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क्या PM मोदी वेदों में बताए गए प्रधानमंत्री के गुण और कर्तव्यों के अनुरूप हैं?

वेदों के अनुसार राजा या प्रधानमंत्री में कई प्रकार की योग्यताएं होनी अनिवार्य है. इस लेख में उन्हीं के बारे में बताया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • दक्ष भारद्वाज, संस्थापक ट्रस्टी, डॉ सत्यकम भारद्वाज वैदिक रिसर्च फाउंडेशन

राज्य का दुष्ट मुखिया सदा विद्रोह को उत्तेजित करता है और लोग विद्रोह करते हैं और उसे उखाड़ फेंकते हैं. तो क्या वेद दुष्ट राजा या लालची धूर्त शासक को उखाड़ फेंकने का आदेश देता है? लेकिन एक अच्छा राजा जो स्वयं एक पवित्र व्यक्ति है, जो निस्वार्थ रूप से अपने नियमों का पालन करता है और अपनी प्रजा को प्रसन्न रखता है, तभी उसकी प्रजा सभी सामाजिक नियमों का पालन करेगी और श्रेष्ठ कुलीन प्रजा कहलाएगी.

राजा या शासक
वेदों के अनुसार राजा या प्रधानमंत्री में ये योग्यताएं होनी अनिवार्य है: -
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।
(अथर्ववेद XI-5-17)
2. राजा – राजृ का व्युत्पन्न है  "दीप्तो" = तेज़, प्रकाशित करना, चमकना - और उसे प्रशंसनीय और लोकप्रिय होना चाहिए. वेद में राजा का अर्थ राजा नहीं है. यह कोई भी प्रसिद्ध शक्तिशाली, सदाचारी व्यक्ति हो सकता है, जो अपनी प्रजा के लिए स्नेह रखता हो.
मंत्र वर्णन करता है
राजा – राजा/प्रधान मंत्री (विरक्षति) अपने राज्य की पूरी तरह से रक्षा करने के लिए सम्पूर्णतः है, (तपसा) बहुत बुद्धिमानी और परिश्रम से (राष्ट्रं) की रक्षा और यह (ब्रह्म) है तभी वह राज्य को महान समृद्धि और शक्ति के लिए विकसित कर सकता है. इस मंत्र के अनुसार देश और प्रजा के प्रति पूर्णत: समर्पित और विद्वान, बुद्धिमान, क्रियाशील, निपुण और शक्तिशाली व्यक्ति को ही राष्ट्र और देश का मुखिया चुनना चाहिए. किसी राज्य के प्रमुख के चयन में किसी पदानुक्रम या वंश प्रणाली का कोई प्रश्न नहीं उठता है.

"बाहू राजन्यः कृतः।"
(यजुर वेद XXXI - 11)
बाहू: प्रधानमंत्री की दो भुजाएं हैं, उनके साथ उपांग, हाथ और ऊंगलियां आदि हैं
यदि कोई किसी पर आक्रमण करता है तो भुजाएं ही आगे बढ़कर शरीर की रक्षा करती हैं. पूरे शरीर को रक्षात्मक अंग के रूप में सुरक्षित रखना उनका विशिष्ट कर्तव्य है. इस प्रकार, यह रक्षा और आघात के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है. एक राष्ट्र के सम्बन्ध में, यह रक्षा और गृह मंत्रालयों की तरह है. उन्हें बाहू बन्धनात भी पुकारा जाता है।

"बाहू का अर्थ है बाध्यकारी प्रतिनिधि और प्रणाली".
यह पकड़ उन भयानक व्यक्तियों के लिए है जिनके आपराधिक मंशा /लक्ष्य हैं. उन्हें दृढ़ता से नियंत्रित और कड़ा रखा जाना चाहिए. तो, बहू समाज को पकड़ने या नियंत्रित करने के प्रतिनिधि हैं. दूसरी पकड़ एक कोमल आलिंगन है, जो सराहना और प्रशंसा को दर्शाता है, जैसा कि एक अच्छे व्यक्ति आदि के लिए व्यक्तियों के अच्छे क्रम की सराहना करता है. इस प्रकार बाहु देश के गृह मंत्रालय की भांति कार्य करते हैं; क्योंकि इस मंत्रालय का कर्तव्य है कि वह समाज के दुष्ट तत्वों को दण्ड देने और प्रोत्साहित करने और प्रशंसा करने के लिए पूरी तरह से अलंघन करें और उन व्यक्तियों को स्नेहित करें और पुरस्कृत करे, जो अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह से पालन करते हुए देश की सेवा करते हैं.

