होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / दिशा...आत्म निर्भर भारत : अब देश में आर्थिक विकास के नारे करने होंगे बुलंद

दिशा...आत्म निर्भर भारत : अब देश में आर्थिक विकास के नारे करने होंगे बुलंद

आज भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. कोविड के बाद अनेक देशों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है और विकसित देश भी महंगाई की मार से त्रस्त हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

पूरन डावर
(सामाजिक चिंतक एवं आर्थिक विश्लेषक)

मैं, देश के प्रति अति आशान्वित हूं. हमने अभी आजादी के 75 वर्ष पूरे किए हैं. इन 75 वर्षों में कई बड़े परिवर्तन भी देखने को मिले हैं. आज देश के नारे बदल चुके हैं. पहले नारे हुआ करते थे - अंग्रेजों भारत छोड़ो, इंकलाब जिंदाबाद. तब हमारी जरूरत अंग्रेजों से छुटकारा पाकर आजादी हासिल करने की थी, पर आज आवश्यकता है आत्मनिर्भरता की. अब देश में आर्थिक विकास के नारे मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, स्पीडअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, अपस्किल इंडिया, री-स्किल इंडिया के रूप में बदल चुके हैं.

सरकार के प्रयासों के साथ खड़ा होना होगा
जनता अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी के नारे लगाती थी. आज यह बदले हुए नारे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार दे रही है, जिसे हमने देश के विकास और आत्मनिर्भरता के लिए चुना है. लेकिन क्या सरकार के ये नारे हम सभी के साथ दिए बगैर या सुर में सुर मिलाए बिना पूरे हो सकते हैं? कतई नहीं. हमें सरकार के इन प्रयासों के साथ खड़ा होना होगा. सुर में सुर मिलाकर एक जन आंदोलन के रूप में सकारात्मक भागीदारी करनी होगी. 

'बस और नहीं' यह बंद होना ही चाहिए
एक व्यक्ति के जीवन में 75 वर्ष का समय काफी लंबा होता है, लेकिन किसी देश के लोकतंत्र के लिए यह समय अधिक नहीं होता. यदि अमेरिका की स्वतंत्रता के पहले 75 वर्ष का इतिहास देखें तो शायद इस स्थिति पर भी नहीं था, जहां अभी हम खड़े हैं. लोकतंत्र एक हैंडपंप की तरह होता है. पहले मिट्टी निकलती है, फिर गंदा पानी निकलता है, उसके बाद धीरे-धीरे साफ पानी निकलने लगता है. गीता का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है कि जब अति होती है, तब 'मैं' आता हूं. लोकतंत्र में आजादी के उन्माद में हम अति तक पहुंचते हैं, फिर हमारे अंदर से ही निकलने लगता है- 'बस और नहीं'. यह बंद होना ही चाहिए. आज करुणा और ओज के कवि दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां कमोबेश हर कार्यशाला में सुनाई देती हैं- ‘हो गई पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए, अब इस हिमालय से एक और गंगा निकलनी चाहिए'. 

सीमित मुद्रास्फीति के साथ तेज़ी से आगे बढ़ रहे
आज भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. कोविड के बाद अनेक देशों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है और विकसित देश भी महंगाई की मार से त्रस्त हैं. पर हम सीमित मुद्रास्फीति के साथ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. कोविड काल को अभी मात्र एक साल ही पूरा हुआ है. चर्चाएं थीं कि भारत में वैक्सिनेशन हो ही नहीं सकता. इसमें कम से कम 15 वर्ष लग जाएंगे. आज 200 करोड़ से ऊपर टीकाकरण हो चुका है और एक क्लिक पर सर्टिफिकेट भी जारी हो रहे हैं. अमेरिका भी ऐसा नहीं कर सका है. भारत 100 से अधिक देशों में विश्वास के साथ वैक्सीन का निर्यात भी कर रहा है. यह भारत की गतिशीलता को दर्शाता है. 

