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आचरण शून्‍य उपासना का कोई अर्थ नहीं है: डॉ.लोकेश मुनि 

उन्‍होंने संतुलन को लेकर अपनी बात कहते हुए कहा कि जीवन में इसे बनाये रखना बेहद जरूरी है. अगर शरीर में एक जगह खून ज्‍यादा हो जाए तो परेशानी पैदा कर देता है. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

बिजनेस वर्ल्‍ड की BW wellbeing कम्‍यूनिटी के कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने कहा कि मैं इसे आयोजित करने के लिए बधाई देता हूं. उन्‍होंने कहा कि आज हम उद्देश्‍य पूर्ण जीवन की चर्चा कर रहे हैं. उन्‍होंने कहा कि उद्देश्‍यपूर्ण जीवन के लिए संतुलन जरूरी है और संतुलन को लेकर जैन धर्म के 24वें गुरु तीर्थंकर भगवान महावीर ने स्‍वस्‍थ संतुलन के लिए उन्‍होंने जहां एक ओर संयासी के लिए पांच महाव्रत का विधान किया. इनमें सत्‍य, अहिंसा, अस्‍तेय, ब्रहमचर्य और अपरिग्रह वो जानते थे कि सभी सन्‍यासी नहीं हो सकते हैं. उन्‍होंने 12 अनुव्रत का भी विधान किया.

 धर्म और मोक्ष को छोड़कर अर्थ और काम के पीछे भाग रहे हैं
 आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने कहा कि समाज में जितनी भी विकृतियां दिखाई दे रही हैं उसके पीछे धर्म और मोझ को छोड़कर अर्थ और काम के पीछे भागते हैं, वहीं समाज में विकृतियां आती हैं.  जैन धर्म में अधिकृत तौर रूप से धर्म का विकास से कोई विरोध नहीं है. संतुलन को हमेशा ध्‍यान में रखते हुए ये सोचें कि हमारा समाज स्‍वस्‍थ कैसे रह सकता है. अगर कहीं एक जगह खून जम जाए तो शरीर अस्‍वस्‍वथ बन जाता है. उसी तरह अगर धन भी एक जगह जमा होता है तो उसका असर देखने को मिलता है. एक ओर बड़ी इमारतें होती हैं और दूसरी ओर दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है. महावीर ने धर्म को संतुलन से जोड़ा, उन्‍होंने कहा कि अगर तुम्‍हारा भाई भूखा सोता है और तुम भरपेट खाते हो तो तुम मोझ के अधिकारी नहीं हो. क्‍योंकि उन्‍होंने अपनी आत्‍मा की तरह दूसरे की आत्‍मा को स्‍वीकार करें. मनुष्‍य कोई मशीन नहीं है. 

मतभेद विकास का माध्‍यम हैं
आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने कहा कि मतभेद विकास का माध्‍यम हैं लेकिन जब मतभेद मनभेद में बदलता है तो परेशानी हो जाती है. उन्‍होंने कहा था कि इच्‍छाएं तो आकाश के समान अनंत हैं. इच्‍छाएं असीमित हैं. इसलिए भोग और उपभोग का सीमाकरण किया गया है. हम आनंद को सुविधाओं में खोज रहे हैं. लेकिन उसका संबंध हमारे मन की स्थिति में है. शांति को वहां खोज रहे हैं जहां वो है नहीं. आज धर्म को अध्‍यात्‍म से जोड़ने की जरूरत है. मैं उपासना का विरोधी नहीं हूं लेकिन आचरण शून्‍य उपासना का महत्‍व सुगंधित शव से अधिक नहीं है. ये परमात्‍मा को धोखा देने के समान है. 

जीवन में आध्‍यात्मिकता को कैसे शामिल करें? 
आचार्य डॉ. लोकेश मुनि ने कहा कि इसके लिए आप डीप ब्रीथ करें गुस्‍सा आता हो उससे यही करना चाहिए . एकाग्रता के लिए आप इसे कर सकते हैं. छोटी सी सांस लेने में कई तरह की परेशानियां सामने आ जाती हैं. 24-48 मिनट का समय अपनी बॉडी के लिए कर सकते हैं. आप 1 या 2 मिनट के दो सेशन कर सकते हैं. छोटी सांस लेने वालों को ज्‍यादा गुस्‍सा आता है, अगर आप लंबी सांस लेते हैं तो गुस्‍सा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर पाएगा. अच्‍छा साहित्‍य पढ़ना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि जब से व्‍हाटस अप आया है तब से ना पढ़ने की आदत बढ़ गई है. मेडीटेशन और स्‍वाध्‍याय को अपने जीवन में उतारना चाहता हूं.  

कठिन समय में निर्णय कैसे लें
हम अच्‍छा निर्णय तभी ले पाते हैं जब हमारा मन शांत होता है. एक बिजनेस मैन भी अच्‍छा निर्णय तभी ले पाएगा जब उसका मन शांत होगा. इसीलिए साधना के जो तरीके हैं ये जीवन जीने के अच्‍छे तरीके हैं. इसको धर्म और अध्‍यात्‍म से मत जोडि़ए. अपनी भावना और धैर्य पर नियंत्रण करने के लिए, करना बेहद जरूरी है. मेडिटेशन की सीमा क्‍या होनी चाहिए, इस पर मैं कहना चाहूंगा कि इसमें हर व्‍यक्ति का एक नियम नहीं हो सकता है. कुछ ऐसे होते हैं जो बहुत जल्‍दी गहराई में उतर जाते हैं. कुछ देरी से उतरते हैं, लेकिन जब आपको आनंद आने लगता है तो फिर आप उसे रोज करते हैं. वो आपकी आदत का हिस्‍सा बन जाता है. परिवार के बीच में रहते हुए संतुलन बनाना जरूरी है. 
 


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