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मार्केटिंग का सबसे बड़ा बदलाव, अब क्रिएटर्स बन रहे हैं रणनीतिक बिजनेस पार्टनर

भारत में डिजिटल खरीदारी अब काफी हद तक विजुअल, मोबाइल-केंद्रित और क्रिएटर-आधारित हो चुकी है, जिसे 49.1 करोड़ से अधिक सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और ई-रिटेल के तेज विस्तार से बल मिला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

भारत की क्रिएटर इकोनॉमी का उदय विज्ञापन एजेंसियों के बोर्डरूम या फिल्म स्टूडियो से नहीं हुआ. यह आम लोगों की जिंदगी, रसोईघरों, छतों और बेडरूम से शुरू हुई. यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर सामान्य लोगों द्वारा साझा किए गए रोजमर्रा के कंटेंट से शुरू हुआ यह सफर आज भारत में उपभोक्ता व्यवहार और बिजनेस मार्केटिंग को प्रभावित करने वाली सबसे शक्तिशाली ताकतों में बदल चुका है. आज के उपभोक्ता अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं. ये प्लेटफॉर्म उनकी दैनिक दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, जहां उन्हें मनोरंजन, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, समाचार, सीखने के अवसर और यहां तक कि उत्पादों की खोज और खरीदारी तक की सुविधा मिलती है.

भारत में क्रिएटर-आधारित कॉमर्स का उदय

वर्ष 2026 में भारत दुनिया के सबसे जीवंत सोशल कॉमर्स बाजारों में से एक बन गया है. भारत में डिजिटल खरीदारी अब काफी हद तक विजुअल, मोबाइल-केंद्रित और क्रिएटर-आधारित हो चुकी है, जिसे 49.1 करोड़ से अधिक सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं और ई-रिटेल के तेज विस्तार से बल मिला है. भारत के 29 से 30 करोड़ ई-कॉमर्स ग्राहकों में जनरेशन जेड की हिस्सेदारी 40 से 45 प्रतिशत है. सोशल कॉमर्स और क्विक कॉमर्स मिलकर वर्तमान में भारत के कुल ई-कॉमर्स बाजार का 15 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं और 2030 तक इसके 25 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान है.

लोग क्रिएटर्स पर भरोसा क्यों करते हैं

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने हमारी ध्यान अवधि को अपने कब्जे में ले लिया है. उपभोक्ता इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक और अन्य शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर अधिक समय बिताते हैं. इन प्लेटफॉर्म्स पर फिटनेस और वेलनेस क्रिएटर्स, ब्यूटी और स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर्स, मॉम ब्लॉगर्स, होम क्रिएटर्स और अन्य कंटेंट क्रिएटर्स मौजूद हैं, जिन्होंने अपने फॉलोअर्स के साथ विश्वास और जुड़ाव का मजबूत रिश्ता बनाया है.

क्रिएटर्स अक्सर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की झलकियां साझा करते हैं, जिनमें उनके पसंदीदा उत्पाद, फिटनेस और डाइट रूटीन, आसान भोजन बनाने के तरीके, पैसे बचाने के सुझाव और अन्य व्यावहारिक सलाह शामिल होती हैं, जो दर्शकों से गहराई से जुड़ती हैं.

ये नैनो और माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स हैं, जिन्होंने समय के साथ अपने दर्शकों के साथ दोतरफा संवाद, जुड़ाव और विश्वास विकसित किया है. नैनो इन्फ्लुएंसर्स के पास आमतौर पर 1,000 से 10,000 तक फॉलोअर्स होते हैं, जबकि माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स के पास 10,000 से 1,00,000 तक फॉलोअर्स होते हैं. वे केवल कंटेंट क्रिएटर नहीं रह गए हैं, बल्कि महत्वपूर्ण कॉर्पोरेट मार्केटिंग रणनीतिकार बन चुके हैं.