संक्षेप में, बाहु इस प्रकार एक राष्ट्र की रक्षा, और आघात शरीर के एक अंग हैं और गृह मंत्रालयों के रूप में शरीर की सेवा करते हैं. फिर से, माननीय मनु ने राजा को निम्नलिखित गुणों के समामेलन के रूप में वर्णित किया है: -
इन्द्र अनिल यमर्काणाम् अग्नेष्च वरूणस्य च ।
चन्द्र वित्तेषयौष्चैव मात्रा निर्हृत्य षाष्वतीः ।।

(मनु स्मृति 7-4)

(इंद्र) वह महान क्षमता और पराक्रम का प्रतीक होना चाहिए, जो शक्तिशाली और बलवान (अनिल) वायु जैसे तेज़ और बल की तरह हो, (यम) दृंढ, नियंत्रक और न्यायपूर्ण प्रशासक और सभी नियमों के संरक्षक भी उग्र और बुराई के प्रति दुष्टता/ कुपित हों, (चंद्र) चंद्रमा के समान स्वभाव में शांत और सुखद और अपने कोष, तिजोरी और वित्त का प्रबंधन करने के लिए सतर्क (वित्तेशा), ताकि वे वृद्धि करें और उनके पास हानि का आयव्यवक न हो. राष्ट्र और देश की समृद्धि और कल्याण के सम्बन्ध में विचार करने से पूर्व, देश के प्रमुख के रूप में चुने गए व्यक्ति में उपरोक्त योग्यताएं होनी चाहिए.
स्वे-स्वे धर्मे निविश्टानां सर्वेषाम् आनुपूर्वषः ।
वर्णानाम् आश्रमाणां च राजा सृष्टो अभिरक्षिता ।।

(मनु स्मृति 7-35)

राज्य के चुने हुए मुखिया में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह (आश्रम) हर किसी को अपने जीवन के व्यक्तिगत क्रम में, (वरणानम) अपने पेशे (स्वे स्वे धर्म) में इस तरह से कार्य करें कि वे अपने सभी व्यवसायों में अपने सामाजिक कर्तव्यों का पालन निष्कपटता से करें.
यजुर्वेद राजा को इस प्रकार चेतावनी देता है:
क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसि मात्वा हिंसीन् मामा हिंसीः ।
(यजुर्वेद XX-1)
वह कहता है:
हे राजा! (योनि असि) आप (क्षत्रस्य) विघटन से सुरक्षा के लिए स्रोत वा नियम के केंद्र हैं. आप (नाभि) बंधनकारी शक्ति हैं, जो (क्षत्रस्य) हमें समाज, राष्ट्र या देश के विघटन और पतन से रक्षा करती है.
वेद फिर ज्ञानित करते हैं  :-
 यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्य´्चै चरतः सह ।
तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषमं यत्र देवाः सहाग्निना ।।

(यजुर्वेद XX-25)
वो कहता है:
स्मरण रखें - (यात्रा) कभी भी व कहीं भी (ब्रह्म) वृद्धि, समृद्धि और (क्षत्रं च) विघटन या हानि से बचाव, दोनों को एक साथ अच्छी तरह से क्रम किया जाता है, (तम लोकम) उन परिस्थितियों या स्थितियों में. (पुण्यम प्रज्ञेशम्) आपको पता चल जाता है कि वहां सुख और प्रसार और समृद्धि का वास है और (यात्रा) इसी सिद्धांत पर है कि (देवः) बुद्धिमान कर्म (सह अग्निना) परिश्रम, निपुणता और परिश्रम से करते हैं. राजा को सावधान रहना चाहिए, राष्ट्र की बचत की रक्षा के लिए और अनुचित और निष्फल उद्देश्यों के लिए और अनुत्पादक परियोजनाओं पर अनुचित और अपव्ययी नहीं करना चाहिए.
वेद राजा को इस प्रकार सलाह देते हैं:
षिरो मे श्रीः यषोमुखं जिह्वा मे भद्रम् ।
बाहु मे बलम् इन्द्रियं हस्तौ मे कर्म वीर्यम् 
आत्मा क्षत्रम् उरो मम ।।

