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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐसा बयान कैसे दे दिया? जानिए उनके दावे की क्या है हकीकत

रुपये की गिरती साख और बढ़ता व्यापार घाटा भारत के भविष्य के आर्थिक संकट का राह दिखा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अजय शुक्ला
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वाशिंगटन में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की सालाना बैठकों में शामिल होने के बाद मीडिया से कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है. अमेरिकी डॉलर की मजबूती के बावजूद भारतीय रुपया में स्थिरता है. दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में भारत में मुद्रास्फीति कम है.

रुपये में गिरावट पर वित्त मंत्री ने क्या कहा
रुपये में गिरावट पर उन्होंने कहा, "सबसे पहली बात, मैं इस तरह नहीं देखूंगी कि रुपया फिसल रहा है, बल्कि मैं यह कहना चाहूंगी कि रुपये में मजबूती आई है. डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है." सीतारमण के इस बयान पर सभी अर्थशास्त्री आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इस वर्ष रुपये में आई आठ फीसदी की गिरावट चिंताजनक है. इसे संभालने के लिए भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 110 अरब अमेरिकी डॉलर घट चुका है.

रुपये की गिरती साख और बढ़ता व्यापार घाटा
रुपये की गिरती साख और बढ़ता व्यापार घाटा भारत के भविष्य के आर्थिक संकट का राह दिखा रहा है. बीते कारोबारी सप्ताह के अंत में डॉलर के मुकाबले रुपया 82.35 के भाव पर बंद हुआ था. हालात, ये हैं कि महंगाई लगातार दहाई के अंक पर चढ़ी हुई है. लोगों पर टैक्स का भार भी बढ़ता जा रहा है. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक साल पहले अक्तूबर में 642.45 अरब डॉलर था, जो इस साल अक्टूबर के पहले सप्ताह में 532.87 अरब डॉलर पहुंच गया था. बावजूद इसके वित्त मंत्री ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार अच्छा है, जबकि कर्ज की जो देनदारियां चंद महीने में आने वाली हैं, उनके भुगतान के बाद भंडार और भी नीचे आना तय है.

जब वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण यह दावा कर रहीं थीं, तभी अमेरिकी सरकार कुछ आर्थिक प्रतिबंध के फैसले ले रही थी. अमेरिका के "वॉल स्ट्रीट जॉर्नल" (WSJ) अखबार में एक विज्ञापन छापा गया, जिसमें अमेरिका से भारत में निवेश को रोक कर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है. यह विज्ञापन ऐसे वक्त में छपा है, जब भारत की सर्वकालीन आर्थिक नाकामी देखने को मिल रही है. नरेंद्र मोदी सरकार काफी दिनों से विदेशी निवेश को बढ़ाने की कोशिश कर रही है मगर हो उलट रहा है.

विदेशी निवेशक भारत से पैसे खींच रहे
पिछले चंद महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारत के पूंजी बाजार से ढाई लाख करोड़ रुपये के करीब निकाला है. हम इस चिंता से उबर भी नहीं पाए हैं कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स की सालाना रिपोर्ट में भारत को भुखमरी के पायदान पर 107वें स्थान पर खड़ा करके खराब हालात का संदेश दे दिया गया. इसके पहले कुपोषण और सामाजिक-आर्थिक असमानता के इंडेक्स में भी भारत की हालत बेहद चिंताजनक बताई गई है. इन हालात में खड़े देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बताना अपने आप में हास्यास्पद है.

निवेश का स्तर 25 फीसदी
इस वक्त निवेश का स्तर 25 फीसदी है, जो कि 2014 में 37 फीसदी होता था. इस वक्त वास्तविक निवेश की हालत भारत के आर्थिक बदहाली के दौर 1991 से भी खराब है. विदेशी निवेश के हालात तो खराब हैं हीं, घरेलू निवेश की हालत भी नहीं सुधर रही है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले आठ साल में भारत के उद्योगपतियों ने भी सर्वनिम्न निवेश किया है.

