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क्या भारत की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय अपनी कन्विक्शन रेट में हेरफेर करती है?

एजेंसी दावा करती है कि उसकी कन्विक्शन रेट 93.6 प्रतिशत है, वह ₹1.54 लाख करोड़ की जब्त संपत्तियों को संभालती है, और आज तक कभी किसी स्वतंत्र परफॉर्मेंस ऑडिट के दायरे में नहीं आई है. यहां पढ़िए कि जब आप इसके आंकड़ों को बारीकी से देखते हैं तो क्या सामने आता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

पलक शाह 

भारत की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की वित्तीय स्थिति और कार्यप्रणाली देश के सबसे बड़े रहस्यों में से एक बनी हुई है.

ED की 2024–25 की वार्षिक रिपोर्ट 93.6 प्रतिशत की कन्विक्शन रेट के साथ शुरू होती है. यह ऐसा आंकड़ा है जो संसद के जवाबों, FATF ब्रीफिंग्स और टीवी डिबेट्स तक पहुंचता है. यह एक सटीक और प्रभावी जांच तंत्र का संकेत देता है.

लेकिन जब आप इसके गणित को देखते हैं, तो तस्वीर बदल जाती है.

ED ने अपने गठन के बाद से PMLA के तहत 1,739 प्रॉसिक्यूशन शिकायतें दाखिल की हैं. इनमें से केवल 47 मामलों में ही अंतिम अदालत का फैसला आया है.

“47”

यानी सिर्फ 47 मामले.

93.6 प्रतिशत का दावा इन्हीं बेहद छोटे हिस्से पर आधारित है, जो कुल मामलों का केवल 2.7 प्रतिशत है. बाकी 97 प्रतिशत मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं और मुख्य आंकड़े में शामिल नहीं किए जाते.

यह असल में कन्विक्शन रेट नहीं है, बल्कि एक ऐसा चयनित आधार है जिससे एक विशेष परिणाम निकल सके. और आज तक कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं है जो आधिकारिक तौर पर इसे चुनौती दे सके.

यहीं सवाल उठता है: क्या ED अपनी कन्विक्शन रेट को “कुक” करती है?

₹1.54 लाख करोड़, जिसका कोई स्वतंत्र हिसाब नहीं

रिपोर्ट का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण दावा सिर्फ कन्विक्शन रेट नहीं है, बल्कि संपत्ति जब्ती का आंकड़ा है.

₹1,54,594 करोड़ की अस्थायी रूप से जब्त संपत्तियां जमीन, इमारतें, कंपनियां, बैंक खाते, जिन्हें अक्सर वर्षों तक फ्रीज रखा जाता है.

FY25 में ही ED ने ₹30,036 करोड़ की संपत्ति जब्त की, जो पिछले वर्ष की तुलना में 141 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है.

लेकिन इन संपत्तियों का मूल्यांकन कैसे किया गया? इसका कोई स्वतंत्र सत्यापन नहीं है. न ही CAG ने यह जांचा है कि ये मूल्यांकन सटीक, कम या अधिक दिखाए गए हैं.

यह आंकड़ा खुद एजेंसी द्वारा रिपोर्ट किया गया है और बिना किसी बाहरी जांच के आगे बढ़ता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि FY25 में ₹5,238 करोड़ का FEMA जुर्माना लगाया गया, लेकिन इसमें से कितना वसूला गया, यह जानकारी नहीं दी गई है.

वह ऑडिटर जो मौजूद ही नहीं है

ED का पूरा बजट भारत की संचित निधि से आता है. संविधान के अनुच्छेद 148–151 और CAG अधिनियम 1971 की धारा 13 के तहत यह पूरी तरह से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के अधिकार क्षेत्र में आता है.

लेकिन वास्तविकता में CAG केवल प्रशासनिक खर्चों जैसे वेतन, भवन और खरीद का ऑडिट करता है.

ED के संचालन और प्रदर्शन पर आज तक कोई समर्पित परफॉर्मेंस ऑडिट नहीं किया गया है, और न ही ऐसा कोई रिपोर्ट संसद में पेश हुआ है.

आयकर विभाग और कस्टम्स जैसे संस्थानों का ऑडिट हो चुका है, लेकिन ED का नहीं.

2024–25 की 212 पन्नों की रिपोर्ट में CAG का एक भी उल्लेख नहीं है.

वह डिस्क्लेमर जिसे नजरअंदाज कर दिया गया

रिपोर्ट के अंत में एक अहम लाइन दर्ज है.

प्रवर्तन निदेशालय कहता है कि वह दस्तावेज में मौजूद किसी भी तथ्य, त्रुटि, व्याख्या या राय की जिम्मेदारी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करता.

यानि: ये हमारे आंकड़े हैं, हम इन्हें सही मानते हैं, लेकिन अगर ये गलत हों तो इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं है.

एक मजबूत जवाबदेही प्रणाली में यह काम बाहरी ऑडिट करता है, लेकिन यहां यह खाली जगह बनी रहती है.

असल निगरानी क्या है?

ED पर निगरानी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है. अदालतें मामलों की जांच करती हैं, FATF ने 2024 में भारत की सराहना की है, और आंतरिक निगरानी तंत्र भी मौजूद है.

लेकिन ये सभी निगरानी व्यक्तिगत मामलों तक सीमित हैं, पूरी प्रणाली के प्रदर्शन को नहीं आंकते.

स्पष्ट स्थिति

ED भारत की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसियों में से एक है. यह बिना अदालत के फैसले से पहले संपत्तियां जब्त कर सकती है और भारी वित्तीय नियंत्रण रखती है.

लेकिन यह अपनी सफलता खुद तय करती है, अपने आंकड़े खुद सत्यापित करती है, और अपनी रिपोर्ट खुद प्रकाशित करती है, बिना किसी स्वतंत्र ऑडिट के जो इसे चुनौती दे सके.

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या एक पूरी संस्था इतने लंबे समय तक बिना स्वतंत्र जांच के अपनी ही परिभाषित सफलता के आधार पर काम कर सकती है?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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