✕

होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / द ऑयल ट्रैप: क्या भारत की ग्रोथ स्टोरी की कोई छिपी हुई एक्सपायरी डेट है?

द ऑयल ट्रैप: क्या भारत की ग्रोथ स्टोरी की कोई छिपी हुई एक्सपायरी डेट है?

शुभ्रांशु सिंह लिखते हैं कि USD 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को तेल की समस्या झेलनी पड़ेगी, और USD 10 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को भी तब तक असर होगा, जब तक रीवायरिंग अभी गंभीरता और बड़े पैमाने पर शुरू नहीं होती.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि का हर प्रतिशत बिंदु फंदे को और कसता है. यह निराशावाद नहीं बल्कि सीधा गणितीय तथ्य है. भारत एक USD 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का निर्माण उस आधार पर कर रहा है जिसे वह नियंत्रित नहीं करता, जिसकी कीमत तय नहीं कर सकता, और जिसे जल्दी बदल भी नहीं सकता. वह आधार है तेल.

आयातित, डॉलर में मूल्यांकित, और निकट भविष्य में संरचनात्मक रूप से अपरिवर्तनीय. भारत की ग्रोथ स्टोरी के बारे में शायद सबसे असहज सच्चाई यह है कि जितनी तेजी से भारत बढ़ता है, उतना ही अधिक वह जोखिम में आता है. इसे व्यापक रूप से समझा नहीं गया है. इसे समझा जाना चाहिए.

सब्सट्रेट, सेक्टर नहीं

सोचिए कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए तेल वास्तव में क्या मायने रखता है. डीजल हमारे माल को ढोता है. पेट्रोल 30 करोड़ दोपहिया वाहनों को सड़क पर चलाता है. एविएशन टरबाइन फ्यूल उस देश को जोड़ता है जो सिर्फ सड़कों से कवर करने के लिए बहुत विशाल है. पेट्रोकेमिकल्स आपके फोन कवर, आपकी टी-शर्ट, आपके अस्पताल के IV बैग में मौजूद हैं. जब लोग तेल की कीमतों के बारे में सुनते हैं, तो वे पेट्रोल पंप की तस्वीर देखते हैं. वास्तविकता यह है कि यह पूरी अर्थव्यवस्था की नसों में दौड़ रहा है, उन चीजों को छूता हुआ जिन्हें अधिकांश लोग कच्चे तेल से जोड़कर नहीं देखते.

भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 87 प्रतिशत आयात करता है, करीब 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन, जिसकी सालाना लागत लगभग USD 120 से USD 160 बिलियन के बीच होती है. जिन वर्षों में ब्रेंट की कीमतें बढ़ती हैं, यह आंकड़ा और बढ़ जाता है, चालू खाते के घाटे को चौड़ा करता है, डॉलर की मांग बढ़ाता है और रुपये को कमजोर करता है. कमजोर रुपया अगले बैरल को घरेलू स्तर पर और महंगा बना देता है. शांत वर्षों में भी, यह भारत की राजकोषीय और मौद्रिक नीति को आकार देने वाली सबसे शक्तिशाली ताकत बनी रहती है.

ग्रोथ स्टोरी में छिपा विरोधाभास यह है कि हर नई फैक्ट्री, हर हाईवे का किलोमीटर, हर हवाई उड़ान, हर कोल्ड चेन जो शुरू होती है, ऊर्जा की मांग बढ़ाती है. वर्तमान संरचना में, इसका मतलब भारी मात्रा में अधिक तेल है. वृद्धि निर्भरता को और गहरा करती है. USD 3 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को USD 5 ट्रिलियन की तुलना में कम तेल की जरूरत थी. USD 10 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को नाटकीय रूप से अधिक की आवश्यकता होगी, जब तक कि ऊर्जा मिश्रण में संरचनात्मक बदलाव न हो.

भारत के रणनीतिक योजनाकार इसे समझते हैं. कम स्पष्ट यह है कि क्या राजनीतिक अर्थव्यवस्था ने इसे आत्मसात किया है. ऊर्जा सुरक्षा को अभी भी एक हेडलाइन मुद्दे के रूप में देखा जाता है, न कि एक डिज़ाइन बाधा के रूप में. यह भाषणों में दिखाई देता है लेकिन निर्णयों की संरचना में कम.

क्यों EVs और सोलर आवश्यक हैं लेकिन पर्याप्त नहीं

इस फ्रेमिंग के जवाब में सामान्य प्रतिक्रिया ट्रांजिशन की कहानी है. इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और एथेनॉल ब्लेंडिंग. ये चीजें उस गति से आगे नहीं बढ़ रही हैं जिसकी इस समस्या को जरूरत है.

