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ट्रंप युग और वैश्विक व्यवस्था पर बढ़ता दबाव

डोनाल्ड ट्रंप की नेतृत्व शैली वैश्विक अस्थिरता को बढ़ावा देती है और साथ ही दुनिया भर की संस्थाओं और नेतृत्व की कमजोरियों को उजागर करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

डोनाल्ड ट्रंप के संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे, गैर-लगातार कार्यकाल की शुरुआत किए लगभग 13 महीने हो चुके हैं. इस दौरान वैश्विक भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. वे लगातार नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में बने रहे हैं.

संरक्षणवादी नीतियों से शुरुआत करते हुए, उनके शासनकाल में संरक्षणवाद ने अभूतपूर्व ऊंचाइयां हासिल की हैं. यह रुख एडम स्मिथ द्वारा उनकी प्रसिद्ध कृति “द वेल्थ ऑफ नेशंस” में स्थापित सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है, जहां उन्होंने सीमित सरकारी हस्तक्षेप और मुक्त बाजार को आर्थिक सफलता के लिए आवश्यक बताया था.

संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके टैरिफ नीतियों को इसलिए अमान्य कर दिया गया क्योंकि वे कांग्रेस की मंजूरी को दरकिनार करती थीं. इसके बावजूद ट्रंप अपने उस सिद्धांत पर कायम हैं कि “क्या सही है” से ज्यादा “कौन सही है” तय किया जाए. उनका “माय वे ऑर द हाईवे” वाला दृष्टिकोण वैश्विक अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाता है.

उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित पहले से ही कमजोर वैश्विक संस्थानों को और कमजोर किया है और खुद को एक स्वयंभू सर्वोच्च संरक्षक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है. अपने लगभग हर बड़े संवाद में वे इस बात पर गर्व करते हैं कि उन्होंने देशों के बीच कई संभावित युद्धों को रोका है. हालांकि वे कभी इन संघर्षों के मूल कारणों को समझने या यह आकलन करने की कोशिश नहीं करते कि वास्तव में न्यायसंगत क्या है.

उनकी रणनीति अक्सर उनके छिपे हुए उद्देश्यों को पूरा करने का एक साधन प्रतीत होती है. सौभाग्य से इस युद्धोन्मुखी नेता को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, हालांकि व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि इस पुरस्कार के सभी प्राप्तकर्ता वास्तव में इसके योग्य या विश्वसनीय नहीं रहे हैं. जिन संघर्षों को सुलझाने का उन्होंने दावा किया है, उनमें से कोई भी वास्तविक समाधान तक नहीं पहुंचा है.

मध्य पूर्व में जारी उथल-पुथल इसका प्रमुख उदाहरण है. 1950 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को गिराए जाने और उसके बाद वर्षों तक अपनाई गई कई गलत नीतियों ने अंततः आज की स्थिति पैदा की. ट्रंप का यह दावा कि वे तय करेंगे कि ईरान का सर्वोच्च नेता कौन होगा या वेनेजुएला या क्यूबा पर कौन शासन करेगा, दुनिया में लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर तानाशाही के एक रूप को दर्शाता है.

स्थिति का एक और पहलू यह है कि उनके करीबी सहयोगियों, जिनमें ‘यस मैन’ भी शामिल हैं, को महत्वपूर्ण पदों पर रखा गया है. चार्ल्स कुशनर फ्रांस और मोनाको में अमेरिका के राजदूत के रूप में कार्य कर रहे हैं, जबकि लारा ट्रंप ने कुछ बदलाव लागू करने के लिए थोड़े समय के लिए रिपब्लिकन नेशनल कमेटी की सह-अध्यक्ष के रूप में कार्य किया.

इसके अलावा एक करीबी पारिवारिक सहयोगी को ग्रीस में राजदूत नियुक्त किया गया. यह वास्तव में “अमेरिका फर्स्ट” नीति को दर्शाता है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से “फैमिली फर्स्ट” रणनीति को प्राथमिकता देता हुआ प्रतीत होता है. इससे उनके और उनकी टीम की भ्रष्ट विचारधाराएं भी उजागर हुई हैं.

