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आर्थिक असमानता का बढ़ना देश के लिए अच्छे संकेत नहीं

भारत बहुत अधिक विषमतापूर्ण अर्थव्यवस्था वाला देश है, मगर असमानता अधिक बढ़ जाए, तो समाज में क्लेश-तनाव बढ़ता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

तीन दिन पहले भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने आंकड़े जारी कर गर्व से बताया कि पिछले वित्त वर्ष के दौरान अमेरिका ने भारत से अपने कारोबारी रिश्ते बढ़ाए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में अमेरिका और भारत का कारोबार 128.55 अरब डॉलर का हो गया है. वहीं अब चीन से हमारा कारोबार दूसरे नंबर पर आकर टिक गया, जो 113.83 अरब डॉलर पर आ गया है. मार्च में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 19.73 अरब डॉलर हो गया, निर्यात 2022-23 में 6 फीसदी बढ़कर 447 अरब डॉलर हो गया. पेट्रोलियम, फार्मा और रसायन और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों के आउटबाउंड शिपमेंट में 2022-23 में भारत का निर्यात 6 फीसदी बढ़कर 447 अरब डॉलर हो गया. 2022-23 में भारत का माल और सेवाओं का कुल निर्यात बढ़कर 770 अरब डॉलर हो गया, जो इस वित्त वर्ष की तुलना में 14 फीसदी दिखाता है. यह भारत सरकार के वार्षिक लक्ष्य से करीब 20 अरब डॉलर अधिक है. सरकार ने लक्ष्य 2022-23 के लिए 750 अरब डॉलर रखा था.

बढ़ रहा है व्यापारिक घाटा
भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय व्यापार 2022-23 में 7.65 फीसदी बढ़ा है. 2022-23 में भारत से अमेरिका में निर्यात में भी 2.81 फीसदी बढ़ोतरी के साथ 78.31 अरब डॉलर हो गया. इसके सापेक्ष भारत में अमेरिका से आयात भी इस दौरान 16 फीसदी बढ़ा है. अब ये 50.24 अरब डॉलर हो चुका है. वित्त वर्ष 2022-23 में भारत-चीन के बीच व्यापार 1.5 फीसदी गिरावट के साथ 113.83 अरब डॉलर का रह गया है. भारत से चीन के लिए 2022-23 में निर्यात में 28 फीसदी की गिरावट आई है, जिससे निर्यात 15.32 अरब डॉलर रह गया है. भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2022-23 में बढ़कर 83.2 अरब डॉलर हो गया. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ भी हमारे व्यापारिक रिश्ते बढ़े हैं. 2022-23 में यूएई 76.16 अरब डॉलर के साथ तीसरे, 52.72 अरब डॉलर के साथ सऊदी अरब चौथे और 35.55 अरब डॉलर के साथ सिंगापुर पांचवां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है. भारत का विदेशी निर्यात बढ़ना निश्चित रूप से एक सुखद अनुभूति है मगर चीन और अमेरिका सहित तमाम देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा हमारी उत्पादन क्षमताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है. यह असंतुलन निराशाजनक है.

अरबपतियों की संख्या में इजाफा
ऑक्सफैम इंटरनेशनल की "सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट" रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अरबपतियों की संख्या 2020 में 102 से बढ़कर 166 हो गई है, जहां ये वर्ष 2000 में केवल 9 थी. भारत में सबसे अमीर 1 फीसदी के पास अब देश की कुल संपत्ति का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा है. सिर्फ 5 फीसदी भारतीयों के पास देश की 60 फीसदी से अधिक संपत्ति है. रिपोर्ट के अनुसार, 2021-22 में जीएसटी में कुल 14.83 लाख करोड़ रुपये का लगभग 64 प्रतिशत नीचे की 50 प्रतिशत आबादी से आया, जिसमें शीर्ष 10 से केवल 3 फीसदी से कम जीएसटी आया. लैंगिक असमानता पर, रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला श्रमिकों को एक पुरुष कर्मचारी की कमाई के 1 रुपये की तुलना में सिर्फ 63 पैसे मिलते हैं. जब यह रिपोर्ट आई थी, तो सरकार के नेताओं ने तमाम सवाल उठाये मगर वास्तविकता सामने दिख रही है.

