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World Deaf Day: इशारों में सबकुछ कहने वालों को ‘सबकुछ’ नहीं मिला 

'अतुल्य कला' की फाउंडर स्मृति नागपाल कहना है कि अभी मूक-बधिरों को सहानुभूति की नज़रों से देखा जाता है, जब तक हम उन्हें अपने बराबर का नहीं समझते तब तक हालात बदलने वाले नहीं हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

कुछ देर के लिए यदि हमारे बोलने पर पाबंदी लगा दी जाए या फिर हमें सुनाई देना बंद हो जाए तो हम बेचैन हो उठते हैं. ऐसा लगता है जैसे सबकुछ खत्म हो गया. हालांकि, हमारी बेचैनी कुछ पल बाद खत्म हो जाती है, लेकिन बहुत से ऐसे भी लोग हैं, जिनके लिए ये बेचैनी अंतहीन है. उन्हें न समुंदर की लहरों का शोर सुनाई देता है, न ही वे अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं. 26 सितंबर को 'विश्व मूक-बधिर दिवस' के रूप में मनाया जाता है. विश्व बधिर संघ ने साल 1958 से इसकी शुरुआत की थी. तब से अब तक मूक-बधिर लोगों के जीवन में बदलाव तो आया है, लेकिन उन बदलावों की गति बेहद धीमी है. 

हम दूसरे देशों से पीछे
मूक-बधिरों के जीवन को एक नई दिशा देने वालीं 'अतुल्य कला' संस्था की फाउंडर स्मृति नागपाल भदौरिया मानती हैं कि स्थिति पहले से बेहतर हुई है मगर अभी भी काफी कुछ है, जिसे बदला जाना बाकी है. उदाहरण के तौर एजुकेशन. हमारे देश में ऐसे चंद ही स्कूल या कॉलेज हैं, जहां साइन लैंग्वेज और रिटन लैंग्वेज को मिलाकर बाइलिंगुअल लैंग्वेज दी जाती है. हमारे यहां पैरेंट्स शुरुआत से बच्चों की स्पीच थेरेपी पर जोर देते हैं या फिर उन्हें ऐसे स्कूलों में भेज देते हैं, यहां ऐसे स्पेशल चाइल्ड के लिए एक अलग डिपार्टमेंट होता है. अगर बाकी देशों के एजुकेशन सिस्टम से तुलना की जाए तो हम न केवल काफी पीछे हैं, बल्कि एक अलग दिशा में भी चल रहे हैं. जब उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिलती है, तो वह बाकी लोगों के साथ प्रस्तिपर्धा के लिए तैयार नहीं हो पाते और इस वजह से उनकी करियर ग्रोथ सीमित हो जाती है. 

चुनिंदा क्षेत्रों में अवसर
डेफ एंड डम लोगों के लिए एम्प्लॉयमेंट के बारे में बताते हुए स्मृति ने कहा कि केवल चुनिंदा फील्ड ही हैं, जहां मूक-बधिरों को नौकरी मिल पाती है. जैसे कि सर्विस सेक्टर, फूड इंडस्ट्री और एयरपोर्ट्स आदि. क्रिएटिव फील्ड में तो उनके लिए जगह न के बराबर है, क्योंकि वहां कम्युनिकेशन ही सबकुछ है और जिस तरह ये लोग अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं, उसे समझना हर एक के लिए मुमकिन नहीं. मुमकिन इसलिए नहीं है, क्योंकि इस बारे में कभी सोचा ही नहीं गया. ऐसे में यदि कोई मूक-बधिर अपनी काबलियत के बल पर कुछ अलग, कुछ बड़ा करना चाहे तो उसके लिए पर्याप्त अवसर नहीं होते. हमें इस दिशा में काम करने की ज़रूरत है, जिस तरह से समाज के अन्य लोगों के पास विकल्प होते हैं, वैसे ही उनके पास भी होने चाहिए.

ऐसे सुधरेगी स्थिति
स्मृति नागपाल भदौरिया का मानना है कि चूंकि मूक-बधिरों लोगों के पास केवल चुनिंदा क्षेत्रों में ही नौकरी के अवसर होते हैं, इसलिए उनमें बेरोज़गारी दर बढ़ती जाती है. इसलिए कुछ ऐसा करने की ज़रूरत है, ताकि वह हर क्षेत्र में अन्य लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें और इसके लिए ज़रूरी है हमारे एजुकेशन सिस्टम को मजबूत करना और सामान्य लोगों को साइन लैंग्वेज सीखने के लिए प्रेरित करना. स्मृति के मुताबिक, कॉर्पोरेट सेक्टर में ऐसा किया जाने लगा है. मुझे लगता है कि गवर्नमेंट सेक्टर में भी सभी कर्मचारियों को साइन लैंग्वेज सिखाई जानी चाहिए. हर दिन यदि आधा घंटा भी इसके लिए निकाला जाए, तो पर्याप्त होगा. जब लोग उनकी बातों को समझ सकेंगे, तो उनके लिए नौकरी के अवसर बढ़ेंगे.  

90% स्टाफ मूक-बधिर
'अतुल्य कला' संस्था की फाउंडर का कहना है कि अभी मूक-बधिरों को सहानुभूति की नज़रों से देखा जाता है, जब तक हम उन्हें अपने बराबर का नहीं समझते, उन्हें बराबर का दर्जा नहीं देते, तब तक हालात बदलने वाले नहीं हैं और मुझे लगता है कि कम्युनिकेशन गैप को कम करके ऐसा किया जा सकता है. अपनी संस्था के बारे में बताते हुए स्मृति ने कहा कि करीब 9 साल पहले उन्होंने इसकी शुरुआत की थी. 'अतुल्य कला' मूक-बधिरों लोगों की मदद विभिन्न प्रकार के लाइफस्टाइल प्रोडक्ट तैयार करती है. संस्था में काम करने वाले 90% कर्मचारी मूक-बधिर हैं. 'अतुल्य कला' की खास बात ये है कि यहां काम करने वाले सामान्य व्यक्ति को साइन लैंग्वेज आना ज़रूरी है. हाल ही में संस्था ने डेनमार्क में भी अपना ऑफिस शुरू किया है. बता दें कि स्मृति ने कई सालों तक न्यूज़ एंकरिंग भी है. वह सात सालों तक दूरदर्शन में रहीं, इसके बाद उन्होंने कुछ समय CNN में भी काम किया था. स्मृति साइन लैंग्वेज न्यूज़ एंकरिंग के लिए पहचानी जाती हैं. 


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