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मोदी जी ने किया था वादा, फिर क्यों रह गया ये प्रोजेक्ट आधा? जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

मौजूदा व्यवस्था के तहत आगरा के खेरिया स्थित एयरफ़ोर्स के एयरपोर्ट का ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन तमाम तरह की पाबंदियों के चलते यहां आने-जाने वालीं फ्लाइट्स की संख्या बेहद सीमित है.

नीरज नैयर 4 years ago

उत्तर प्रदेश की आर्थिक सेहत को सुधारने में आगरा का बहुत बड़ा और अहम योगदान है. टूरिज्म के साथ-साथ ये शहर शूज़, हैंडीक्राफ्ट सहित कई उद्योगों के लिए भी फेमस है. एक अनुमान के मुताबिक, आगरा से 4500 करोड़ से ज्यादा का एक्सपोर्ट टर्नओवर है. अकेले जूतों का निर्यात ही 3500 करोड़ का है. इसके बावजूद ये शहर एक अदद एयरपोर्ट के लिए तरस रहा है. मौजूदा व्यवस्था के तहत खेरिया स्थित एयरफ़ोर्स के एयरपोर्ट का ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन तमाम तरह की पाबंदियों के चलते यहां आने-जाने वालीं फ्लाइट्स की संख्या बेहद सीमित है. ऐसे में सिविल एन्क्लेव प्रोजेक्ट से शहरवासियों को एक उम्मीद जगी थी, वो भी अब टूट गई है.   

क्या थी योजना?
इस प्रोजेक्ट के तहत 398 करोड़ रुपए की लागत से खेरिया एयरपोर्ट में अतिरिक्त टर्मिनल बनाया जाना था. 30,000 वर्ग मीटर क्षेत्र पर बनने वाले इस टर्मिनल से पीक ऑवर्स में 700 यात्री सफर कर सकते थे. सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2019 को इसके लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को अनुमति भी दे दी थी. रनवे मौजूदा खेरिया एयरपोर्ट का ही इस्तेमाल होता, केवल सिविल यात्रियों के लिए टर्मिनल अलग बनता. इससे आगरा से बाकी शहरों की एयर कनेक्टिविटी बेहतर बनती.  

क्या है अडंगा?
इस पूरे मामले में सरकारी तंत्र आम जनता से जानकारी छिपाए रहा. आगरा डेवलपमेंट फाउंडेशन के सचिव एवं वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने जब RTI लगाई, तब पता चला कि प्रोजेक्ट फिलहाल ड्रॉप कर दिया गया है. इसके पीछे पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिलने का हवाला दिया गया है. साथ ही यह भी कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय में संशोधन आवेदन पत्र दायर किया गया है. जमीन का अधिग्रहण कर बाउंड्री का निर्माण कर दिया गया है. पर्यावरण मंजूरी मिलने के बाद काम के लिए दोबारा योजना बनाई जाएगी.

कितना बड़ा झटका?
आगरा के लिए इस प्रोजेक्ट का रद्द होना कितना बड़ा झटका है? इस बारे में आगरा डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष पूरन डावर कहते हैं, ‘शहर का सपना और उम्मीद दोनों चकनाचूर हो गए हैं. पर्यटन के साथ-साथ आगरा उद्योग नगरी भी है और यह इस शहर का दुर्भाग्य है कि यहां एक सिविल एयरपोर्ट भी नहीं है’. उन्होंने आगे कहा, जेवर में अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाया जा रहा है, अच्छी बात है, हम सभी उसका स्वागत करते हैं, लेकिन उसके लिए सिविल एन्क्लेव की कुर्बानी क्यों? आगरा से जेवर 150 किलोमीटर के आसपास है, ऐसे में आगरा आने वाले को पहले वहां उतरना होगा फिर वो सड़क के रास्ते यहां आएगा. जबकि सिविल एन्क्लेव के अस्तित्व में आने से उसे सीधे आगरा में लैंड करने का विकल्प मिलता. 

‘मोदीजी अपना वादा निभाएं’ 
पूरन डावर के मुताबिक, यदि सिविल एन्क्लेव में बनता तो आगरा को कई तरह से लाभ होता. विमानों की आवाजाही बढ़ती, टूरिस्ट सीधे शहर में उतरते तो यहां का बिज़नेस बढ़ता, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ते, लेकिन इसके बावजूद योजना फ़िलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है. डावर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनका वादा भी याद दिलाया. उन्होंने कहा, ‘मोदीजी ने जब आगरा में अपनी पहली रैली की थी, तो उन्होंने हैरत जताई थी कि आगरा में एयरपोर्ट नहीं है. उन्होंने इस दिशा में काम का वादा भी किया था, लिहाजा हमारा अनुरोध है कि वह अपने वादे पर अमल करें’.

