होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / SVB के गिरने से मिलते हैं ये जरूरी सबक, RBI से भी सीख सकता है US फेडरल

SVB के गिरने से मिलते हैं ये जरूरी सबक, RBI से भी सीख सकता है US फेडरल

बैंकों का बिजनेस बहुत सरल है. यह एक लॉन्ग-टर्म बिजनेस मॉडल होता है जो कुछ शॉर्ट-टर्म एसेट्स के साथ चलता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

 Srinath Sridharan, Independent markets commentator. Media columnist. Board member. Corporate & Startup Advisor / Mentor. 

सिलिकॉन वैली बैंक (SVB) टेक्नोलॉजी की दुनिया का फेवरेट बैंक था और इसे खड़ा करने में 40 साल लगे थे. डिपॉजिटर्स के डिस्ट्रेस सिग्नल्स की बदौलत मैच्योरिटी पूरी होने से पहले डिपॉजिट वापस लेने की वजह से यह बैंक सिर्फ 40 घंटों में ही दिवालिया हो गया. अमेरिका की वैंचर-कैपिटल समर्थित टेक्नोलॉजी और लाइफ-साइंसेज कंपनियों के आधे उपभोक्ता इस बैंक के ग्राहक थे और यह बैंक स्टार्टअप इकोसिस्टम का प्रिय बैंक था. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बैंक के लिए क्या गलत हुआ?

ऐसे चलता है बैंकों का बिजनेस
अच्छी तरह से चलने वाले बैंकों का बिजनेस बहुत सरल है. यह एक लॉन्ग-टर्म बिजनेस मॉडल है जो कुछ शॉर्ट-टर्म एसेट्स के साथ चलता है. उनके एसेट्स और लिक्विडिटी किसी भी ऐसी लायबिलिटी को कवर करते हैं जो मैच्योर होने वाली होती है. बिजनेस में हुए किसी भी नुकसान को कवर करने के लिए उन्हें अतिरिक्त कैपिटल और आउट-ऑफ-टर्न निकासी को कवर करने के लिए लिक्विडिटी भी मिलती है. यदि सभी जमाकर्ता एक ही समय में अपना पैसा निकाल लेते हैं, तो बैंक उन मांगों को पूरा नहीं कर पाएगा जिसकी वजह से ‘बैंक -रन’ की स्थिति पैदा हो जाएगी. SVB के गिरने से हमें यह 10 सबक सीखने को मिलते हैं: 

पहला सबक: अच्छे चलने वाले बैंकों में बैंक-रन हो सकता है. US के केन्द्रीय बैंक, फेडरल बैंक ने इन्फ्लेशन से लड़ने के लिए एक साल के दौरान बहुत तेजी से 8 बार इंटरेस्ट रेट्स में वृद्धि की. इसकी वजह से बैंक के पास पड़े एसेट्स की कीमत में कमी आई और यह बैंक की लायबिलिटी के साथ सही तरीके से मेल नहीं कर पाए. 

दूसरा सबक: जीरो इंटरेस्ट रेट के साथ ही सही लेकिन पैसे पर भी एक गंभीर कीमत जुड़ी हुई होती है. SVB के गिरने के बाद से अब US फेडरल बैंक का ध्यान इन्फ्लेशन से कहीं ज्यादा, आर्थिक स्थिरता पर है. वह भारत के केंद्रीय बैंक RBI (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) से सीख सखते हैं जो आर्थिक स्थिरता के लिए एक इन्फ्लेशन-मैनेजर, प्रमुख डेब्ट-मैनेजर और मोनेटरी-रेगुलेटर की भी भूमिकाएं निभाता है. 