डिजिटल इंडिया की बात
अब बात करते हैं डिजिटल इंडिया की. इसको लेकर सोच थी कि भारत जैसे ग्रे मार्केट वाले देश में डिजिटल कैसे होगा? आज डिजिटल लेन-देन में हम विश्व में एक नंबर पर हैं. मुझे लगता है कि इस प्रकार आने वाले समय में ग्रे मार्केट दूर की कौड़ी हो जाएगी. भारत को लेकर आज विश्व की धारणा बदली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के रूप में एक ऐसा नेतृत्व मिला है, जिसमें केवल भारत की आशाएं ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व उनकी ओर देख रहा है. हमें उद्यमिता के लिए तैयार रहना है. भारत का तो विश्व की ग्लोबल फैक्ट्री बनना निश्चित है. शिक्षा का अर्थ महज नौकरी के लिए डिग्री हासिल कर लेना बिल्कुल नहीं है. शिक्षा ज्ञान के लिए है, मात्र नौकरी के लिए नहीं. आपके पास ज्ञान होगा तो 10 को नौकरी देंगे, मांगेंगे नहीं. उस जमाने में अंग्रेजी शिक्षा नौकरी और अंग्रेजों की चाकरी के लिए थी. आज भी हम उसी शिक्षा का शिकार हैं. नई शिक्षा नीति उद्यम आधारित है. इसे तेजी से लागू करनी होगी. अंग्रेजी भाषा नहीं, आपकी अपनी मात्र भाषा ही आपको आगे बढ़ा सकती है. कभी भी कोई देश दूसरे देश की भाषा पर विकसित नहीं हो सकता. 

जो व्यापार करता था वही वैश्य कहलाता था
वैश्य कोई जाति नहीं थी. जो व्यापार करता था, वही वैश्य कहलाता था. जो शास्त्रों का ज्ञाता होता था, वो ब्राह्मण कहलाता था. हमारी जातियां, जिन्हें आज हमने पिछड़ा और दलित घोषित किया है, वह जातियां नहीं बल्कि उनके काम की पहचान थी. यही जातियां देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार की रीढ़ थी. यदि आवश्यकता थी, तो उनको शिक्षित कर उनके काम को सम्मानजनक बनाने की. उनके कौशल को निखारकर घरेलू उद्योग से लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योग में बदलने की. हमने आरक्षण का झुनझुना पकड़ाकर उन्हें ताउम्र पिछड़ा और दलित घोषित कर दिया. आज वही डिग्री लेकर घूम रहा है. चंद लोग विधायक, सांसद, सरकारी अधिकारी बन कर भी दलित और पिछड़े ही कहलाते हैं. विडंबना यह है कि लाभ लेने के लिए उसे पिछड़ा कहलाने में कोई गुरेज भी नहीं है.

शिक्षा का महत्व
शिक्षा का महत्व कितना है, इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि नाई को सैलून, ब्यूटी पार्लर या मेकओवर आर्टिस्ट में बदल सकती है. दर्जी को फैशन डिजाइनर - मेक टू मेजर में बदल सकती है. कूक को शेफ में, ड्राइवर को शोफेर में, मोची को शू क्लिनिक में, चाय वाले को चायोस में, कॉफी कैफे डे में, पकोड़े वाले को मेक डोनाल्ड में, हलवाई को हल्दीराम में, धोबी को लॉन्ड्री और ड्राई क्लीनर्स में, गाय भैंस चराने वाले यादवों को डेरी संचालक में बदल सकती है. किसान जैसे पेशेवर आधुनिक तकनीक अपनाकर अपना जीवन बदल सकते हैं. आधुनिक तकनीक से की गई खेती से पानी की बचत भी की जा सकती है. किसानों के बच्चों को किसानी छोड़कर शहरों में नौकरी की कतई आवश्यकता नहीं, बल्कि वे स्वयं कई लोगों को नौकरी दे सकते हैं. सफाई वाले पढ़-लिखकर हाउस कीपर कहलाते हैं. इन सारे कार्यों को सम्मानजनक बनाया जा सकता है. उद्योगों की शक्ल दी जा सकती है.

विकसित देशों में कैसे हो सकती हैं नौकरियां
युवा अव्यवस्थित कार्यों को एप के माध्यम से जोड़कर व्यवस्थित कर सकते हैं. यह दोनों के लिए जीत है. माली, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, हाउस कीपिंग, सिक्योरिटी को एप पर जोड़कर आय बढ़ा सकते हैं और बड़ी बचत भी करा सकते हैं. गांवों में बन रहे छोटे-छोटे उत्पादों को विश्व के किसी भी कोने में बेच सकते हैं. 5 जी सेवा आने से इसकी गति और तेज हो सकती है. कुल मिलाकर एक तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर, दूसरी तरफ तेजी से बढ़ती 5 जी डिजिटल तकनीक देश के विकास को एक बड़ी गति देने वाली है. यहां यह समझना आवश्यक है कि भारत में रोजगार या नौकरियां नहीं हैं, तो विकसित देशों में कैसे हो सकती हैं. वहां तो आधे से अधिक कार्यों को मानव के बजाय तकनीक के माध्यम से किया जाता है.


