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मैनपुरी उपचुनाव: बहुत कठिन डगर है पनघट की, जानिए किसका पलड़ा कैसे भारी?
भाजपा और सपा के बीच है कड़ी टक्कर. शिवपाल यादव ने भी पासा फेंक दिया है. जानिए, अभी कैसी है वहां की राजनीतिक स्थिति.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
सुभाष ढल
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
नई दिल्ली: 3 दिनों में ही मैनपुरी उप चुनाव की स्थिति साफ हो जाएगी, ये मैंने पहले ही कहा था. सभी नजरें शिवपाल यादव के अगले कदम पर टिकी थीं. अब पूरी स्थिति स्पष्ट हो चुकी है. शिवपाल यादव भी मैनपुरी से चुनाव लड़ना चाहते थे. उनको प्रत्याशी नहीं बनाया गया, पर अब शिवपाल यादव ने विद्रोह ना करके पारिवारिक निर्णय को मान्यता दे दी है और डिंपल यादव की सेना में एक सिपाही बन चुके हैं. मैनपुरी संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 5 सीटें हैं मैनपुरी सदर, भोगांव किशनी करहल और जसवन्त नगर.
टक्कर बराबर की, तो जीतेगा कौन?
चुनाव हुंकार ले चुका है. स्थिति स्पष्ट हो चुकी है. टक्कर बराबर की है. जिसका प्रबंधन सशक्त होगा चुनाव वही जीतेगा. जहां तक जातिगत समीकरण का प्रश्न है तो इस क्षेत्र की मुख्य जातियां हैं- यादव, शाक्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम. इस क्षेत्र में यादव के 4.25 लाख वोट, शाक्य के 3:25 लाख वोट, क्षत्रिय के करीब 2.00 लाख वोट, ब्राह्मण के 1.25 लाख वोट, दलित के 1 लाख वोट, मुस्लिम और अन्य जातियों के 55,000 वोट हैं.
मुलायम का पूरा परिवार इस वक्त एकजुट
इस वक्त मुलायम का पूरा परिवार एकजुट है. सपा द्वारा मुलायम सिंह को श्रद्धांजलि के रूप में वोट मांगा जा रहा है, क्योंकि यह सीट मुलायम सिंह के परिवार एवं सपा के भविष्य को भी निर्धारित करेगी. भाजपा ने रघुनाथ शाक्य को प्रत्याशी घोषित करके अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि येन केन प्रकारेण सीट को जीता जा सके. अंदर खाने भाजपा में भी प्रत्याशी चयन पर कुछ रोष भी हो सकता है, पर टिकट जिताऊ प्रत्याशी को दिए जाने की भाजपा की परंपरा बन चुकी है.
भाजपा के लिए क्या जरूरी?
भाजपा अगर शाक्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण और दलित वोट इकट्ठा कर लेती है तो कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी. जिस प्रकार से सपा में मुलायम परिवार की एकजुटता है, ठीक उसी प्रकार से भाजपा परिवार को भी एकजुट होकर यह चुनाव लड़ना पड़ेगा. यही इस चुनाव की हार जीत का मुख्य केंद्र बिंदु होगा.
रघुराज सिंह शाक्य को भाजपा ने क्यों बनाया प्रत्याशी?
निश्चित तौर पर भाजपा खेमे में बिखराव की स्थिति लाए जाने के प्रयास किए जाएंगे. भाजपा भी इस शंका से बेखबर नहीं है और रणनीतिकार इस पर पैनी नजर रखे हुए होंगे. सीट निकालने की मंशा से ही रघुराज सिंह शाक्य को प्रत्याशी बनाया गया है जिनके संबंध पूर्व में सपा और प्रसपा से अत्यंत मधुर रहे हैं और उक्त पार्टियों के अंग भी रहे हैं. अब देखना यह है कि मैनपुरी में सहानुभूति लहर चलती है या भारतीय जनता पार्टी का सशक्त प्रबंधन.
शिवपाल यादव की चाल को समझना आसान नहीं
इस चुनाव में ही समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक शिवपाल यादव को भी अपना भविष्य टटोलना पड़ेगा, क्योंकि पारिवारिक निर्णय के सामने शिवपाल झुक चुके हैं पर सपा में हुए अपमान को वह भूले नहीं होंगे. ट्यूटर पर वे कुछ भी लिखें, शिवपाल यादव को भांपना भी सपा के लिए टेढ़ी खीर होगी. यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जो इस चुनाव में अपना रंग दिखा सकता है. राजनीति में सब कुछ संभव है.
कुल मिलाकर कहा जाए कि भारतीय राजनीति में यह चुनाव वर्तमान परिवेश में अत्यंत दिलचस्प होगा तो अनुचित नहीं है. रणनीतिकार कहां तक अपने अपने दांव पेंचों में सफल होंगे चुनाव परिणाम आने के बाद स्पष्ट होगा.
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