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ZEE-Sony मर्जर डील का परवान न चढ़ना कई सवालों को देता है जन्म: डॉ. अनुराग बत्रा

‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEEL) को इस मामले में आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. कुछ का कहना है कि उसे अपनी सहयोगी इकाई को पैसा देना चाहिए था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • डॉ. अनुराग बत्रा 

लंबे समय से चल रही ‘जी’ (ZEE) और ‘सोनी’ (Sony) के मर्जर यानी विलय की प्रक्रिया अभी तक पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पाई है. विडंबना यह है कि इस दिशा में तमाम प्रक्रियाओं के पूरे हो जाने और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) से सभी आवश्यक मंजूरी मिल जाने के बाद भी अभी भी यह डील अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है और अब यह मामला दिवाला याचिका (Insolvency Plea) के फेर में फंस गया है और इस पर बादल गहरा गए हैं.

खड़े हो रहे हैं सवाल
ताजा घटनाक्रम के चलते इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) को एक टूल की तरह इस्तेमाल करने को लेकर एक पक्ष द्वारा तमाम सवाल खड़े किए जा रहे हैं. यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यह मामले के निपटान के लिए वास्तविक उधारदाताओं के लिए एक टूल की तरह काम कर रहा है? क्या यह इक्विटी पूंजी आधार के साथ-साथ प्रमोटरों और प्रबंधन में प्रभावी बदलाव के साथ एक दिवालिया या दिवालिया उद्यम को अपनी वास्तविक क्षमता में वापस लाने का एक टूल है? अथवा क्या यह आपसी समझौता वार्ता पर दबाव डालने के लिए एक टूल की तरह काम कर रहा है?

धीमी हो गई है प्रक्रिया
दरअसल, इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया के कारण मार्ग में नया व्यवधान आ गया है और ‘नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल‘(NCLT) व ‘नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल’ (NCLAT) की कार्रवाइयों ने विलय की इस प्रक्रिया को धीमा कर दिया है. खास बात यह है कि इससे विलय में शामिल स्टेकहोल्डर्स की भावनाएं भी प्रभावित हुई हैं. मैंने पूर्व में अपने आर्टिकल में लिखा था कि यह प्रस्तावित मर्जर भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट ईकोसिस्टम के लिए काफी अच्छा है. ‘जी’ के शेयरों की बात करें तो यह अपने स्टेकहोल्डर्स के लिए अच्छा प्रदर्शन करने वाला रहा है. इसके अन्य स्टेकहोल्डर्स ने पिछले लगभग 30 वर्षों में भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के निर्माण में काफी अहम भूमिका निभाई है. इसने इस क्षेत्र का नेतृत्व किया है और 'आत्मनिर्भर' ब्रैंड को मजबूती प्रदान कर रहा है.

हो रही है आलोचना
‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ (ZEEL) को इस मामले में आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. कुछ का कहना है कि उसे अपनी सहयोगी इकाई (Sister Entity) को पैसा देना चाहिए था, लेकिन यह खराब प्रशासन होता. अपनी सहयोगी इकाई के लिए इस तरह के नकद संचय से लाभान्वित होने वाली कुछ इच्छुक पार्टियों के लाभ के लिए ‘जी’ के शेयरहोल्डर्स और अन्य स्टेकहोल्डर्स को इस मामले में नहीं खींचा जा सकता है. ZEEL ने अपने शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा के लिए कानून का रास्ता अख्तियार किया है और 83 करोड़ रुपये बचाने के लिए दृढ़ता दिखाई है. इस मामले में रकम नहीं बल्कि यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह किस भावना से दृढ़ता से खड़े हुए हैं. सोनी के साथ विलय की इस प्रक्रिया के बावजूद शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने की इसी विचारधारा को लेकर ZEE ने NCLT के आदेश को NCLAT में चुनौती दी है.

संदेह की दृष्टि से न देखें
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद देश में जिस तरह के हालात हैं, उसमें यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय प्रमोटर्स और भारतीय इकाइयों को शक और संदेह की दृष्टि से न देखा जाए. यह भी देखना होगा कि सत्यनिष्ठा का दावा करने वाली इकाइयों का इरादा क्या है और उनके द्वारा किस तरह के कदम उठाए गए हैं. यह खासकर तब और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, जब यह समय, फाइनेंस और भारतीय प्रमोर्टस के सम्मान की परीक्षा का सवाल हो.

मैं ZEE के इस कदम को शेयरहोल्डर्स के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में देखता हूं, जो उसने भारतीय कंपनियों और प्रमोटर्स के लिए दिखाई है.

(लेखक ‘बिजनेसवर्ल्ड’ समूह के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ हैं. उनका ये लेख हमारी सहयोगी वेबसाइट समाचार4मीडिया से लिया गया है)


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