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अकादमिक बेईमानी का बढ़ता संकट

ईमानदारी (इंटेग्रिटी) संस्थानों में अनुसंधान और नवाचार की विश्वसनीयता के केंद्र में बनी रहती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

फरवरी में नई दिल्ली में आयोजित हालिया इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में देश की कुछ बेहतरीन एआई पहलों को प्रदर्शित किया गया. हालांकि, गालगोटियास विश्वविद्यालय की प्रतिनिधि प्रोफेसर नेहा सिंह द्वारा एक चीनी निर्मित रोबोट कुत्ते, जिसे यूनिट्री Go2 के रूप में पहचाना गया, को विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में विकसित ‘ओरियन’ नामक स्वदेशी इन-हाउस निर्माण के रूप में प्रस्तुत करना चौंकाने वाला साबित हुआ. इससे विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर जो हंगामा हुआ, वह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. भले ही यह अकादमिक बेईमानी की श्रेणी में आता है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल एक अपवाद था या कुछ अधिक गहराई से जड़ जमाए हुए समस्या का संकेत है?

यह चिंता का विषय है कि यह समस्या वास्तव में कहीं अधिक बड़ी है. विश्वविद्यालयों और कॉर्पोरेट संस्थानों में अकादमिक, अनुसंधान और नवाचार से जुड़ी बेईमानी अब कभी-कभार होने वाली घटना नहीं रह गई है. यह एक प्रणालीगत संकट बनती जा रही है जो ज्ञान, विश्वसनीयता और जन-विश्वास की नींव को कमजोर कर रही है. विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की जाती है कि वे सत्य के संरक्षक और प्रगति के वाहक हों. दुर्भाग्यवश, वे ऐसे प्रोत्साहन ढांचे में काम करते हैं जो ईमानदारी के बजाय उत्पादन, दृश्यता और लाभ को प्राथमिकता देता है. गढ़े गए डेटा और साहित्यिक चोरी से लेकर बढ़ा-चढ़ाकर किए गए नवाचार दावे और बौद्धिक संपदा के दुरुपयोग तक, अनैतिक आचरण ऐसे प्रतिस्पर्धी तंत्र का उप-उत्पाद बनता जा रहा है जो सफलता को संख्याओं में मापता है, न कि ईमानदारी को पुरस्कृत करता है.

क्या हम ‘पब्लिश या पेरिश’ कहावत से परिचित नहीं हैं? जब फैकल्टी के करियर का भारी हिस्सा प्रकाशनों की संख्या, उद्धरण मापदंड, अनुदान प्राप्ति और जर्नल की प्रतिष्ठा पर निर्भर करता है, तो गुणवत्ता की तुलना में मात्रा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. कई शोधकर्ता केवल सकारात्मक परिणामों को चुनकर प्रस्तुत करते हैं, विरोधाभासी निष्कर्षों को छोड़ देते हैं, सांख्यिकीय विश्लेषण में हेरफेर करते हैं, या ‘पी-हैकिंग’ और ‘डेटा फिशिंग’ जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं ताकि प्रकाशित होने योग्य परिणाम प्राप्त किए जा सकें. मामूली डेटा हेरफेर से शुरू होकर पूर्ण रूप से गढ़े गए डेटा तक पहुंचना धोखाधड़ी है. लेकिन दबाव लगातार बना रहता है. प्रकाशन नहीं तो स्थायी पद नहीं. अनुदान नहीं तो प्रयोगशाला नहीं. दृश्यता नहीं तो करियर में प्रगति नहीं. यदि शिक्षक का अस्तित्व मापनीय उत्पादकता पर निर्भर करता है, तो नैतिकता से समझौता होता है और वह सामान्य बन जाती है.

साहित्यिक चोरी और बौद्धिक विचारों का अनुचित अधिग्रहण अकादमिक अभिशाप हैं. छात्र असाइनमेंट कॉपी करते हैं, शोधकर्ता बिना श्रेय दिए पाठ को पुनः उपयोग करते हैं, और इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि वरिष्ठ अकादमिक कभी-कभी कनिष्ठ सहयोगियों या शोधार्थियों के विचारों को अपना लेते हैं. लेखकीय अधिकारों का दुरुपयोग भी व्यापक है, जहां प्रभावशाली लोग उन शोधपत्रों पर अपना नाम जोड़ लेते हैं जिनके बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी होती है, जबकि वास्तविक शोध करने वाले मान्यता के लिए संघर्ष करते हैं. इसके अलावा, घोस्ट राइटिंग सेवाएं और पेपर मिल्स धोखे को एक कला में बदल चुकी हैं, जहां भुगतान करने वालों को तैयार शोध पांडुलिपियां बेची जाती हैं, जिससे अकादमिक रिकॉर्ड कृत्रिम रूप से बढ़ जाते हैं.

