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मध्य प्रदेश की इकॉनमी को कहीं 'Hit Wicket' न कर दे शिवराज का 'Master Stroke'! 

चुनावी साल में मध्य प्रदेश में कई लोकलुभावन घोषणाएं हुईं हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने वोट की फसल काटने के लिए सरकारी खजाना दिल खोलकर लुटाया है.

नीरज नैयर 2 years ago

कर्ज का बोझ जब बढ़ रहा हो, तो जरूरतों में कटौती और फिजूलखर्ची पर पाबंदी में ही समझदारी है, लेकिन ये ‘समझदारी’ मध्य प्रदेश सरकार में नजर नहीं आती. चुनावी मौसम में वोट की फसल काटने के लिए शिवराज सिंह चौहान सरकार (Shivraj Singh Chouhan Government) ने सरकारी खजाने से ऐसी योजनाओं पर जमकर पैसा लुटाया है, जिन्हें फ्रीबीज (Freebie) या मुफ्त की रेवड़ियां कहा जा सकता है. इन्हीं में से एक है लाड़ली बहना योजना (Ladli Behna Yojana). पिछले कुछ सालों में मध्य प्रदेश पर कर्जा काफी बढ़ा है, इसके बावजूद 1 करोड़ 31 लाख महिलाओं को हर महीने मुफ्त में 1250 रुपए बांटना दर्शाता है कि BJP सरकार को राज्य की आर्थिक सेहत से ज्यादा वोट की चिंता है. BJP समर्थक इसे शिवराज का 'मास्टर स्ट्रोक' करार दे रहे हैं. वहीं, जानकारों का कहना है कि इससे प्रदेश की इकॉनमी का 'हिट विकेट' होना तय है.

हर साल आएगा इतना खर्चा
मार्च 2023 में प्रदेश सरकार ने लाड़ली बहना योजना की शुरुआत की थी. शुरू में पात्र महिलाओं के खाते में हर महीने 1000 रुपए डाले जा रहे थे, जिसे बाद में बढ़ाकर 1250 कर दिया गया और अब शिवराज सिंह ने एक और दांव खेलते हुए इसे 3000 रुपए तक करने की बात कही है. दरअसल, शिवराज के 1 हजार के जवाब में कांग्रेस नेता कमलनाथ ने महिलाओं को 1500 रुपए देने की बात कही थी. कहीं कांग्रेस को एडवांटेज न मिल जाये, इस डर से शिवराज सिंह ने 1000 को बढ़ाकर 1250 किया और सत्ता में वापसी पर इसे 3000 रुपए करने का कार्ड फेंक दिया. 1250 रुपए के हिसाब से ही सरकारी खजाने पर सालाना अनुमानित 19,650 करोड़ रुपए का बोझ आएगा.  

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया
एक रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में प्रदेश सरकार का बजट 3 लाख 14 हजार 25 करोड़ रुपए है. अब यदि सरकार की आमदनी और खर्चों को देखें, तो समझ आ जाएगा कि मुफ्त की योजनाओं के चलते आना वाला समय प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना मुश्किल भरा हो सकता है. सरकार की आमदनी 2023-24 में 2 लाख 25 हजार करोड़ रहने का अनुमान लगाया गया है जबकि खर्च 2,79,000 करोड़ रुपए. यानी सरकार हैसियत से ज्यादा खर्चा कर रही है. इस समय प्रदेश पर 3 लाख 31 हजार 651 करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्जा है. सितंबर में ही सरकार ने एक-एक हजार करोड़ का 2 बार कर्जा उठाया था. 

इकॉनमी के लिए खतरनाक ट्रेंड
मध्य प्रदेश इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस एंड रिसर्च के निदेशक प्रोफेसर यतेंद्र सिंह सिसोदिया का कहना है कि एक तो सरकार पर लगातार कर्ज बढ़ रहा है और उस पर मुफ्त में पैसा बांटना अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक ट्रेंड है. उन्होंने कहा, ‘जब लाड़ली बहना जैसी लोकप्रिय योजनाओं को अमल में लाया जाता है, तो उसके लिए बड़े पैमाने पर धन की जरूरत होती और इस जरूरत को पूरा करने के लिए सरकार आमतौर पर फंड डाइवर्ट करती है, कई आवश्यक खर्चों में कटौती करके उनका पैसा भी इन योजनाओं में लगाया जाता है. जिसका लॉन्ग टर्म में इकॉनमी पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है’. 

मूलभूत सुविधाओं में होगी कटौती! 
सिसोदिया मानते हैं कि फ्रीबीज कभी भी सस्टेनेबल मॉडल नहीं हो सकता. लाड़ली बहना योजना पर बात करते हुए वह कहते हैं – सरकार कब तक मुफ्त में पैसा बांट सकती है और आखिर में उसे इससे क्या हासिल होगा? इसके विपरीत मुफ्त की योजनाओं से प्रदेश का इन्फ्रास्ट्रक्चर जरूर प्रभावित होगा. प्रदेशवासियों को सड़कें, स्कूल, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी, तो पैसा चाहिए? जब सरकार कमाई का एक बड़ा हिस्सा लाड़ली बहना जैसी योजनाओं पर खर्च कर देगी, तो जाहिर है मूलभूत सुविधाओं पर होने वाले खर्चे में कमी आएगी.