इस बात को लेकर चिंतित हैं लोग
हाल के आये तमाम सर्वे और रिपोर्ट्स से यह साफ हो जाता है कि ग्रामीण भारत में जरूरी सामान की मांग के साथ ही लग्जीरियस सामान की आपूर्ति भी कम हुई है. वहीं, धनी लोगों की खरीदारी बढ़ी है. यानी गरीब और मध्यम वर्ग महामारी के बाद के हालात हैं, से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है. चंद आंकड़े असमानता को स्पष्ट करते हैं. दुपहिया वाहनों की बिक्री ग्रामीण भारत में मांग की स्थिति को दर्शाने वाला अहम सूचक होता है. हमने देखा कि दुपहिया वाहनों की मांग महामारी के पहले के स्तर से अभी भी 16 फीसदी नीचे है. ऐसे ही फ्रिज, एसी और वॉशिंग मशीन के साथ भी है. सर्वे बताता है कि, 63 फीसदी भारतीय उपभोक्ता गैर-जरूरी चीजों और सेवाओं पर खर्च में कटौती कर रहे हैं. 74 फीसदी भारतीय अपनी व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता में हैं.

प्रॉपर्टी की बिक्री में आई तेजी
दूसरी तरफ, वित्त वर्ष 2022-23 में 2021-22 की तुलना में संपत्तियों की बिक्री में 50 फीसदी की बढ़त आई है. इनमें अधिकांश महंगी और आलीशान प्रॉपर्टी हैं. लग्जरी आइटम, जैसे रॉलेक्स, मर्सिडीज बेंज आदि, की मांग बढ़ी है. इससे ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट बिल्कुल सही साबित हो रही है. उम्मीद की जा रही है कि बहुत धनी लोग इस साल भी आर्ट और इलीट डिजाइनर उत्पादों पर अच्छा-खासा खर्च करेंगे. अधिक कमाई वाले दूसरे भारतीयों का भी खर्च लग्जरी में बढ़ रहा है. टीवी, फ्रिज, लैपटॉप, स्मार्ट फोन और जूतों के औसत बिक्री मूल्य में बीते एक साल में 18 फीसदी की वृद्धि हुई है. इन चीजों में जो अपेक्षाकृत सस्ते उत्पाद हैं, उनका औसत बिक्री मूल्य अभी महामारी के पहले के स्तर पर नहीं पहुंचा है. यह श्रेणी कुल बिक्री में 70-80 फ़ीसदी का योगदान करती है. इस तरह से हम असमानता की स्थिति को समझ सकते हैं. जहां एक तरफ विदेशी व्यापार में असमानता देखने को मिल रही है, वहीं सामाजिक आर्थिक असमानता भी चुनौती के रूप में सामने है.

बढ़ सकता है क्लेश-तनाव
हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता की खाई लगातार बढ़ती जा रही है. भारत बहुत अधिक विषमतापूर्ण अर्थव्यवस्था वाला देश है, मगर असमानता अधिक बढ़ जाए, तो समाज में क्लेश-तनाव बढ़ता है. इससे समग्र विकास पर नकारात्मक प्रभाव भी होता है और अपराध बढ़ते हैं. यह आवश्यक है कि भारत खुद ही आय की इस असमानता को खत्म कर, सभी आर्थिक वर्गों में समृद्धि सुनिश्चित करे. जब यह संतुलन बनेगा, तब हर तरह से समृद्धि की दिशा में हम कदम बढ़ा सकेंगे, अन्यथा यह असंतुलन दावे करने के लिए तो ठीक है मगर समग्र रूप से नुकसान ही पहुंचाएगा.


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