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‘धुरंधर-2’ से हिला नैरेटिव, दाऊद की PR मशीन का खेल खत्म

मछीमार कॉलोनी लैंडिंग से लेकर नकली करेंसी साम्राज्य तक, यह फिल्म सब कुछ उजागर करती है. 26/11 के बाद छोटा शकील के मुंबई के संपादकों को किए गए घबराए हुए फोन, दशकों तक फिल्मों द्वारा बेची गई "पीड़ित डॉन" की कहानी, कराची का सेफ हाउस... सब कुछ सामने लाया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

पलक शाह
फोन कॉल तेजी से आने लगे, 26/11 हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर, जब मुंबई सदमे और अंधेरे में डूब गया था, छोटा शकील दाऊद इब्राहिम का सबसे भरोसेमंद सहयोगी  शहर के वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को फोन कर रहा था. संदेश साफ था, एक ऐसे व्यक्ति के शांत अधिकार के साथ जो सुना जाना जानता था: दाऊद का कोई रोल नहीं था. इससे दूर रहो. यह संकट प्रबंधन का सबसे बेखौफ रूप था. और लंबे समय तक, यह काम करता रहा.

यही वह कहानी है जिसे धुरंधर और इसका सीक्वल धुरंधर 2 ने भारतीय जनमानस में विस्फोट की तरह प्रस्तुत किया है. सिर्फ सिनेमा के रूप में नहीं, बल्कि एक हिसाब-किताब के रूप में. 30 साल के प्रोटेक्शन रैकेट पर अंतिम प्रहार के रूप में. 18 मार्च, 2026 को बॉलीवुड ने वह किया जो किसी बड़ी फिल्म ने पहले कभी करने की हिम्मत नहीं की: उसने दाऊद को स्क्रीन पर एक कमजोर, बिस्तर पर पड़े “बड़े साहब” (दानिश इकबाल द्वारा निभाया गया किरदार) के रूप में दिखाया, और उसे 26/11 की लॉजिस्टिक्स, भारत के नकली करेंसी साम्राज्य और ISI समर्थित आतंकी फंडिंग का निर्विवाद मास्टरमाइंड घोषित किया. नरम मिथक अब खत्म हो चुका है. सबूत अब देशभर के मल्टीप्लेक्स में चल रहे हैं. और कई दर्शकों के लिए, यही अतीत से एक बड़ा बदलाव महसूस होता है.

धुरंधर 2 में दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क की बारीक रूपरेखा खानानी से जुड़े नकली भारतीय करेंसी नेटवर्क, लश्कर ऑपरेशनों को फंड करने वाली हवाला चैनल्स, और कराची में बिस्तर पर पड़े कमांड स्ट्रक्चर कोई सिनेमाई कल्पना नहीं है. यह भारत की खुफिया फाइलों से लिया गया है: RAW और IB डोजियर, गिरफ्तार डी-कंपनी ऑपरेटिव्स की पूछताछ के ट्रांसक्रिप्ट, और सैटेलाइट के जरिए ट्रैक किए गए वित्तीय लेनदेन के सबूत, जिन्हें पिछले दशक में आधिकारिक ब्रीफिंग्स में धीरे-धीरे सामने लाया गया है.

हर विवरण भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए तथ्यों से मेल खाता है, 2017 में The Indian Express की रिपोर्ट से लेकर 2022-24 में द हिंदू की FICN जब्ती डेटा और NIA की चार्जशीट तक, जिसमें दाऊद को वित्तीय संरचना का मुख्य आर्किटेक्ट बताया गया. यह सटीकता फिल्म में दिखाए गए कमजोर लेकिन जिंदा “बड़े साहब” की छवि को ज्यादा विश्वसनीय बनाती है, बजाय उस बार-बार फैलाए गए अपुष्ट मिथक के कि उसकी मौत हो चुकी है. खुफिया संकेत गिरावट दिखाते हैं, अंत नहीं.

दाऊद की रक्षा करने वाला मिथक

“मिथक यह नहीं था कि दाऊद निर्दोष था बल्कि यह था कि वह एक मजबूर खिलाड़ी था, एक कारोबारी जिसे आतंकवाद में धकेल दिया गया,” मुंबई के एक पूर्व IPS अधिकारी कहते हैं.

करीब तीन दशकों तक एक खास कहानी न्यूज़रूम, ड्रॉइंग रूम और मल्टीप्लेक्स में कायम रही. दाऊद इब्राहिम: हां, अंडरवर्ल्ड डॉन. हां, 1993 के सीरियल ब्लास्ट का वांछित अपराधी जिसमें 257 लोग मारे गए. लेकिन एक ऐसा आतंकी मास्टरमाइंड जो भू-राजनीतिक खेल चला रहा था? यह आरोप, नरम कहानी के अनुसार, बहुत आगे चला जाता था.

इसके बजाय एक सुविधाजनक छवि बनाई गई कमेंट्री में, बैकग्राउंडर में, फिल्मों में जो उसका नाम सीधे नहीं लेती थीं लेकिन दर्शकों की सोच को प्रभावित करती थीं. कहानी यह थी: दाऊद पाकिस्तान की व्यवस्था का कैदी था. ISI ने उसे कराची में घेर रखा था. उसके पास उनके एजेंडे का साथ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. इस संस्करण में वह उतना ही पीड़ित था जितना खलनायक.

“इससे उसे एक अमूल्य चीज मिली इरादे से दूरी,” IPS अधिकारी कहते हैं.