तीसरा सबक: पश्चिम में स्थित सभी चीजें सबसे बेस्ट हों जरूरी नहीं है. सिर्फ इसलिए कि वह बहुत कठिन सवाल पूछता है और थोड़ा साधारण है, हमें RBI को US फेडरल बैंक से कम बिलकुल नहीं समझना चाहिए. US गवर्नमेंट बॉन्ड्स में अपनी बड़ी इन्वेस्टमेंट और बढ़ते हुए इंटरेस्ट रेट्स की बदौलत SVB ने अपने एसेट्स की कीमत को बहुत तेजी से कम होते देखा. लेकिन फिर भी उसने अपनी बुक्स पर वैल्युवेशन में किसी तरह का बदलाव नहीं किया और न ही पर्याप्त लिक्विडिटी को इकट्ठा किया. जब बैंक ने लिक्विडिटी इकट्ठा करने के लिए डिस्काउंट पर अपने एसेट्स को बेच दिया और एसेट्स की कीमत में हुई इस कमी को पूओरा करने के लिए जब बैंक को कैपिटल इकट्ठा करना था तो उसके ग्राहकों को लगा कि यह बैंक डूब रहा है. इसलिए उन्होंने पैसे निकालने शुरू कर दिए जिसकी वजह से ‘बैंक-रन’ की स्थिति पैदा हुई. भारत में RBI अपनी इकाइयों की निगरानी करता है ताकि उनके ALM (एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट) पर RBI की पकड़ बनी रहे और साथ ही उनके पास पड़े एसेट्स की कीमत RBI मार्केट में तय कर सके. इंटरेस्ट रेट के जोखिम को यहां इस तरह मैनेज किया जाता है. 

चौथा सबक: एसेट लायबिलिटी मैनेजमेंट एक रियल-टाइम जॉब है. आपस में डिजिटली लिंक्ड ग्लोबल मार्केट्स में किसी भी एसेट की कीमत को शुन्य तक लाया जा सकता है. 
डिजिटल जमाने की परेशानी: SVB के साथ जो हुआ, वो ज्यादातर बैंकों में या खासकर उन बैंकों में बिल्कुल नहीं होता जिनके ग्राहक नॉन-टेक्नोलॉजी बिजनेस हैं. बैंक्स के पास अक्सर ही लिक्विडिटी की समस्या रहती है और इस समस्या से निपटने के लिए वह कैपिटल भी इकट्ठा करते हैं और एसेट्स भी बेचते हैं. लेकिन SVB के ग्राहक उन लोगों में से थे जो बैंक द्वारा दी गयी चेतावनी को नहीं पढ़ते हैं और एक दुसरे से उसी SVB इकोसिस्टम के माध्यम से जुड़े हुए हैं. इसलिए जब किसी ने बैंक की लोन चुकाने की क्षमता पर सवाल उठाया तो यह मामला बहुत ही जल्दी लिक्विडिटी की समस्या के साथ जुड़कर एक हो गया. बैंक का बिजनेस एक क्षेत्र में केन्द्रित था और रिस्क झेलने के लिए फैला हुआ नहीं था और साथ ही बॉन्ड मार्केट की कीमतों के उतार-चढ़ावों से बचने में भी सक्षम नहीं था. 

पांचवां सबक: चाहे वह प्रोडक्ट्स हों, कंज्यूमर सेगमेंट हो या भूगोल ही क्यों न हो, लेकिन किसी भी चीज का एक ही क्षेत्र में केन्द्रित होना कभी कभी दुःख देता है, या फिर जैसा SVB के मामले में देखने को मिला, कभी कभी यह बहुत घातक भी हो सकता है. बैंकों का बिजनेस ही जोखिमों की कीमत पर आधारित है. 

गंभीर जांच के लिए पर्याप्त साइज: 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद 2010 में US ने Dodd-Frank एक्ट को अपना लिया और इस एक्ट ने ‘व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण’ वित्तीय संस्थाओं के लिए अतिरिक्त रेगुलेटरी निगरानी को सुनिश्चित किया. डोनल्ड ट्रम्प के समय US सरकार ने अपने बैंकिंग सिस्टम को ज्यादा उदारवादी बनाने का निर्णय लिया और US की सरकार ने क्षेत्र के बहुत से नियमों को हटा दिया. पहले अतिरिक्त निगरानी के लिए जहां 50 बिलियन डॉलर्स के  एसेट्स की सीमा थी वहीं, अब इसे बढ़ाकर 250 बिलियन डॉलर्स के एसेट्स तक कर दिया गया. इत्तफाक से जब SVB गिरा तो उसके एसेट्स की कीमत 213 बिलियन डॉलर्स थी. 