एपस्टीन फाइलों का संपादन और वह असम्मानजनक नेतृत्व शैली, जिसमें राज्य प्रमुखों, स्थापित संस्थानों, मीडिया पेशेवरों, पार्टी सदस्यों और विपक्ष के नेताओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया, इस मानसिकता को दर्शाती है कि “मैं राजा हूं और बाकी सभी केवल प्रजा हैं.” ट्रुथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अत्यधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है और आधिकारिक सरकारी माध्यमों को दरकिनार करते हुए संचार का प्रमुख साधन बन गया है.

हालांकि उनके दूसरी बार सत्ता में आने का एक सकारात्मक परिणाम यह भी रहा है कि इससे वैश्विक संस्थानों, कंपनियों और सरकारों में मौजूद अक्षम नेतृत्व की व्यापकता उजागर हुई है. इसने न केवल इन अक्षम नेताओं को सामने लाया है, बल्कि उन संस्थानों और नागरिकों को भी, जिन्होंने उन्हें चुना या उनका समर्थन किया.

व्यवसाय की दुनिया में हम अक्सर चार अक्षरों के एक संक्षिप्त रूप ‘VUCA’ का उपयोग करते हैं. हमने चुपचाप लेकिन महत्वपूर्ण रूप से उस अस्थिरता, अनिश्चितता, जटिलता और अस्पष्टता को बढ़ाने में योगदान दिया है, जिसे हम आज अपने आसपास देख रहे हैं. इस स्थिति में इतना अधिक मलबा जमा हो गया है जिसे साफ करने की जरूरत है, और यह प्रक्रिया व्यक्ति से शुरू होकर समाज, शहरों और अंततः पूरे विश्व तक पहुंचेगी. इस अव्यवस्था को ठीक करना, जिसे बनाना अपेक्षाकृत आसान था, एक विशाल प्रयास की मांग करेगा.

भारत के विदेश मंत्री ने स्लोवाकिया में आयोजित 17वें ग्लोबसेक ब्रातिस्लावा फोरम में एक चर्चा के दौरान कहा था, “यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं ही दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं.” उन्होंने इस बहुध्रुवीय दुनिया में साझा मूल्यों की आवश्यकता और आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण से दूर जाने पर जोर दिया.

इस दुनिया को बदलने के लिए हमें कोई जादुई छड़ी नहीं मिलने वाली. जरूरी है कि हर व्यक्ति वही बदलाव बने, जिसे वह दुनिया में देखना चाहता है. हमें इस बात पर अधिक ध्यान देना होगा कि क्या सही है, न कि कौन सही है. आइए हम सभी अपनी क्षमता के अनुसार इस दुनिया को बेहतर बनाने और इसे रहने के लिए अधिक सुखद स्थान बनाने में योगदान दें.

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.

अतिथि लेखक: श्रीप्रकाश नादाधुर श्रीधरन

(श्रीप्रकाश नादाधुर श्रीधरन “बिल्डिंग ब्लॉक्स” के लेखक हैं और उनके पास बिजनेस डेवलपमेंट, कंसल्टिंग और मार्केटिंग में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. वे प्रज्ञा कंसल्टिंग नामक एक बुटीक कंसल्टिंग फर्म के संस्थापक हैं, जो ग्राहकों को मार्केटिंग और रणनीति के क्षेत्र में सलाह देती है. उन्होंने एमटीआर फूड्स, नीलसन और आईबीएम में नेतृत्व की भूमिकाओं में काम किया है. इसके अलावा उन्होंने भारत की पहली यूथ कंसल्टिंग फर्म की स्थापना की और हुबली में एफएमसीजी पार्क स्थापित करने वाली कोर टीम का भी हिस्सा रहे हैं.)
 


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