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क्यों सबसे जरूरी है हिंदी? अंग्रेज हमारी भाषा बर्बाद करने का जिम्मा किसे दे गए?
सभी डिग्री लेकर, कुछ पढ़कर, कुछ रट कर, कुछ नकल कर और बहुत थोड़े समझ कर नौकरी की तलाश में घूम रहे हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
पूरन डावर
(सामाजिक चिंतक एवं आर्थिक विश्लेषक)
सरकार के कार्य प्रमुख तौर पर आंतरिक्ष सुरक्षा, बाह्य सुरक्षा, विदेश नीति पर केंद्रित होते हैं, शेष कार्यों के लिेए समाज को ही आगे आना होता है. संस्कृत समाप्त तो संस्कृति समाप्त...यह भाव वरिष्ठ संघ प्रचारक माननीय दिनेश जी के एकल आरोग्य अभियान के राष्ट्रीय अधिवेशन में उद्घाटन सत्र में अपने उद्बोधन में व्यक्त किए जो प्रभावी और छाप छोड़ने वाले थे. उन्हीं की तरह मेरा भी कई मसलों पर स्पष्ट मत है, जिनमें हिंदी का उत्थान देश के विकास के लिए अतिआवश्यक है।
गरीब की ही नहीं, बल्कि सभी की अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा एवं चिकित्सा सरकार द्वारा या शिक्षा सेस और लेबर सेस के माध्यम से की जा सकती है. उच्च शिक्षा सस्ती ऋण व्यवस्था और अच्छी चिकित्सा स्वास्थ्य बीमा से ही हो सकती है. अभिभावकों पर भी बड़ा बोझ संभव नहीं है. शिक्षा, चिकित्सा कार्य में समाज का सहयोग सरकार को और सरकार का सहयोग समाज को अवश्यंभावी है.
कांग्रेस को दे गए जिम्मा
बड़ी चालाकी से अंग्रेज स्वतंत्रता के बाद इसे समाप्त करने का जिम्मा कांग्रेस को दे गए. आजादी के बाद भी माध्यम हिंदी था. संस्कृत भी पढ़ाई जाती थी. काम करने का हुनर भी सिखाया जाता था. अंग्रेज चले गए अपने प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस को छोड़ गए. कांग्रेस का गठन भी अंग्रेज सर ह्यूम ने ही किया था. सारी शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त, केवल मिशनरी स्कूल, केवल अंग्रेजी माध्यम बच गए. ये मान लिया गया कि अंग्रेजी का ज्ञान ही शिक्षा है. अंग्रेजी बोलने वाला ही पढ़ा-लिखा है. अंग्रेजी ही ज्ञान है. हिंदी में हीनता भर दी गई. छात्रों को समझ आया ही नहीं, क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी विदेशी भाषा में परिपक्वता के साथ समझ ही नहीं सकता और उन सबके हाथ से हुनर भी छिन गया.
क्या हालत से एजुकेशन की?
सभी डिग्री लेकर, कुछ पढ़कर, कुछ रट कर, कुछ नकल कर और बहुत थोड़े समझ कर नौकरी की तलाश में घूम रहे हैं. कामगारों के पास केवल डिग्री का झुनझुना, आरक्षण और जीवन भर दलित का दाग है. देश की आबादी का मात्र 1 प्रतिशत से भी कम नौकरियों में, वह भी कुछ परिवारों तक सिकुड़ गया, उन्हीं परिवारों के सदस्य ही मौका पाते हैं, जो एक बार आईएएस या विधायक, सांसद बन चुके हैं. बाकी की स्थिति तो पहले से बदतर है, क्योंकि उन्होंने अपने काम का हुनर भी खो दिया है.
हिंदी को हर हाल में अपनाना ही होगा
समाज को आगे बढ़ना होगा. अपनी मातृभाषा में अच्छी रोजगार परक शिक्षा आज देश को आत्मनिर्भर होने के लिए बहुत जरूरी है. भारत को केवल निर्यात पर देखने की जरूरत नहीं. अपने देश का 130 करोड़ का बाजार है और दूसरे देशों की गिनती का जहां अंत होती है, वहां हमारी शुरू होती है. बाजार अव्यवस्थित से व्यवस्थित की ओर जा रहे हैं. निर्यात पर उतना ही निर्भर रहना है, जितनी हमारे आयात की आवश्यकता है. ईंधन के विकल्प भी अब दूर नहीं हैं. गडकरी जी ने तो पेट्रोल-डीजल को सिर्फ 5 साल का मेहमान बताया है. इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन पर तेजी से काम हो रहा है. सैन्य क्षेत्र में भी देश में बड़े लक्ष्य लिए गए हैं.
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