज कोई शेयर नहीं बेच रही है. मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, मेटा, गूगल या 2020 में जियो में बड़ी रकम लगाने वाले वैश्विक फंड भी अपने शेयर नहीं बेच रहे हैं.
जब शुरुआती निवेशकों में से कोई भी रिकॉर्ड मूल्यांकन पर अपने शेयर नहीं बेच रहा है, तो आम निवेशकों को यह पूछने का अधिकार है कि ऐसा क्यों है. उन्हें यह भी जानना चाहिए कि शेयरों पर लगी लॉक-इन अवधि कब खत्म होगी, क्योंकि अंततः बाजार में इन शेयरों की आपूर्ति आएगी.
कंपनी का बहुत छोटा हिस्सा
प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर पर यह इश्यू जियो की कुल हिस्सेदारी के 3 फीसदी से भी कम का प्रतिनिधित्व करता है. बाजार में इतने कम शेयर उपलब्ध होने के कारण लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत कंपनी के वास्तविक मूल्य से ज्यादा शेयरों की कमी और इंडेक्स फंडों की खरीदारी को दर्शा सकती है. न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों को पूरा करने के लिए भविष्य में जारी किए जाने वाले शेयरों की हर किस्त भी आगे चलकर बाजार पर दबाव डाल सकती है.
एक ऐसा ब्रांड, जिसका मालिकाना हक उसके पास नहीं
जोखिम से जुड़े खुलासों में एक ऐसी बात है, जिसे हर खरीदार को दो बार पढ़ना चाहिए. इश्यू दस्तावेज का विश्लेषण करने वाली ब्रोकरेज फर्मों की रिपोर्टों के मुताबिक, ‘जियो’ ट्रेडमार्क का मालिकाना हक रिलायंस ग्रुप के केंद्रीय स्तर पर है और जियो प्लेटफॉर्म्स का इस बात पर नियंत्रण नहीं है कि समूह की अन्य कंपनियां इसका इस्तेमाल कैसे करती हैं. जियोमार्ट, जियो फाइनेंशियल और समूह की दूसरी कंपनियां भी यही नाम इस्तेमाल करती हैं. इनमें से किसी भी कंपनी की समस्या का असर उस सूचीबद्ध कंपनी पर पड़ सकता है, जिसके अल्पांश शेयरधारकों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी.
ट्रेडमार्क का मालिक कौन है? क्या जियो प्लेटफॉर्म्स इसका इस्तेमाल करने के लिए भुगतान करती है? क्या लिस्टिंग के बाद यह शुल्क लगाया जा सकता है या बढ़ाया जा सकता है? ये विरोध जताने वाले सवाल नहीं हैं. ये बुनियादी सवाल हैं.
यही बात संबंधित पक्षों के साथ होने वाले लेनदेन पर भी लागू होती है. जियो अपनी सेवाओं के वितरण और बिक्री के लिए रिलायंस रिटेल समेत रिलायंस के व्यापक कारोबारी नेटवर्क पर निर्भर है. जब प्रमोटर किसी अनुबंध के दोनों पक्षों में शामिल हो, तो स्वतंत्र निदेशकों को कीमत तय करते हुए स्पष्ट रूप से देखा जाना चाहिए. साथ ही, हर तिमाही में ऐसे लेनदेन की कुल रकम सार्वजनिक की जानी चाहिए.
इधर, मूल कंपनी का हाल
अगर जियो का IPO नए निवेशकों के लिए सवाल खड़े करता है, तो यह रिलायंस इंडस्ट्रीज के मौजूदा शेयरधारकों के लिए और भी कठिन सवाल उठाता है.
14 अक्टूबर को RIL के शेयर करीब 1,176 रुपये पर बंद हुए. यह 1,611.80 रुपये के 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर से एक चौथाई से भी ज्यादा नीचे है. हाल के सप्ताहों में शेयर ने 52 सप्ताह का नया निचला स्तर भी छुआ है. तीन साल के दौरान शेयर में कुल मिलाकर कोई खास बढ़त नहीं हुई है. डिविडेंड यील्ड करीब आधा फीसदी है.
पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न भी यही कहानी बताता है. Screener.in के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित नियोजित पूंजी पर रिटर्न (ROCE) करीब 10 फीसदी रहा. यह लगभग उसी स्तर पर है, जहां एक दशक पहले था. अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी कंपनी हर रुपये की पूंजी पर करीब उतना ही कमा रही है, जितना उसने खर्च शुरू करने से पहले कमाया था.
