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आखिर बिजनेस की दुनिया में उतरने को लेकर इतने शर्मीले क्यों हैं बिहारी युवा? 

1991 में हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद भी एक औसत बिहारी की सोच नहीं बदली है. वे अभी भी दूसरों के लिए काम करने को तवज्जो देते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

बिहार और दुनियाभर में फैले बिहारियों ने हाल में प्राचीन हिंदू त्योहार 'छठ' मनाया. बिहार के साथ-साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के मधेश क्षेत्रों भी इस त्योहार की धूम देखी गई. बिहार में टैलेंट की कोई कमी नहीं है. अक्सर बिहारियों की उपलब्धि से जुड़ी कोई न कोई खबर सुनने में आ ही आती है. ऐसे में मेरा युवा और ऊर्जावान बिहारियों से एक सवाल पूछने का मन करता है - आप बिजनेस की दुनिया में हाथ क्यों नहीं आजमाते? यदि वे सभी प्रतियोगी परीक्षाओं को पास कर सकते हैं, शिक्षा के प्रतिष्ठित मंदिरों में जगह बना सकते हैं, सरकारी नौकरियों में चुने जा सकते हैं, तो ऐसा क्या है जो उन्हें बिजनेस वर्ल्ड में उतरने से रोक रहा है?

दूसरों के लिए काम करना पसंद
गंभीरता से, यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि 'ज्ञान की भूमि' के लोग उद्यमी बनने को लेकर इतने शर्मीले क्यों हैं?  वे केवल सरकारी अधिकारी, शिक्षक, पत्रकार, बैंकर, अधिवक्ता या इंजीनियर बनना क्यों पसंद करते हैं? कल्पना कीजिए कि 1991 में हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद भी एक औसत बिहारी की सोच नहीं बदली है. वे अभी भी दूसरों के लिए काम करने को तवज्जो देते हैं, बनस्पत इसके कि दूसरे उनके लिए काम करें. यह कोई सीक्रेट नहीं है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद उन राज्यों और जातियों के लोगों ने भी अपना कुछ न कुछ शुरू कर दिया है, जो व्यवसाय करने के लिए नहीं जाने जाते थे. इस तरह आर्थिक उदारीकरण एक गेम चेंजर साबित हुआ.

केवल कुछ नाम आएंगे सामने 
आश्चर्य की बात यह है कि बिहार में रहने वाले मारवाड़ियों ने भी व्यवसाय में कुछ खास नहीं किया है. यदि आप बिहार से ताल्लुख रखने वाले उद्यमियों/उद्योगपतियों/कॉर्पोरेट घरानों के बारे में खोजें, तो संभव है कि कुछ नाम ही सामने आएं. उदाहरण के तौर पर, वेदांत के चेयरमैन अनिल अग्रवाल, देश की प्रमुख निजी सुरक्षा एजेंसी SIS के संस्थापक अध्यक्ष आरके सिन्हा, Alkem Pharma और Aristo Pharma आदि. Alkem और Aristo Pharma के प्रमोटर क्रमश: सम्प्रदा सिंह और महेंद्र प्रसाद हैं.

इनकी सफलता भी नहीं कर सकी प्रभावित
बेशक, 1991 के बाद जब भारत ने उदारीकरण को स्वीकार किया, तो चीजें बेहतर होती चली गईं. एन.नारायण मूर्ति, नंदन नीलेकेनी (इंफोसिस), सचिन और बिन्नी बंसल (फ्लिपकार्ट), ओला कैब्स के भाविश अग्रवाल, मेक माई ट्रिप के दीप कालरा और कई अन्य के लिए अपने सपनों को साकार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ. यह किसी से छिपा नहीं है कि इंफोसिस ने 1991 के बाद तेजी से आगे बढ़ना शुरू किया. 1981 में अपनी स्थापना से लेकर 1991 तक उसकी रफ्तार बेहद धीमी रही थी. आज इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के बाद दूसरी सबसे बड़ी भारतीय आईटी कंपनी है. वर्तमान में, इंफोसिस इसलिए खबरों में है, क्योंकि उसके संस्थापक अध्यक्ष नारायणमूर्ति के दामाद ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गए हैं. इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि अगर भारत उदारीकरण के रास्ते पर नहीं जाता तो क्या इंफोसिस जैसी कंपनियां इतनी तेजी से वृद्धि देख पातीं. ताज्जुब की बात है कि Zomoto, Infosys, Ola सहित अन्य कंपनियों की आश्चर्यजनक सफलता की कहानियां भी बिहारी युवाओं को अपने चुने हुए मार्ग को बदलने के लिए प्रेरित करने में विफल रही हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