देश की जनता की जेब खाली
इससे स्पष्ट है कि देश की जनता की जेब खाली है. सरकार 32 फीसदी विदेशी निवेश का दावा करती है, मगर उसके आंकड़े इसका समर्थन नहीं करते हैं. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि बैंकों में मिडल क्लास की निश्चित अवधि के निवेश घट चुके हैं. लघु बचत की ब्याज दरें भी घटी हैं, जिससे उसमें भी निवेश कम हो गया है. तमाम निवेश योजनाओं की किश्तें लोग अदा नहीं कर पा रहे हैं. महंगाई और कम आय के हालात बढ़ते जा रहे हैं, जिसमें खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है.

नोटबंदी पर सवाल
आपको याद होगा 2016 में राहुल गांधी ने नोटबंदी को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकट बताया था. उस वक्त अर्थशास्त्री रघुरमन राजन और पूर्व प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी इसे अर्थव्यवस्था के लिए डिजास्टर बताया था. मौजूदा आर्थिक हालात उनकी बात सही साबित कर रहे हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर IMF का दावा
आईएमएफ ने भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया है, जो पहले 7.4 फीसदी का अनुमान बता रहा था. आईएमएफ का यह भी मानना है कि 2023 में यह दर और भी नीचे जा सकती है. उस वक्त यह 6.1 फीसदी रहने का अनुमान है. हालांकि राहत भरी बात यह है कि आगे रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से आगे बढ़ती रहेगी. आईएमएफ ने भारत के संरचनात्मक सुधार की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने इसमें काफी सुधार किए हैं. आईएमएफ की एमडी क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा, डिजिटल आईडी से लेकर डिजिटल एक्सेस के आधार पर सभी सेवाएं उपलब्ध करने के लिए भारत में डिजिटलीकरण में काफी सुधार हुए हैं. डिजिटलीकरण भारत की सफलता के लिए एक बड़ा कारक रहा है. इससे संभावनाएं बढ़ी हैं.

विंडफॉल टैक्स भी बढ़ाया
सरकार ने विमानन ईंधन के निर्यात पर प्रति लीटर 3.5 रुपये का विंडफॉल टैक्स बढ़ा दिया है. वहीं, ओपेक सहित कई देशों ने रोजाना 20 लाख बैरल कम तेल निकालने का फैसला किया है. जरूरत का 85 फीसदी तेल इन देशों से ही भारत आयात करता है. अब सरकार दूसरे विकल्पों पर विचार कर रही है. ऐसे में अन्य विकल्प भारत के लिए और भी महंगे पड़ेंगे. पिछले साल सिर्फ तेल आयात पर 120 बिलियन डॉलर खर्च कर चुके भारत पर सऊदी तेल कंपनियां प्रीमियम चार्ज लगा रही हैं. तेल महंगा होने का मतलब साफ है कि इसका बोझ देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक पड़ेगा.

वर्तमान में कृषि क्षेत्र भी काफी दिक्कतों में
वहीं दूसरी तरफ कोरोना काल में भी देश की अर्थव्यवस्था को बचाने में सबसे अधिक जिस सेक्टर ने मदद की वो कृषि क्षेत्र था, मगर मौजूदा हालात में वह क्षेत्र भी काफी दिक्कतों में है, उपज से लेकर भंडारण और सरकारी खरीद का चक्र बिगड़ने से संकट सामने है. सरकारी गोदामों में अनाज का स्टॉक इस वक्त पिछले पांच सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण खाद्यान्न संकट भी दुनिया के सामने खड़ा है. ऐसे में हमारा अनाज संकट में होना और भी मुश्किलें पैदा करेगा.

रोजगार का संकट पहले ही विकराल
रोजगार का संकट पहले ही विकराल है. उसके बाद किसी भी कोर सेक्टर में रोजगार के हालात ठीक नहीं हो पा रहे हैं. दूसरी तरफ खाने पीने से लेकर तमाम उन वस्तुओं पर जीएसटी लगाने और बढ़ाने के सरकारी फैसले से भले ही जीएसटी संग्रह बढ़ जाये मगर देश के आर्थिक हालात सुधरने वाले नहीं हैं. इसके लिए चार चीजों की जरूरत होती है, उद्योगों में निवेश, उत्पादन, रोजगार और खर्च मगर हमारी सरकार की अर्थनीति से यह सब नदारद है, जिससे हालात सुधरने के बजाय नकारात्मक दिशा में जा रहे हैं. अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए जरूरत इस नीति में सुधार करने की है.
 


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