छठा सबक: वित्तीय संस्थान, कम निगरानी कि बजाय ज्यादा निगरानी में ही ठीक हैं. वो कहते हैं न शॉर्ट-टर्म का दर्द लॉन्ग-टर्म में परेशानी झेलने से ज्यादा बेहतर है. 

अब US में क्या होगा? 
रिसेशन आने की सम्भावनाओं के चलते US में अब ज्यादातर स्टॉक मार्केट इन्वेस्टर्स अपना पैसा बैंकिंग स्टॉक्स से वापस निकालेंगे. बैंकिंग सेक्टर को लेकर बढ़ती अफवाहें मुख्य रूप से क्षेत्रीय और छोटे बैंकों पर प्रभाव डालेंगी जो पूरी तरह से ‘होलसेल फंडिंग’ पर निर्भर होते हैं. कैपिटल की अपनी नई जरूरतों को कम करने और अपने बिजनेस और शाखाओं को टाईट करने के लिए यह बैंक क्रेडिट जांच के नियमों को इकट्ठा करेंगे और अंतत: क्रेडिट एक्सेस की वजह से बंद हो जायेंगे. 

सातवां सबक: फाइनेंस, कॉन्फिडेंस की वजह भी होता है और इसका प्रभाव भी. बेशक इस क्राइसिस का प्रभाव अब और न फैले लेकिन इस क्राइसिस की वजह से बैंकिंग की रफ्तार धीमी पड़ जायेगी. 10 मार्च को SVB गिरने के बाद यह क्राइसिस बैंकिंग के क्षेत्र में एक के बाद एक दूसरी क्राइसिस को जन्म न डे उसके लिए US गवर्नमेंट से बहुत फुर्ती से एक्शन नहीं लिया. भारत इससे सीख सकता है कि, एक रेगुलेटर कितनी जल्दी फैसले लेकर एक गिरे हुए फाइनेंशियल संस्थान की लोन चुकाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और उसे वापस से खड़ा कर सकता है. यह कुछ ऐसा है जिससे भारतीय रेगुलेटर्स अपनी वर्तमान व्यवस्था को बदल सकते हैं. 

आठवां सबक: फाइनेंशियल संस्थानों की समस्याओं को निपटाने की रफ्तार बहुत जरूरी है. किसी भी रुक चुके फाइनेंशियल संस्थान की कीमत में समय की वजह से बहुत जल्दी गिरावट आने लगती है. यह मामला फाइनेंशियल संस्थानों के रियल-टाइम डिजिटल देख-रेख के महत्त्व को और ज्यादा जरूरी साबित करता है. 

नौवां सबक: रेगुलेटर्स को सुनिश्चित करना होगा कि, फाइनेंशियल संस्थान केवल कागजों पर ही न रह जाएं बल्कि सच में बिजनेस कर पायें. भारतीय फाइनेंशियल सुविधाओं के पास लाइसेंस वाली बहुत सी इकाइयां मौजूद हैं जो सिर्फ कागज पर ही रह गयी हैं. रेगुलेटर्स को ऐसी फाइनेंशियल संस्थाओं को बंद कर देना चाहिए जो सिर्फ अपने लाइसेंस की कीमत की वजह से कागज पर बनी हुई हैं और असलियत में कोई बिजनेस नहीं करतीं. 

दसवां सबक: फाइनेंस के बिजनेस के लिए आपका उद्देश्य सीरियस होना चाहिए और साथ ही आपका ध्यान केन्द्रित और इन्वेस्टमेंट्स को लेकर सब्र चाहिये न कि दिखाने के लिए सिर्फ एक लाइसेंस. 
 

यह भी पढ़ें: अब 9000 नौकरियों पर संकट, लगेगा बड़ा झटका !

 


टैग्स
सम्बंधित खबरें

दुनिया ने बनाया युवा संस्कृति का संग्रहालय, भारत को चाहिए ऐसे दर्जनों संग्रहालय

इस संग्रहालय को अलग बनाने वाली बात इसकी वस्तुओं को संग्रहित करने की सोच है. टीम अपने दृष्टिकोण को "बॉटम-अप क्यूरेशन" कहती है, जिसे जानबूझकर हस्तनिर्मित रखा गया है.

