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दुनिया भर में मंदी की आहट! क्या भारत भी आएगा चपेट में ?

हालांकि इस बात के संकेत हैं कि भारत सुरक्षित रहेगा, लेकिन इतनी जल्दी निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए.

उर्वी श्रीवास्तव 4 years ago

मंदी इन दिनों अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन गई है. कई अर्थशास्त्री और उद्योग विशेषज्ञ मा चुके हैं कि दुनिया वैश्विक मंदी की ओर बढ़ रही है.
वास्तव में, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रबंध निदेशक, क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने स्पष्ट रूप से कहा, "अंधकारमय ग्लोबल आउटलुक का सामना करना पड़ रहा है .... मंदी के जोखिम बढ़ रहे हैं....नाजुकता की इस घड़ी को एक खतरनाक नया सामान्य बनने से रोकें." मंदी को जल्द से जल्द खत्म करने का अनुरोध करते हुए ये सावधानी के शब्द हैं. IMF ने यह भी कहा है कि वह अपने चौथे डाउनग्रेड संशोधन में ग्लोबल ग्रोथ अनुमानों को कम करने के लिए तैयार है, जो पहले से ही निराशाजनक 2.9 प्रतिशत था. कोविड के बाद आशावाद ने स्पष्ट दृष्टि छोड़ दी है, और एक अंधेरे और उदास भविष्य ने इसकी जगह ले ली है. 

मंदी क्या है?
आइए हम इसे सरल बनाने से पहले इसकी तकनीकी परिभाषा को देखें. आर्थिक गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण और व्यापक गिरावट आने को मंदी कहते हैं. एक सामान्य नियम ये है कि यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगातार तिमाही गिरावट है. यह बाहरी आर्थिक उत्पादन में गिरावट, उपभोक्ता मांग में कमी और रोजगार में गिरावट में प्रकट होता है. आसान भाषा में कहें तो नौकरियां नहीं होंगी, जीडीपी गिरेगी, या तो नकारात्मक या सिर्फ नीचे की तरफ, सार्वजनिक खर्च में गिरावट, और कारोबार बेहद दायरे में चलते हैं.

दुनिया में क्या हो रहा है?
सीधे शब्दों में कहें तो वैश्विक स्थिति को देखते हुए वैश्विक स्तर पर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को मंदी का खतरा है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, मंदी का यह दौर 2008 के चक्र से भी बदतर हो सकता है. प्राथमिक कारण कुछ ऐसे हैं जिनसे हम सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं. इनमें महामारी से प्रेरित मंदी और इसके तुरंत बाद शुरू हुई रूस और यूक्रेन के बीच जंग शामिल हैं. तीसरा और दिलचस्प पहलू जलवायु परिवर्तन है, न कि जलवायु झटके. 

कई अर्थशास्त्रियों और बैंक विश्लेषकों का मानना ​​है कि अमरीका को मंदी का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए. दरअसल, डॉओ जोंस उसी दर पर बैठा है, जो दो साल पहले था, यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था मुश्किलों का सामने करने वाली है. यूरोप में, फ्रांस और जर्मनी ने पहले ही अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को यह सोचकर बंद कर दिया था कि वे रूस से गैस आयात करेंगे. यूरोप में 40 प्रतिशत गैस की खपत अब रूस से आती है, इसका फायदा रूस उठा रहा है और दूसरे देशों से यूक्रेन के साथ जंग में समर्थन मांग रहा है. नतीजतन, बिजली की कीमतें 500 से 1000 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. जर्मनी ने वास्तव में स्वीकार कर लिया है कि ऊंची महंगाई दर 2023 में और ज्यादा बढ़ेगी. 

चीन अपने आप में एक शोध का विषय है. इसकी शून्य कोविड नीति ने अर्थव्यवस्था को कयामत बना. दिया, खासकर मैन्यूफैक्चरिंग वाले शहरों में. इसके कारण लोग चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को महसूस कर रहे हैं और इसलिए दूसरे देशों की ओर रुख कर रहे हैं. इसके चलते चीनी मैन्युफैक्चरिंग का पलायन शुरू हो गया है. कंपनियां अब कई कंपनियों की 'चाइना प्लस वन' नीति पर गौर कर रही हैं. इसके अतिरिक्त, आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण, लोगों ने अपने होम लोन का भुगतान करना बंद कर दिया है जिससे मॉर्गेज संकट पैदा हो गया है. अगर आप चीन की सैर करें तो आपको कई निर्माणाधीन मकान मिल जाएंगे. इससे वहां पर और मंदी को बढ़ावा मिलता है. वहां के बैंक वास्तव में चार प्रतिशत की मंदी की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जो एक दशक में सबसे धीमी गति है. 