‘जेवर’ के फायदे की कवायद
आगरा के वरिष्ठ पत्रकार राजीव सक्सेना भी इसे शहर के लिए बड़ा झटका मानते हैं. उनका कहना है कि ये महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट लापरवाही का शिकार हो गया. उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे लगता है एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया एफिशिएंसी से काम नहीं कर पा रही है. इस मामले में सबसे बड़ी दिक्कत ये रही कि सरकारी वकीलों को जिस ढंग से सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखना चाहिए था, वो रख नहीं पाए. इससे कहीं न कहीं से लगता है कि पूरी कवायद का उद्देश्य जेवर अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट को फायदा पहुंचाना है. क्योंकि अगर सिविल एन्क्लेव बनता तो बिज़नेस, पैसेंजर शेयरिंग होती. आगरा आने वाला व्यक्ति जेवर क्यों जाता, सीधा यहीं आता. लेकिन जब सिविल एन्क्लेव होगा ही नहीं, फ्लाइट सीधे यहां आएंगी ही नहीं, तो उसकी मज़बूरी होगी जेवर एयरपोर्ट पर उतरना’.             

‘रूलिंग पार्टी के लिए शर्म का विषय’
राजीव सक्सेना के मुताबिक, मौजूदा खेरिया एयरपोर्ट कहां ढंग से काम कर पा रहा है. इसका एक्सेस लखनऊ या इलाहाबाद (प्रयागराज) जैसा नहीं है. क्योंकि ये वायुसेना के नियंत्रण में है. यहां से बेहद सीमित फ्लाइट्स हैं, ऐसे में सिविल एन्क्लेव बहुत ज़रूरी है. उनका ये भी कहना है कि ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि जिन पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रूलिंग पार्टी का पूरा स्ट्रक्चर खड़ा है, उन्हीं के नाम वाले एयरपोर्ट से जुड़ी योजना का ऐसा हश्र किया गया. रूलिंग पार्टी और उसके लोगों को शर्म महसूस करनी चाहिए. क्या प्रोजेक्ट का अमल में न आना राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी है? इस सवाल पर उन्होंने कहा – ये राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं बल्कि कूटरचना है. जब कोर्ट में पैरोकारी नहीं होगी, आप डेट नहीं लेंगे, मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखेंगे, तप फिर यही होगा. आजकल हर दूसरे मामले की सुनवाई के लिए सॉलिसिटर जनरल पहुंच जाते हैं, यकीन ये इतना बड़ा मुद्दा था. उसके बावजूद सरकार अपना पक्ष ढंग से नहीं रख पाई.    

डिफेंस सेफ्टी के लिए खतरा
डिफेंस एविएशन एक्सपर्ट ए.के सिंह मानते हैं कि आगरा की टूरिज्म और होटल इंडस्ट्री के लिहाज से यह आगरा के लिए झटका है. हालांकि, उनका ये भी कहना है कि चूंकि आगरा मिलिट्री का बड़ा और महत्वपूर्ण बेस है, इसलिए ज्यादा उड़ानों के परिचालन से रक्षा संबंधी कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘हमें यह समझना भी बेहद ज़रूरी है कि आगरा में केवल ताजमहल या अन्य टूरिस्ट स्पॉट ही नहीं हैं, यहां एशिया का सबसे महत्वपूर्ण मिलिट्री बेस भी है. ऐसे में जब ज्यादा फ्लाइट्स यहां आएंगी-जाएंगी तो एयर डिफेंस सेफ्टी खतरे में पड़ सकती है. वायुसेना के विमान, आर्मी के हेलीकॉप्टरों को टेक-ऑफ, लैंडिंग में मुश्किल होगी’. 

जेवर से क्या परेशानी है?  
ए.के सिंह के अनुसार, जेवर में अंतर्राष्ट्रीय एयरपार्ट बनाने का फैसला बिल्कुल सही है. इससे न राष्ट्रीय सुरक्षा से किसी तरह के समझौते की आशंका रहेगी और आगरा आने वालों को भी खास परेशानी नहीं होगी. उन्होंने कहा, ‘आगरा में बड़े एयरपोर्ट को एक जिद के रूप में नहीं लेना चाहिए, राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में भी सोचना चाहिए. जेवर से आने-जाने में क्या परेशानी है? जो फ्लाइट से आ रहा है, वो टैक्सी भी कर सकता है’.
 


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