1 hour ago

3C फ्रेमवर्क से बंगाल की आर्थिक पुनर्बहाली को मिलेगी नई दिशा

बंगाल की चुनौती संसाधनों की कमी नहीं है. वास्तविक समस्या यह है कि राज्य अपनी मौजूदा संपत्तियों को एक प्रभावी आर्थिक रणनीति में बदलने में विफल रहा है.

8 hours ago

भारत-जापान साझेदारी और मानव-केंद्रित एआई का भविष्य

प्रोफेसर सी. राज कुमार लिखते हैं, 'भारत और जापान एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां वे AI के लिए चौथा और मौलिक मार्ग विकसित कर सकते हैं.

4 days ago

ईरान को ‘अनफ्रीज’ करना: असली चुनौती अब शुरू होगी

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं, 'अमेरिका-ईरान शांति समझौता अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है और रिपोर्टों के अनुसार 60 दिनों की अवधि में लगभग 24 अरब डॉलर जारी किए जा सकते हैं. ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह पैसा जब ईरान पहुंचेगा, तब उसका क्या होगा?'

6 days ago

2026 की तीसरी तिमाही का ज्योतिष: एआई, संघर्ष और वैश्विक परिवर्तन

ज्योतिषाचार्य विक्रम चन्दीरमानी लिखते हैं कि 2026 के पहले छह महीनों के दौरान इनमें से कई विषय पहले ही उभरने लगे हैं. प्रौद्योगिकी कंपनियों के मूल्यांकन को लेकर चिंताएँ लगातार अधिक स्पष्ट होती जा रही हैं. यह चिंता केवल AI से जुड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की कुछ सबसे मूल्यवान निजी कंपनियों, जैसे स्पेसएक्स, के उच्च मूल्यांकन को लेकर भी देखी जा रही है.

1 week ago


बड़ी खबरें

₹860 करोड़ का कोहिनूर सौदा, राज ठाकरे की चुप्पी

एक राजनेता एक रियल एस्टेट सौदे में प्रवेश करता है. एक सरकारी संस्था से जुड़ी वित्तीय कंपनी ₹225 करोड़ का निवेश करती है. फिर वही संस्था ₹135 करोड़ के नुकसान के साथ उस सौदे से बाहर निकलती है.

1 hour ago

मिडिल ईस्ट प्रैक्टिस के लिए प्राइमस पार्टनर्स ने मोहन दोईफोडे को बनाया MD

पूर्व डेलॉइट कंसल्टिंग लीडर GCC क्षेत्र में कंपनी के विस्तार और क्लाइंट संबंधों को देंगे नई दिशा

44 minutes ago

GDP से आगे: क्यों भारत की प्रगति का पैमाना सिर्फ आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि खुशहाली और जीवन गुणवत्ता भी होना चाहिए

पूर्व उत्तर प्रदेश मुख्य सचिव और लेखक आलोक रंजन का मानना है कि भारत की विकास यात्रा को केवल आर्थिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उनके अनुसार, खुशहाली, जीवन की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य और समावेशी विकास को भी प्रगति का महत्वपूर्ण पैमाना बनाया जाना चाहिए.

5 hours ago

Truhome Finance को 3,000 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए सेबी की मंजूरी

कंपनी के कुल एयूएम में 57.37 प्रतिशत हिस्सा हाउसिंग लोन का है, जबकि 39.22 प्रतिशत हिस्सा लोन अगेंस्ट प्रॉपर्टी का है. अन्य ऋण उत्पादों की हिस्सेदारी 3.41 प्रतिशत है.

1 hour ago

दुनिया ने बनाया युवा संस्कृति का संग्रहालय, भारत को चाहिए ऐसे दर्जनों संग्रहालय

इस संग्रहालय को अलग बनाने वाली बात इसकी वस्तुओं को संग्रहित करने की सोच है. टीम अपने दृष्टिकोण को "बॉटम-अप क्यूरेशन" कहती है, जिसे जानबूझकर हस्तनिर्मित रखा गया है.

1 hour ago