देखिए कि भारत की तेल मांग वास्तव में कहां है. दोपहिया और तिपहिया वाहन, जो इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए सबसे उपयुक्त हैं, वहीं पर खपत केंद्रित नहीं है. डीजल लंबी दूरी के ट्रकिंग, कृषि पंप, ट्रैक्टर आदि को चलाता है. यही देश की लॉजिस्टिक्स रीढ़ है. यहीं पर मात्रा है, और यहीं इलेक्ट्रिफिकेशन को सबसे कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. बैटरी की अर्थव्यवस्था, चार्जिंग का समय, रेंज और इंफ्रास्ट्रक्चर वास्तविक बाधाएं हैं और तकनीकी व वित्तीय मामला अभी पूरा नहीं हुआ है. यह कम से कम एक दशक तक सार्थक रूप से नहीं होगा.

सोलर और पवन ऊर्जा बिजली पैदा करते हैं. तेल एक तरल ईंधन है. ये अलग-अलग समस्याओं को संबोधित करते हैं. नवीकरणीय ऊर्जा तेल पर निर्भरता को तभी कम करती है जब परिवहन और उद्योग इलेक्ट्रिफाई हों, जो अभी निर्माणाधीन स्थिति है, न कि पहले से मौजूद. राजस्थान में लगा एक सोलर पैनल तमिलनाडु में एक डीजल ट्रक के ईंधन बिल को प्रभावित नहीं करता.

जो वास्तव में बदलाव ला सकता है वह कम आकर्षक है. माल परिवहन को सड़कों से रेल की ओर तेजी से शिफ्ट करना. सप्लाई चेन में ईंधन की तीव्रता को कम करना. दोपहिया और तिपहिया, शहरी बेड़े, लास्ट-माइल डिलीवरी को इलेक्ट्रिफाई करना, जहां अर्थशास्त्र पहले से काम करता है. एथेनॉल ब्लेंडिंग को गंभीरता से बढ़ाना. इनमें से कोई भी अकेला समाधान नहीं है. लेकिन साथ मिलकर ये एक यथार्थवादी महत्वाकांक्षा प्रस्तुत करते हैं. फिर भी पूर्ण समाप्ति नहीं, बल्कि संवेदनशीलता में कमी.

सॉवरेनिटी का प्रश्न

भारत एक नेट प्राइस टेकर है, प्राइस मेकर नहीं. यहां एक आयाम है जिसे शुद्ध आर्थिक विश्लेषण अक्सर कम आंकता है. तेल पर निर्भरता भू-राजनीतिक स्वायत्तता को उन तरीकों से प्रभावित करती है जो तिमाही आंकड़ों में नहीं दिखते. भारत रूस, पश्चिम एशिया, अमेरिका से आयात करता है, जो स्वयं व्यवधान, प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक अस्थिरता के अधीन हैं. भारत के पास न तो कीमत तय करने की शक्ति है और न ही आपूर्ति पर नियंत्रण. होर्मुज जलडमरूमध्य में संघर्ष नई दिल्ली के लिए दूर की भू-राजनीतिक घटना नहीं है. यह घरेलू मुद्रास्फीति की घटना है, एक राजकोषीय घटना है, और अंततः एक राजनीतिक घटना बन सकती है.

यह विदेश नीति के किनारों को नरम करता है, जिन्हें मापना कठिन लेकिन देखना आसान है. यह ऐसे संबंधों को संतुलित रखने की आवश्यकता पैदा करता है जिन्हें अन्यथा अधिक सीधे तरीके से संभाला जा सकता था. जिन देशों ने इसे सबसे प्रभावी ढंग से संभाला है, और चीन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है, उन्होंने केवल स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों को नहीं अपनाया. उन्होंने सप्लाई चेन पर नियंत्रण स्थापित किया. बैटरियां, रेयर अर्थ्स, सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन. उन्होंने ऊर्जा संक्रमण को रणनीतिक प्रभुत्व में बदल दिया. भारत का वर्तमान दृष्टिकोण अपनाने का है. दो दशकों में यह अंतर निर्णायक हो सकता है.

वास्तविक समाधान क्या मांगता है

भारत को तेल पर निर्भरता समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है. निकट भविष्य में यह न तो संभव है और न ही आवश्यक. इसे यह बदलने की जरूरत है कि तेल की कीमतें कितनी हद तक वृद्धि, मुद्रास्फीति और नीति विकल्पों को निर्धारित करती हैं.

इसका मतलब है ऊर्जा संक्रमण को राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता के रूप में देखना, न कि केवल जलवायु प्रतिबद्धता या औद्योगिक नीति के अवसर के रूप में, भले ही यह वे भी हों. इसका मतलब है लचीलापन डिजाइन करना. इसका मतलब है नीति-निर्माण कक्षों, बाजारों और सार्वजनिक विमर्श में ईमानदारी से यह स्वीकार करना कि इसमें कितना समय लगेगा और इसकी क्या लागत होगी.

ग्रोथ स्टोरी वास्तविक है.

जनसांख्यिकी वास्तविक है.

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर वास्तविक है.