क्या भारत पर असर होगा?
शुद्ध रूप से मंदी की तकनीकी परिभाषा के संदर्भ में अगर हमें हां और ना में से किसी एक को चुनना है, तो इसका जवाब नहीं है. इसका एक कारण त्योहारी सीजन के दौरान सार्वजनिक खर्च में वृद्धि, मंदी के प्रमुख पहलुओं में से एक को नकारता है. यह बदले में व्यवसायों और मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देगा. यह संयुक्त राज्य अमेरिका में होने वाली भविष्यवाणी के बिल्कुल उलट है, जैसा कि 2008 की मंदी की भविष्यवाणी करने वाले कुछ विशेषज्ञों में से एक डॉ. ड्रूम द्वारा भविष्यवाणी की गई थी. इसका कारोबार और आजीविका पर व्यापक असर है, मंदी को बढ़ावा देता है.

हालांकि इस बात के संकेत हैं कि भारत सुरक्षित रहेगा, लेकिन इतनी जल्दी निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए. उदाहरण के तौर पर, हम अभी भी एक प्रमुख ईंधन आयातक देश हैं. वास्तव में, जापानी फर्म नोमुरा के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 के लिए अनुमानित 7 प्रतिशत के मुकाबले भारत की विकास दर 5.2 प्रतिशत तक धीमी हो जाएगी. इसमें 2023 शामिल नहीं है, जिसमें 7 प्रतिशत की स्थिर गति दिखाई देगी. भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को देखते हुए यह विकास दर काफी नहीं है. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) जून 2022 से पहले 20 प्रतिशत की तुलना में 12.3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. यह देखते हुए कि विकास दर शून्य से ऊपर है, तकनीकी रूप से यह अभी भी मंदी नहीं है, इसका प्रभाव अभी भी विनाशकारी हो सकता है. यह इस तथ्य के बावजूद है कि भारत एक ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने के लिए तैयार है, और घरेलू अर्थव्यवस्थाएं अन्य अर्थव्यवस्थाओं. की तुलना में अधिक मजबूत हैं हमारे पास बड़े पैमाने पर बाहरी ऋण, एक विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति, एक ठोस सर्विसे सेक्टर और एक अच्छा सामाजिक सुरक्षा जाल नहीं है. हालांकि, वास्तव में, दुनिया आपस में जुड़ी हुई है, और घरेलू खपत और जॉब मार्केट पर असर पड़ रहा है.

आपको चिंता क्यों करनी चाहिए?
जबकि कुछ लोग विश्व स्तर धीमी हो रही प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को भारत के लिए एक अवसर के रूप में धीमा देखते हैं, वास्तव में ऐसा नहीं है. भले ही मंदी का सामना भारतीय सीधे तौर न करें, लेकिन दूसरे तरीकों से झटके जरूर लगेंगे. बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) में काम करने वाले, क्या आप अपनी नौकरी बचा पाएंगे? क्या आपकी अपनी मार्च की सैलरी में इजाफा होगा? क्या आपको अपना वार्षिक बोनस मिलेगा? व्यापार मालिकों के लिए, क्या वे अपने कर्मचारियों को भुगतान करने में सक्षम होंगे? क्या आप अपने ऑफिस का किराया भर पाएंगे? ये सभी सवाल जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मंदी से प्रेरित हैं? यहां तक ​​कि जब भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था था, तब भी बाजार में बहुत कम नौकरियां थीं, मंदी के समय की तो बात ही मत कीजिये. भले ही भारत भारतीय अर्थव्यवस्था से अलग हो जाए, लेकिन इसका गहरा असर होगा. इसके अतिरिक्त, रिटेल महंगाई 7 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, थोक महंगाई दर सूचकांक 14 प्रतिशत पर है, और यह धीमा होने की ओर नहीं देख रहा है. इससे उपभोक्ताओं की जेब में सेंध लग जाएगी. वास्तव में, विश्व बैंक ने कहा है कि कोविड -19 के कारण गरीब होने वालों में भारतीयों का हिस्सा 80 प्रतिशत है. इसके पीछे एक कारण गैर-अनुकूल वैश्विक माहौल के चलते भारत में निवेश की कमी है. यह उपभोक्ता और उत्पादकों के लिए ग्लोबल मार्केट से सावधान रहने और झटका झेलने के लिये तैयार रहने का वक्त है. 


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