ऐसे कदाचार पर विश्वविद्यालय कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? अधिकतर मामलों में त्वरित और सतही प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं. कुछ संस्थान साहित्यिक चोरी पहचानने वाले सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं, वेबसाइट पर नैतिकता संबंधी वक्तव्य डालते हैं और औपचारिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित करते हैं. लेकिन प्रवर्तन असंगत होता है और जांच प्रक्रियाएं अपारदर्शी रहती हैं. कुछ प्रतिष्ठित फैकल्टी सदस्यों को संस्थान की छवि बचाने के लिए संरक्षण भी मिल सकता है. जब विश्वविद्यालय पारदर्शी जवाबदेही के बजाय ब्रांड छवि को प्राथमिकता देते हैं, तो वे सिद्धांतों की तुलना में प्रतिष्ठा को अधिक महत्व देते हैं. ऐसे में विश्वसनीयता कैसे स्थापित की जाए? संस्थानों का उद्देश्य ज्ञान को आगे बढ़ाना और समाज को लाभ पहुंचाना है. इसके बजाय, अविश्वसनीय शोध पर समय और धन दोनों बर्बाद हो रहे हैं, जिससे पूरे शोध क्षेत्रों की दिशा विकृत हो रही है.

क्या केवल विश्वविद्यालय ही दोषी हैं? कॉर्पोरेट अनुसंधान और नवाचार तंत्र भी इसी प्रकार की बेईमानी से ग्रस्त हैं. तकनीक, फार्मास्यूटिकल्स, ऊर्जा और बायोटेक्नोलॉजी जैसे प्रतिस्पर्धी उद्योगों में ‘पहले आने’ का लाभ अत्यधिक वित्तीय लाभ में बदल सकता है. निवेशकों को प्रभावित करने और पेटेंट हासिल करने का दबाव कंपनियों को उत्पाद की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने और शोध निष्कर्षों को अतिरंजित करने के लिए प्रेरित करता है. नकारात्मक परिणाम आंतरिक रिपोर्टों में दबे रहते हैं, जबकि प्रचारात्मक कथाएं केवल सफलताओं को उजागर करती हैं, जैसा कि कुछ फार्मा कंपनियों के मामले में देखा जाता है.

बौद्धिक संपदा से संबंधित कदाचार इस समस्या को और बढ़ाता है. आक्रामक पेटेंट रणनीतियां वास्तविक प्रतिस्पर्धा और रचनात्मकता को बाधित करती हैं. कुछ मामलों में, स्वामित्व गोपनीयता अनुसंधान को स्वतंत्र जांच से बचाती है, जिससे दावों की सत्यता की पुष्टि करना कठिन हो जाता है. यह अपारदर्शिता ऐसे वातावरण का निर्माण करती है जहां गलत प्रस्तुतीकरण बिना रोक-टोक के पनपता है.

अकादमिक और कॉर्पोरेट दोनों क्षेत्रों में मूल कारण काफी हद तक समान हैं—विकृत प्रोत्साहन, कमजोर निगरानी और नैतिक शॉर्टकट्स का सामाजिक सामान्यीकरण. उद्धरण संख्या, इम्पैक्ट फैक्टर, पेटेंट पोर्टफोलियो, तिमाही आय और मूल्यांकन आंकड़े उत्कृष्टता के मापदंड बन जाते हैं. दुर्भाग्य से, इन मापदंडों में आसानी से हेरफेर किया जा सकता है. जब संस्थान संख्यात्मक संकेतकों को योग्यता के बराबर मान लेते हैं, तो वे प्रणाली के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं. उद्धरण गठजोड़, स्वयं-उद्धरण की वृद्धि, रणनीतिक लेखकीय व्यवस्थाएं और मीडिया प्रचार अभियान इस व्यापक समस्या के लक्षण हैं.