तेल के इस आधार में बदलाव के बिना, हर उछाल अपने भीतर अगले झटके के बीज लिए होता है. अच्छे वर्षों में यह दिखाई नहीं देता. परिस्थितियां बदलने पर यह निर्णायक बन जाता है. USD 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था को तेल की समस्या होगी. USD 10 ट्रिलियन को भी होगी, जब तक कि रीवायरिंग अभी, गंभीरता से और बड़े पैमाने पर शुरू नहीं होती.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक-शुभ्रांशु सिंह
(शुभ्रांशु सिंह एक बिजनेस लीडर, सांस्कृतिक रणनीतिकार और कॉलम लेखक हैं. उन्हें 2025 के लिए Forbes द्वारा 50 सबसे प्रभावशाली वैश्विक CMOs में से एक के रूप में सम्मानित किया गया. वे Effie LIONS फाउंडेशन बोर्ड में APAC प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं.)

 


टैग्स
सम्बंधित खबरें

कविता में एक शोकगीत: मेरे मित्र और बैचमेट, हेमचंद सिरोही, IAS

केजे अल्फोंस लिखते हैं, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में, हेमचंद सिरोही को प्रशासनिक कुशलता, जन-केंद्रित शासन और जनसेवा में योगदान के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था. उनके योगदानों में महाबोधि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की मान्यता दिलाना और जमीनी स्तर पर विकास की पहल शामिल थीं.

4 days ago

दो दुनियाओं के बीच जिंदगी: उथल-पुथल भरे समय की चुनौती

लेखक के अनुसार, हमारे आसपास की दुनिया उतनी नहीं बदली है, जितनी हमारे दिमाग के भीतर की दुनिया बदल गई है. लगातार आती खबरों, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाली चिंताओं के इस दौर में चुनौती है अपना ध्यान फिर से अपने नियंत्रण में लेना और उन चीजों पर फोकस करना, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं.

4 days ago

कलाकार की अनंत रेखाएं: जोगेन चौधरी को श्रद्धांजलि

87 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रख्यात कलाकार अपने पीछे ऐसी विशिष्ट कला छोड़ गए हैं, जो उनकी खास क्रॉस-हैचिंग शैली, असामान्य रेखाओं और गहराई से मानवीय चित्रों के लिए पहचानी जाती है.

5 days ago

समुद्र मंथन का अर्थशास्त्र: समृद्धि के लिए विरोधी शक्तियों की जरूरत क्यों है

लेखिका प्रियंका शर्मा कैंतुरा इस लेख में बताती हैं कि देवताओं, असुरों और लक्ष्मी के प्राकट्य की प्राचीन कथा प्रतिस्पर्धा, सहयोग और धन सृजन के बारे में क्या सीख देती है.

1 week ago

जेमी बीटन: असाधारण दिमाग और अरबों डॉलर के कारोबार के पीछे ज्योतिषीय गणना

क्रिमसन एजुकेशन के संस्थापक की शैक्षणिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता में उभार और 2027 की संभावनाओं का ज्योतिषीय विश्लेषण

1 week ago


बड़ी खबरें

दिल्ली में 1 नवंबर से BS-6 से पुराने वाहनों की नो एंट्री, जानें किन गाड़ियों को मिलेगी छूट

इस फैसले का असर दिल्ली से सटे हरियाणा के शहरों से आने वाले वाहनों पर भी पड़ेगा. खासतौर पर गुरुग्राम और फरीदाबाद से दिल्ली आने वाले वाहन चालकों को इस नियम का ध्यान रखना होगा.

1 day ago

सरदार पटेल के विचारों पर आगे बढ़ रहा भारत, रक्षा उत्पादन 1.80 लाख करोड़ रुपये के पार: राजनाथ सिंह

सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर भारत-भारती ने दिल्ली में आयोजित किया राष्ट्रीय समारोह, रक्षा मंत्री ने कहा- राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली ताकतों के खिलाफ देश एकजुट रहेगा

18 hours ago

तमिलनाडु में 5 लाख से अधिक ग्रामीण घरों को मिलेगा ब्रॉडबैंड कनेक्शन, केंद्र ने दी सब्सिडी को मंजूरी

संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी. केंद्र की वित्तीय सहायता से ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट नेटवर्क का विस्तार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान होगी.

1 day ago

सोना 4,200 रुपये और चांदी 10 हजार रुपये टूटी, एक साल के निचले स्तर पर पहुंचे भाव; जानें गिरावट की वजह

MCX पर चांदी करीब 5 फीसदी और सोना 3 फीसदी तक टूट गया. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई.

1 day ago

IDBI बेच रही थी LIC, उसी दौरान Fairfax की कंपनी के बोर्ड में भी रहे LIC के निदेशक

पूर्व नीति आयोग प्रमुख, RBI के डिप्टी गवर्नर, SEBI बोर्ड के सदस्य, रक्षा सचिव और LIC के चेयरमैन जैसे सार्वजनिक पदों पर रह चुके लोगों को Fairfax की भारतीय कंपनियों ने अपने साथ जोड़ा.

1 day ago