दाऊद की कहानी की भौगोलिक सच्चाई

बॉलीवुड ने भी इसमें भूमिका निभाई. मुंबई अंडरवर्ल्ड से प्रेरित फिल्मों ने डॉन को एक कोड वाले इंसान के रूप में दिखाया. जटिल किरदार, जो सांप्रदायिक सीमाओं से दूर रहते हैं. जिनका काम अपराध है, विचारधारा नहीं. इससे गैंगस्टर और आतंकी के बीच की रेखा धुंधली हो गई, जो दाऊद के लिए फायदेमंद साबित हुई.

26/11 की भौगोलिक सच्चाई भी एक कहानी कहती है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया. लश्कर-ए-तैयबा के 10 हमलावर समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे और मछीमार कॉलोनी, बुधवार पार्क के सामने उतरे, यह वही इलाका है जिसे दशकों से तस्करी से जोड़ा जाता रहा है. सोना, प्रतिबंधित सामान, नशीले पदार्थ, यही वे रास्ते थे जिन्होंने डी-कंपनी के शुरुआती साम्राज्य को बनाया.

संदर्भ

डी-कंपनी, दाऊद इब्राहिम द्वारा 1980 के दशक में खड़ा किया गया आपराधिक नेटवर्क हवाला, नशीले पदार्थों, सोना तस्करी और नकली भारतीय करेंसी में सक्रिय रहा.

दुनियाभर की खुफिया एजेंसियां लंबे समय से इसके पाकिस्तान की ISI से गहरे संबंध होने का दावा करती रही हैं. भारत ने 2003 में आधिकारिक रूप से दाऊद को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया.

क्या मुंबई में लैंडिंग प्वाइंट संयोग था? नहीं. फिर भी यह सवाल कि 26/11 की भौगोलिक योजना को डी-कंपनी के तस्करी नेटवर्क से पूरी तरह अलग किया जा सकता है या नहीं कभी गंभीरता से नहीं पूछा गया. धुरंधर 2 यह सवाल उठाती है. जोरदार तरीके से. और जवाब भी देती है: दाऊद 26/11 का मास्टरमाइंड था और ISI के पीछे एक ताकत.

फिल्मों ने जिसे नरम नहीं किया

जहां पहले की फिल्मों ने कहानी को नरम बनाया, धुरंधर फ्रेंचाइजी इसके उलट करती है. यह दाऊद को ISI ऑपरेशनों की ताकत के रूप में, नकली करेंसी और खानानी ब्रदर्स के नेटवर्क को जोड़ने वाले वित्तीय आर्किटेक्ट के रूप में, और उत्तर प्रदेश के माफिया जैसे अतीक अहमद को निर्देश देने वाले व्यक्ति के रूप में, आतंकी ढांचे के किनारे नहीं बल्कि केंद्र में रखती है.

सबसे विवादास्पद रूप से, यह दाऊद को 26/11 से सीधे जोड़ती है एक ऐसा मुद्दा जिसे मुख्यधारा ने लंबे समय तक टाल दिया. खुफिया हलकों में यह धारणा पहले से थी. धुरंधर 2 इसे जनचर्चा में ले आती है, उसी जगह जहां पहले नरम मिथक बनाया गया था और इसे चुपचाप जाने नहीं देती.

“26/11 के कुछ ही घंटों में शकील मुंबई के संपादकों को फोन कर रहा था. संदेश: दाऊद का कोई रोल नहीं था, यह संकट प्रबंधन था और यह काम कर गया कम से कम कुछ समय के लिए.”

खंडहर में बदलता साम्राज्य

फिल्म की सबसे भयावह छवि विस्फोट या गोलियों की नहीं है. यह दाऊद की है “बड़े साहब” जो बिस्तर से आदेश दे रहा है. संगठित अपराध की दुनिया में जहर देना अक्सर आंतरिक टूट का संकेत होता है.

और वर्तमान इसे पुष्ट करता है. मार्च 2026: दाऊद इब्राहिम संरचनात्मक रूप से शांत हो चुका है. कोई बड़ा ऑपरेशन उससे जुड़ा नहीं दिखता. कोई नया सबूत नहीं. डी-कंपनी, जो कभी वैश्विक हवाला नेटवर्क और सुरक्षा तंत्र के साथ एक विशाल वित्तीय साम्राज्य थी अब बिखरे हुए हिस्सों में बदलती दिखती है.

केंद्र अब नहीं बचा है

फिल्म 2017-18 की उस जानकारी को भी सामने लाती है जिसे जल्दी खारिज कर दिया गया था: कि दाऊद को जहर दिया गया था. धुरंधर 2 उसे मृत्युशैया पर दिखाती है. अगर वे रिपोर्ट्स सही थीं, तो यह पीछे हटना नहीं, बल्कि ढहना था.

खामोशी की आवाज

और यही हमें वर्तमान में लाता है, जहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है. दाऊद इब्राहिम अब खामोश है, जोकि रणनीतिक खामोशी नहीं, बल्कि संरचनात्मक खामोशी है.

कोई बड़ा ऑपरेशन नहीं. कोई प्रभुत्व नहीं. कोई नया संकेत नहीं. डी-कंपनी अब एक नेटवर्क नहीं, बल्कि बिखरे हुए टुकड़ों जैसी दिखती है.

सत्ता के लिए केंद्र जरूरी होता है. और वह केंद्र अब नहीं रहा.

तीस साल तक दाऊद की रक्षा करने वाली कहानी सिर्फ प्रचार नहीं थी, यह एक सिस्टम था. इसमें पत्रकार, फिल्मकार और अधिकारी शामिल थे. धुरंधर ने सिर्फ इस कहानी को चुनौती नहीं दी, बल्कि उसकी नींव को तोड़ दिया: यह विचार कि सवाल अभी भी खुला है.

साए की दुनिया में, मिथक पहले मरता है, फिर सिस्टम और अंत में इंसान.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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