इसके बाद वादों का सवाल है. 2019 की वार्षिक आम बैठक (AGM) में मुकेश अंबानी ने कहा था कि रिलायंस का लक्ष्य पांच साल के भीतर जियो और रिलायंस रिटेल को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराना है. जियो की लिस्टिंग 2026 के आखिर में हो रही है. अब रिपोर्टों के मुताबिक, रिलायंस रिटेल 2028 के आसपास लिस्टिंग की तैयारी कर रही है. हर देरी के साथ शेयरधारकों से उसी वादे के पूरा होने का और इंतजार करने को कहा जा रहा है, जिससे उनके शेयरों के मूल्यांकन में बढ़ोतरी की उम्मीद है.
होल्डिंग कंपनी का पेच
यहां एक असहज विडंबना है. जियो के शेयर बाजार में अलग से सूचीबद्ध होने के बाद जो निवेशक जियो में निवेश करना चाहेंगे, वे सीधे उसके शेयर खरीद सकेंगे. कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इसके बाद RIL के शेयर होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट पर कारोबार कर सकते हैं. इसके करीब 25 फीसदी होने के अनुमान भी सामने आए हैं. जिस कदम से RIL के शेयरधारकों के लिए मूल्य बढ़ाने की उम्मीद है, वही उनके शेयर की कीमत पर सीमा लगा सकता है.
इस व्यवस्था से ही सवाल उठता है. RIL के शेयरधारकों के पास पहले से ही जियो में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी है. डीमर्जर के जरिए उन्हें सीधे जियो के शेयर दिए जा सकते थे. इसके बजाय, नए शेयर नए निवेशकों को मिलेंगे और उससे मिलने वाली रकम जियो का कर्ज चुकाने में जाएगी. क्या डीमर्जर पर विचार किया गया था? अगर हां, तो इसे क्यों खारिज किया गया?
और अगर प्राइस बैंड जानबूझकर कम रखा गया है, जबकि कई ब्रोकरेज फर्मों ने 10.3 लाख करोड़ रुपये से काफी ज्यादा मूल्यांकन का अनुमान जताया था, तो नए निवेशकों के लिए छोड़ा गया हर अतिरिक्त रुपया बड़े पैमाने पर RIL के मौजूदा शेयरधारकों के हिस्से से ही जाता है.
वे जवाब, जो मायने रखते हैं
जियो के पक्ष में मजबूत तर्क मौजूद हैं. कंपनी लाभ कमाने वाली बाजार की अग्रणी कंपनी है. वित्त वर्ष 2025-26 में उसने 1,46,885 करोड़ रुपये का राजस्व और 30,049 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया. उसका कर्ज का बोझ भी कम हुआ है. RIL का बचाव करने वाले यह तर्क देते हैं कि व्यापक बाजार के लिए 2026 मुश्किल रहा है और पूंजीगत खर्च के अब अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है.
लेकिन मजबूत कारोबार होने से कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों के जवाब नहीं मिल जाते. इसी तरह, रिकॉर्ड IPO होने से RIL के शेयरधारकों के तीन साल के ठहराव की भरपाई नहीं हो जाती.
इसलिए जब रिलायंस का नेतृत्व मीडिया के सामने आए, तो सवाल सीधे होने चाहिए. शेयरधारकों को नकद रिटर्न कब मिलेगा? समूह पूंजी पर कितने रिटर्न का लक्ष्य तय करेगा और किस साल तक? AI, डेटा सेंटर और सैटेलाइट ब्रॉडबैंड जैसे नए कारोबार जियो को दिए जाएंगे या समूह की अन्य कंपनियों के पास रहेंगे, इसका फैसला कौन करेगा? और अगली पीढ़ी के नेतृत्व का पारिश्रमिक किस पर निर्भर करेगा: कारोबारी साम्राज्य के आकार पर या उससे मिलने वाले रिटर्न पर?
भारत के सबसे बड़े IPO की सबसे कड़ी जांच होनी चाहिए. निवेशकों को आंकड़े और समयसीमा मांगनी चाहिए. साथ ही, ‘दीर्घकालिक दृष्टिकोण’ को उसी रूप में देखना चाहिए, जैसा कि अक्सर होता है: किसी दूसरे सवाल का जवाब.
यह लेख 15 अक्टूबर 2026 तक सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों पर आधारित है और निवेश संबंधी सलाह नहीं है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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