ब्रांड्स अपना रहे हैं क्रिएटर इकोनॉमी

एफएमसीजी कंपनियां जैसे हिंदुस्तान यूनिलीवर ने भी क्षेत्रीय बाजारों में माइक्रो और नैनो इन्फ्लुएंसर्स में निवेश किया है. रिपोर्टों के अनुसार, कंपनी ने दो वर्ष पहले 10,000 इन्फ्लुएंसर्स से बढ़ाकर 2026 में लगभग 3,00,000 इन्फ्लुएंसर्स का नेटवर्क तैयार किया है. कंपनी ने कथित तौर पर अपने कुल विज्ञापन बजट का 50 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के लिए आवंटित किया है, जिससे कुल विज्ञापन लागत में 5.5 प्रतिशत की कमी आई है और ऑनलाइन एंगेजमेंट बेहतर हुआ है.

आईटीसी ने आशीर्वाद, सनफीस्ट और फियामा जैसे ब्रांडों के लिए फूड, लाइफस्टाइल और क्षेत्रीय इन्फ्लुएंसर्स के साथ साझेदारी की है. डाबर इंडिया ने वेलनेस और आयुर्वेद आधारित क्रिएटर्स का इस्तेमाल किया है. नेस्ले इंडिया फैमिली क्रिएटर्स, पेरेंटिंग इन्फ्लुएंसर्स और फूड व्लॉगर्स का उपयोग करती है. वहीं, नायका ब्यूटी ट्यूटोरियल, प्रोडक्ट रिव्यू और मेकअप ट्रेंड्स के लिए विभिन्न स्तरों के हजारों क्रिएटर्स के साथ काम करती है.

सेलिब्रिटी से ज्यादा भरोसा ऑथेंटिसिटी पर

यहीं सबसे बड़ा बदलाव दिखाई देता है. भारतीय उपभोक्ता अब "अपने जैसे लोगों" की सिफारिशों पर अधिक भरोसा करते हैं, क्योंकि ये क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स चमकदार सेलिब्रिटी विज्ञापनों की तुलना में अधिक वास्तविक और भरोसेमंद लगते हैं.

कम लागत वाला मार्केटिंग मॉडल

नैनो और माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स का उपयोग करना लागत के लिहाज से भी अधिक प्रभावी रणनीति साबित हो रहा है. किसी बड़े सेलिब्रिटी को नियुक्त करने की तुलना में हजारों छोटे इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम करना सस्ता पड़ता है, जो सामूहिक रूप से ब्रांड के लिए अधिक कंटेंट तैयार करते हैं.

उनके फॉलोअर्स सक्रिय रूप से कमेंट करते हैं, बातचीत करते हैं और उत्पाद संबंधी सुझाव मांगते हैं. इससे निवेश पर बेहतर रिटर्न (ROI) और एफएमसीजी श्रेणियों में खरीदारी की अधिक संभावना देखने को मिलती है.

भारत के लगभग 80 प्रतिशत खरीदार नए उत्पादों की जानकारी मुख्य रूप से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए प्राप्त करते हैं. वहीं, हर तीन में से एक भारतीय उपभोक्ता अपने रिटेल खरीदारी के फैसले पूरी तरह शॉर्ट-फॉर्म वीडियो जैसे इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स के आधार पर लेता है.

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की चुनौतियां

हालांकि, इस मॉडल की कुछ चुनौतियां भी हैं. इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के बढ़ने के साथ उपभोक्ता अब पेड प्रमोशन और ब्रांड सहयोग के बारे में अधिक जागरूक हो रहे हैं. यदि इन्फ्लुएंसर्स वास्तविक अनुभव के बिना अत्यधिक उत्पाद प्रचार करते हैं, तो उपभोक्ताओं का भरोसा कम हो सकता है.

इसके अलावा, माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स के बीच कंटेंट की गुणवत्ता में काफी अंतर होता है, जिससे कम गुणवत्ता वाले या अप्रभावी प्रमोशन का जोखिम भी बढ़ जाता है.

एफएमसीजी कंपनियों के लिए संतुलन की चुनौती

इसलिए एफएमसीजी कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रामाणिकता और विज्ञापन के बीच सही संतुलन बनाए रखना है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

अतिथि लेखक-हरप्रीत सिंह नरूला, डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट


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