टैग्स
सम्बंधित खबरें

भारत के आर्थिक आत्मविश्वास का दशक

भारत जब अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो आत्मविश्वास के लिए एक मजबूत आधार मौजूद है. यह न तो आत्मसंतुष्टि है और न ही अति-उत्साह, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित आत्मविश्वास है.

1 day ago

भारत @ 80: उपलब्धियों की लंबी छलांग, अधूरी चुनौतियां और विकसित भारत 2047 की राह

लेखक डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी कहते हैं, अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है.

2 days ago

भारत की सबसे युवा पीढ़ी के प्रति हमारी सामाजिक जिम्मेदारी

पहली नौकरी के विरोधाभास से लेकर AI साक्षरता और लोकतांत्रिक असहमति की सेहत तक, Gen Z को भारत के भविष्य में भागीदार के रूप में देखने का तर्क, न कि एक ऐसी समस्या के रूप में जिसे संभालने की जरूरत है

4 days ago

बुढ़ापे की रफ्तार धीमी करने का विज्ञान

बेहतर नींद और पर्याप्त पानी से लेकर संतुलित आहार और नियमित व्यायाम तक, जीवनशैली की नौ आदतें सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम कर सकती हैं, बुढ़ापे की रफ्तार धीमी कर सकती हैं और बीमारियों के खतरे को घटा सकती हैं.

1 week ago

अगला केरल मॉडल: गरिमा के साथ बढ़ती उम्र

डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर के अनुसार, जैसे-जैसे केरल भारत के सबसे अधिक दीर्घायु समाजों में से एक बनता गया, वैसे-वैसे यह उन शुरुआती राज्यों में भी शामिल हो गया, जिन्हें उस सवाल का सामना करना पड़ा जिसका सामना आने वाले वर्षों में कई अन्य राज्यों को भी करना होगा: जब हर 5 में से 1 व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसा समाज कैसा होना चाहिए?

1 week ago


बड़ी खबरें

भारत के आर्थिक आत्मविश्वास का दशक

भारत जब अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो आत्मविश्वास के लिए एक मजबूत आधार मौजूद है. यह न तो आत्मसंतुष्टि है और न ही अति-उत्साह, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित आत्मविश्वास है.

1 day ago

विकसित भारत की ‘सप्तधारा’: मैन्युफैक्चरिंग से AI तक, पीएम मोदी ने बताया 2047 का रोडमैप

लाल किले से पीएम मोदी ने देश की 7 बड़ी ताकतों पर रखा फोकस. 1 करोड़ युवाओं को AI ट्रेनिंग देने का ऐलान, मैन्युफैक्चरिंग, किसान, टेक्नोलॉजी, डिफेंस, ग्रीन एनर्जी और सॉफ्ट पावर को बताया विकसित भारत की बुनियाद

1 day ago

भारत @ 80: उपलब्धियों की लंबी छलांग, अधूरी चुनौतियां और विकसित भारत 2047 की राह

लेखक डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी कहते हैं, अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है.

2 days ago

जी के 3,100 करोड़ रुपये के फंड जुटाने पर रोक क्यों? सैट ने सेबी के फैसले पर उठाए सवाल

प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि जब दो महीने की रोक खत्म होने के बाद निवेश की अनुमति है, तो अभी इस पर रोक लगाने का आधार क्या है. सार्वजनिक शेयरधारकों के भारी समर्थन को भी न्यायाधिकरण ने अहम माना.

2 days ago

स्टेशनरी बेचने से IIGJ के CEO तक... देबाशीष बिस्वास की 30 साल की प्रेरक यात्रा

बैंकिंग से शिक्षा जगत तक 30 साल का सफर, 60 हजार से ज्यादा छात्रों को दे चुके हैं मार्गदर्शन देवाशीष बिस्वास

2 days ago