(यजुर्वेद XX-5,6,7)

राजा (शिरो में श्री) को सदा अपने मन में अपने लोगों (यशो मुखम) के भरण-पोषण और संरक्षण को धारण रखनी चाहिए. उसके कार्य और प्रशासन ऐसे होने चाहिए कि उसकी प्रजा की वाणी के पास उसकी प्रशंसा के सिवा और कुछ न हो. (बाहू बलम) उसके पास पूरे देश और समाज को बंधित करने की बल और शक्ति होनी चाहिए और उन्हें सभी बुराइयों और विघटन से बचाना चाहिए. उनके सभी प्रशासकों और कार्यकर्ताओं को श्रमसाध्य और सक्रिय होना चाहिए, (कर्म और वीर्यम) अपने कर्तव्यों में दृढ़ और सभी सिद्धियों में सक्रिय होना चाहिए. वह सदैव (उरो) अपने हृदय में (क्षत्रम्) धारण करे कि समाज का विघटन न हो; बल्कि उसके लोग प्रगतिशील समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं.

राजा को सदैव आत्मविश्वासी होना चाहिए और इतना दृंढ होना चाहिए कि वह गर्व से कह सके:
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः 
(अथर्ववेद VII-50-8)
"मेरा दाहिना हाथ इतनी मेहनत और सदाचार से काम कर सकता है कि मेरा बायां हाथ जीत और कुल उपलब्धियों का आनंद ले सके?"
वेद ने राजा को फिर परामर्श दी:
 चक्षुश्मते श्रृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजाम् रीरिषो मा उत वीरान्।         
(यजुर वेद XXXV-7)
हे राजा! सदा (चकसुस्मत) खुली आंखों से सतर्क रहें और राज्य के संबंधों को देखें और (शवता) सदैव प्रजा के आरोपों को धैर्यपूर्वक सुनें, सतर्क रहें और राष्ट्र के हित के लिए सदैव लगे रहे. माननीय मनु एक राजा या देश के प्रमुख की नीति और नैतिकता पर विशेष बल देते हैं. वह कहता है:-
“इंद्रियाणं जय योगं समतिष्टेद दीवानीशम्
जितेंद्रियो ही शक्नोति वाशे स्थापयितुम प्रजाः”

(मनु स्मृति 7-44)

राजा को चाहिए कि वह दिन-रात अपनी समस्त इन्द्रियों (जय) को अपने प्रबल वश में रखे. ऐसा राजा जो स्वयं सभी सामाजिक आचार-विचारों का पालन करता है और उनका पालन करता है, वही राजा (वाशे स्थापितुम) अपने लोगों और राष्ट्र को उच्च सामाजिक और राष्ट्रीय नैतिकता पर नियंत्रण में रख सकता है और उनका मार्गदर्शन (प्रजा) कर सकता है. उसे स्वयं सभी सामाजिक नियमों का पालन करना चाहिए और तभी उसके लोग उसका पालन करेंगे.
यह अक्सर कहा जाता है "यथा राजा तथा प्रजा", अर्थात्, "जैसा राजा वैसी ही प्रजा".

मेरे विचार में वेदों का विश्लेषण करने के उपरान्त जैसे वेदों में आदेश दिया है कि प्रधानमंत्री के क्या कर्म होने चाहिए उधारणतः देश की रक्षा (वृद्धि) और निरपेक्ष, धर्म, वर्ण, और सिद्धांत सारी प्रजा के कल्याण को ध्यान मे रखने का क्रम करना चाहिए और राष्ट्रद्रोहियों को दंडित करना अनिवार्य है. ये सब गुण हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी में हैं. देश के सभी वासियों की रक्षा, वृद्धि, समृद्धि, कुशलता के विषय मे शासन का कर्म कैसे किया जाना उचित है यह उज्जवल परिवर्तन लाये हैं. मैं यह भी कहना चाहता हूं कि सदियों के बाद हमारे देश में एक प्रधानमंत्री / शासक हैं, जिसने 8 साल की छोटी अवधि के भीतर उनके लोकाचार की, विश्व मे जहां-जहां दरिद्र हैं उनकी सहायता करना, यह क्रम सारे विश्व ने स्वीकृत किया है और उनकी उच्चता के पद की भी मान्यता दी है.
 


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