उल्टा भी पड़ सकता है दांव
प्रोफेसर सिसोदिया आगे कहते हैं – शिवराज सिंह ने शॉर्ट टर्म गेन की आस में लाड़ली बहना योजना शुरू की है, लेकिन इसका लाभ उन्हें मिलेगा ही कहना मुश्किल है. क्योंकि जो लोग इस तरह की योजनाओं के दायरे में नहीं आते, वह खुद को छला हुआ महसूस कर सकते हैं और सरकार के खिलाफ भी जा सकते हैं. लिहाजा, ऐसी योजनाओं का विपरीत प्रभाव भी संभव है. सिसोदिया के अनुसार, GST लागू होने के बाद प्रदेश सरकार के पास रिवेन्यु जनरेट करने के साधन बेहद सीमित हो गए हैं. ऐसे में फ्रीबीज पर होने वाले खर्चे से दूसरी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक योजनाओं का प्रभावित होना लाजमी है, जो अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद खतरनाक है.

विकास की रफ्तार में ब्रेकर
शिवराज सरकार अब तक इतना कर्जा उठा चुकी है कि उसका ब्याज चुकाने में ही सालाना 24 हजार करोड़ रुपए चले जाएंगे. एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिग्विजय सिंह के कार्यकाल (2003-04) में प्रदेश पर कर्जा ही 20 हजार करोड़ रुपए था. यानी दिग्विजय सरकार पर जितना कर्ज था, उससे ज्यादा तो शिवराज सरकार ब्याज भर रही. इसमें कोई दोराय नहीं है कि प्रदेश में विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ी है. भोपाल – इंदौर मेट्रो का स्वागत करने के लिए तैयार हैं. निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल निर्मित हुआ है, लेकिन मुफ्त की योजनाएं इस रफ्तार के लिए ब्रेकर का काम करती हैं. 

बड़े पैमाने पर लोगों को नुकसान
प्रदेश की राजनीति और आर्थिक सेहत पर गहरी पकड़ रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल का भी मानना है कि लाड़ली बहना जैसी योजनाएं प्रदेश की अर्थव्यवस्था को खोखला बना देंगी. उन्होंने कहा – अगर टैक्स से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल मुफ्त की योजनाओं में खर्च किया जाएगा तो विकास कार्य प्रभावित होंगे और इससे सरकार को कोई फायदा नहीं होगा. खर्चा बढ़ने पर सरकार को इनकम बढ़ाने के रास्ते तलाशने होते हैं और ये तलाश आमतौर पर टैक्स में बढ़ोत्तरी पर खत्म होती है. टैक्स में इजाफे का मतलब है महंगाई का भड़कना. यानी इस तरह की योजनाओं का एक सीमित वर्ग को भले ही फायदा मिले, लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों को नुकसान उठाना होगा.

सब्सिडी बंद, रेवड़ियां बांट रहे
राकेश अचल के अनुसार – फ्रीबीज यानी मुफ्त की रेवड़ियों का चलन बेहद खतरनाक है. लेकिन केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक वोट की खातिर इसे बढ़ावा देने में लगी हैं. पहले ऐसा नहीं होता था, पहले चुनिंदा मदो पर सब्सिडी के रूप में राज-सहायता दी जाती थी, जैसे कि गैस सिलेंडर, पेट्रोल आदि. आज अधिकांश जनता के लिए सब्सिडी तो बंद कर दी गई है, लेकिन मुफ्त की रेवड़ियां खुलकर बांटी जा रही हैं. बेशक सब्सिडी पर भी सरकारी पैसा खर्च होता है, लेकिन उस बेरहमी से नहीं जैसा फ्रीबीज में हो रहा है. राकेश अचल को लगता है कि लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का फायदा शिवराज सरकार को मिल सकता है. क्योंकि पहले जो लोग वोट देने ही नहीं जाते थे, उनके लिए 1250 रुपए की राशि एक तरह से मतदान का प्रोत्साहन है. इसके अलावा, सत्ता में वापसी पर 1250 को बढ़ाकर 3000 रुपए करने का वादा भी शिवराज के पक्ष में जा सकता है.     

क्या किया जा सकता था?
शिवराज सरकार मुफ्त में महिलाओं को 1250 रुपए थमाकर इसे महिला सशक्तिकरण का नाम दे रही है. इसके बजाए यदि सरकार महिलाओं के कौशल विकास पर कुछ खर्च करती, या उनसे इन पैसों के बदले में कुछ काम करवाया जाता, जैसे कपड़े के थैले आदि बनवाना, तो इसके 3 प्रमुख फायदे होते. पहला – मुफ्तखोरी की आदत को बढ़ावा नहीं मिलता. दूसरा – महिलाओं में अपने दम पर कुछ कमाने – आगे बढ़ने का विश्वास जागृत होता और तीसरा – सरकार को भी योजना से कुछ न कुछ हासिल होता. 

क्या हो सकता है आगे?
चुनाव में जीत का सेहरा किसी के भी सिर बंधे, लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाएं बंद नहीं होंगी. कमलनाथ ने जीतने पर महिलाओं को 1500 रुपए देने की घोषणा की है और शिवराज सिंह इससे दो कदम आगे बढ़कर राशि को 3000 रुपए करने का वादा कर चुके हैं. ऐसे में प्रदेश की आर्थिक नब्ज का दबना तय है. इस तरह की योजनाओं पर सरकार को दोनों हाथों से पैसा लुटाना होगा. अब लुटाने के लिए पैसा भी चाहिए, तो संभव है कि किसी नए टैक्स की घोषणा कर दी जाए या फिर किसी मौजूदा टैक्स में इजाफा कर दिया जाए. सरकार को सबसे ज्यादा आमदनी पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और शराब से होती है. ऐसे में इनकी कीमतों के और भड़कने से भी इंकार नहीं किया जा सकता.  


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