निगरानी तंत्र अक्सर केवल कागजों तक सीमित रहते हैं और प्रभावहीन होते हैं. कई बार वे कदाचार के पैमाने से पीछे रह जाते हैं. संस्थागत समीक्षा बोर्ड और नैतिकता समितियों में स्वतंत्रता और पर्याप्त संसाधनों की कमी होती है. व्हिसलब्लोअर्स को प्रतिशोध, पेशेवर अलगाव या कानूनी दबाव का सामना करना पड़ता है. कनिष्ठ शोधकर्ता और कर्मचारी बदले की आशंका से गलत कार्यों की रिपोर्ट करने से बचते हैं. विश्वसनीय सुरक्षा और पारदर्शी प्रक्रियाओं के अभाव में, कदाचार संस्थानों की चमकदार छवि के पीछे पनपता रहता है. इसके परिणाम केवल संस्थागत शर्मिंदगी तक सीमित नहीं रहते, जैसा कि गालगोटिया मामले में देखा गया. अनुसंधान में बेईमानी विज्ञान और नवाचार में जनता के विश्वास को कमजोर करती है. यदि नागरिकों को लगता है कि शोध निष्कर्षों में हेरफेर किया जाता है या कॉर्पोरेट दावे अविश्वसनीय हैं, तो संदेह बढ़ता है. इस विश्वास के क्षरण से नीतिगत प्रतिक्रियाएं कमजोर होती हैं. अरबों की शोध निधि अविश्वसनीय आधारों पर खर्च हो जाती है. सामाजिक रूप से, त्रुटिपूर्ण चिकित्सा अध्ययन या पर्यावरणीय शोध में विकृतियां वास्तविक नुकसान पहुंचा सकती हैं.

अकादमिक और कॉर्पोरेट अनुसंधान में बेईमानी केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलताओं का परिणाम नहीं है. यह तब उत्पन्न होती है जब हम सत्य से ऊपर प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा और लाभ को प्राथमिकता देते हैं. ज्ञान का उत्पादन उस वातावरण में विकसित नहीं हो सकता जहां ईमानदारी वैकल्पिक हो जाए. विश्वविद्यालयों को ज्ञान सृजनकर्ता के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि करनी चाहिए. कॉर्पोरेट संस्थानों को यह समझना चाहिए कि स्थायी नवाचार उतना ही विश्वास पर निर्भर करता है जितना तकनीकी प्रगति पर. समाज को भी संस्थानों से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए.

इस संकट का समाधान कैसे किया जाए? इसके लिए सतही अनुपालन के बजाय संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं. प्रोत्साहन प्रणालियों को पुनः संतुलित करना होगा ताकि वे केवल उत्पादन के बजाय पुनरुत्पादकता, पद्धतिगत कठोरता और नैतिक आचरण को महत्व दें. पदोन्नति और वित्तपोषण के मानदंडों में पारदर्शी प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, साथ ही विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सत्यापन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. नैतिक साक्षरता को एक बार की औपचारिक प्रशिक्षण प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि अकादमिक पाठ्यक्रम और कॉर्पोरेट पेशेवर विकास का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए. शोधकर्ताओं और नवप्रवर्तकों को केवल तकनीकी कौशल ही नहीं, बल्कि नैतिक विवेक से भी सुसज्जित किया जाना चाहिए. ऐसी संरचनात्मक प्रोत्साहन प्रणाली नहीं होनी चाहिए जो बेईमानी को बढ़ावा दे. संस्थागत नेताओं को ईमानदारी का पालन करना चाहिए और पद की परवाह किए बिना लगातार परिणाम लागू करने चाहिए. खुले डेटा पहल, पुनरुत्पादन मानक और सहयोगात्मक सहकर्मी समीक्षा प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिए ताकि परिणामों के निर्माण में धोखाधड़ी को रोका जा सके. व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके.

ईमानदारी के बिना, अनुसंधान प्रदर्शन बन जाता है, नवाचार एक नाटक और प्रगति एक भ्रम. विश्वविद्यालयों और कॉर्पोरेट संस्थानों के सामने स्पष्ट विकल्प है या तो वे उस मार्ग पर चलते रहें जहां मापदंड अर्थ से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, या ऐसी प्रणाली का निर्माण करें जहां ईमानदारी खोज की अपरिवर्तनीय नींव हो. विश्वसनीय ज्ञान का भविष्य दूसरे विकल्प को चुनने पर निर्भर करता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

अतिथि लेखक, डॉ. एसएस मंथा
(लेखक AICTE के पूर्व अध्यक्ष और आरबी विश्वविद्यालय, नागपुर के कुलाधिपति हैं.)

अतिथि लेखक, अशोक ठाकुर
(लेखक भारत सरकार के पूर्व शिक्षा सचिव, MHRD हैं.)

 


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