जोखिम नहीं लेना चाहते बिहारी
बिहार के प्रख्यात समाज विज्ञानी महंत राजीव रंजन दास (Mahanth Rajiv Ranjan Das) एक औसत बिहारी के मानस की व्याख्या करते हुए कहते हैं- 'व्यापार में सफल होने के लिए, आपको साहसी और जोखिम लेने के लिए तैयार रहना होता है. जबकि स्वभाव अनुसार बिहारी जोखिम लेने से कतराते हैं. औसत बिहारी खुशमिजाज और संतुष्ट होता है. उसे ज्यादा की भूख नहीं होती. उसे लगता है कि अगर उसे नौकरी, खासकर सरकारी नौकरी मिल जाती है, तो उसने दुनिया में सबकुछ पा लिया. इस मानसिकता के साथ, उनसे उद्यमी बनने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए'.

लालू राज भी इसके लिए जिम्मेदार!
कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं और दावा करते हैं कि लालू राज बिहार की उद्यमिता के ताबूत में आखिरी कील की तरह साबित हुआ. क्योंकि इस दौरान सैकड़ों बिहारी उद्यमियों ने अपना राज्य छोड़ दिया और देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी दुकानें खोलीं. कई गुजरात, दिल्ली और महाराष्ट्र में बस गए हैं. उनमें से कुछ फार्मा व्यवसाय में हैं. वैसे दुष्यंत सिन्हा और मोहम्मद रजी, महंत के इस दावे को चुनौती दे रहे हैं कि बिहारी स्वभाव से व्यवसायी नहीं होते. उदाहरण के लिए, दुष्यंत सिन्हा वर्तमान में नोएडा में एक बड़ी मीडिया कंसल्टेंसी फर्म चलाते हैं. कुछ वर्षों में ही सिन्हा की कंपनी इंटीग्रेटेड सेंटर फॉर कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड (ICCPL) कई गुना आगे बढ़ गई है. उनकी कंपनी Puri Constructions, Anantraj Industries, Ansal Housing, CREDAI, Prateek Group, Gulshan Homz, Ajnara India, Purvanchal Group, Paras Hospitals, Hotel Ashoka (ITDC), Hotel Grand, Goldsouk Group, Mapsko, OMAXE,OYO, Raheja Developers, Gaurs, Mahagun और कई अन्य कंपनियों को सेवाएं दे रही है. बिहार और झारखंड दोनों से ताल्लुख रखने वाले दुष्यंत सिन्हा कहते हैं, B-स्कूल से वित्त और विपणन में प्रबंधन की डिग्री के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और अपनी खुद की कंपनी शुरू की.

बिहारी युवाओं को सलाह 
वहीं, सहरसा के मूल निवासी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व छात्र मोहम्मद रज़ी Exhibitions से जुड़ा बेहद सफल व्यवसाय चला रहे हैं. इंजीनियरिंग के बाद जब रजी दिल्ली आए, तो उनकी व्यवसाय करने की कोई योजना नहीं थी. वह भी अन्य बिहारियों की तरह नौकरी करना चाहते थे, लेकिन दिल्ली ने उनका इरादा बदल दिया. दुष्यंत और रजी दोनों NCR में रहते हैं. 2 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देने वाली SIS सिक्योरिटीज के संस्थापक अध्यक्ष आरके सिन्हा बिहारी युवाओं के लिए एक सलाह देते हैं. उनके अनुसार, उन्हें कुछ सेवा-आधारित व्यवसाय शुरू करना चाहिए. वे अपने घर से भी सेटअप शुरू कर सकते हैं. सेवा क्षेत्र बिहारी युवाओं की सोच बदल सकता है. यदि उनके पास कोई शानदार विचार है, तो उन्हें उस पर काम करना चाहिए'.


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