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हिंदी दिवस: 'निखरा है हिंदी का रूप, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी'

भाषाओं के विकास के माध्यम से भारत की अर्थव्यवस्था बहुत अधिक सुंदर हो सकती है. इसमें सरकार को जो करना चाहिए वह यह है कि देश में कोई भी परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

  • डॉक्टर मुनीश्वर गुप्ता

अनेक बार ‘हिंदी दिवस’ पर हिंदी के प्रति प्रेम रखने वाले लोग अप्रसन्नता जाहिर करते हैं. मुझे ऐसा नहीं लगता. बहुत विभिन्न परिस्थितियों में चलते हुए किसी भाषा का विकास होता है. लंबे समय की अंग्रेजों की गुलामी एक बड़ा कारण है, हमारे देश में भाषाओं के विकास में देरी के लिए. परंतु यदि सही दृष्टिकोण से देखा जाए तो 1947 से लेकर अभी तक हिंदी बहुत आगे आ गई है. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हिंदी का महत्व बढ़ रहा है. परंतु हिंदी प्रेम में जब हम यह कहते हैं कि कोई अपने बच्चों को हिंदी माध्यम में क्यों नहीं पढ़ा रहा, उसका जवाब यह है कि अभी भी देश में अनेकानेक परीक्षाएं सिर्फ अंग्रेजी में होती हैं. जिनसे कि बच्चे का अच्छा भविष्य बनता है. उदाहरण के तौर पर एनडीए, कैट, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में भर्ती की परीक्षा और इस प्रकार की अनेक परीक्षाएं हैं.

हिंदी में लिखा शोध ग्रंथ 
यदि बच्चे को अपना भविष्य अच्छा बनाना है, तो निश्चय ही उसके मां-बाप उसे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाते हैं. मेडिकल क्षेत्र में हिंदी की बात बहुत अच्छे रूप में आगे बढ़ रही है. मेडिकल क्षेत्र में हिंदी का पहला कार्य 35 वर्ष पूर्व हुआ जब मैंने देश में पहली बार एमडी का शोध ग्रंथ हिंदी में लिखा. मेरे बाद ऐसा चार और लोगों ने किया, जिनके नाम हैं डॉ अविनाश पालीवाल आगरा से, डॉ सूर्यकांत लखनऊ से, डॉक्टर भंडारी इंदौर से, और डॉक्टर राजकुमार गुप्ता आगरा से. इस बात को भी लंबा समय निकल गया. विगत 15 वर्ष के अनेक प्रयासों से भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय खुलने के कारण मेडिकल क्षेत्र में हिंदी में पढ़ाई का तरीका कैसा हो इस पर अनेक बार भोपाल जाना हुआ. हिंदी माध्यम का मेडिकल कॉलेज बनाने की बात भी सरकार ने मानी थी. परंतु अलग से मेडिकल कॉलेज बनाने के बजाएं हर मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थी हिंदी माध्यम से लिख-बोल सकें, ऐसा सरकारी आदेश 4 वर्ष पूर्व 2018 में आया था और इससे भी एक कदम आगे जाकर इस वर्ष से गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल में एमबीबीएस के प्रथम वर्ष में एनाटॉमी, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री को हिंदी माध्यम से पढ़ाने की व्यवस्था हुई है.

न्यायालय का काम अंग्रेजी में क्यों? 
आर्थिक दृष्टि से यदि देखा जाए तब किसी सामान्य व्यक्ति के लिए कोई भी काम अपनी भाषा में करना लगभग 3 गुना तेजी से होता है. यह समय का अर्थशास्त्र भी है और भाषा की दृष्टि से यदि इसे स्वाभिमान से जोड़ा जाए तब व्यक्ति की ऊर्जा अपनी भाषा में बहुत होती है. अभी देश में प्रत्येक क्षेत्र में इस प्रकार की योजना हो रही है. न्याय के क्षेत्र में आजादी के 75 वर्ष बाद भी अधिकांश उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अंग्रेजी में काम करते हैं. इससे चंद अंग्रेजी जानने वालों की चांदी है. अधिकांश भारत का व्यक्ति इसमें मूर्ख बन रहा है. भारत में अंग्रेजी के स्थान को समाप्त करने की मांग नहीं है. अंग्रेजी को पूरी तरीके से खारिज भी नहीं किया जा सकता. सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अंग्रेजी के ज्ञान का लाभ भी मिला है. परंतु सामान्य जन के विकास में भारत में हिंदी और भारतीय भाषाओं के संपूर्ण स्वाभिमान की चिंता करने से प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिभा चयन में हमारे ग्रामीण पहुंचेंगे तब जाकर वह अपने क्षेत्र के लिए उपयोगी साबित होंगे. 

सिर्फ अंग्रेजी में न हों परीक्षाएं 
भाषाओं के विकास के माध्यम से भारत की अर्थव्यवस्था बहुत अधिक सुंदर हो सकती है. इसमें सरकार को जो करना चाहिए वह यह है कि देश में कोई भी परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए. अंग्रेजी में करने की मनाही नहीं है, परंतु सिर्फ अंग्रेजी में न हो यह राष्ट्रीय आवश्यकता है. यदि कोई परीक्षा अखिल भारतीय स्तर की है तब अंग्रेजी के साथ उसमें हिंदी हो, यदि कोई परीक्षा प्रांतीय स्तर की है तब उसमें अंग्रेजी के साथ उस प्रांत की भाषा अवश्य हो. ऐसा करने से देश के प्रत्येक छात्र को अपना भविष्य बनाने का अवसर मिलेगा और लगभग 1 पीढ़ी लगने के बाद हम इस बात का फायदा देख सकेंगे. जिन सरकारी विद्यालयों की स्थिति खराब हुई है उन पर अगर सही ध्यान दिया गया और अंग्रेजी माध्यम के बजाय अंग्रेजी एक भाषा और विषय के हिसाब से पढ़ाई जाए, तो विद्यार्थी का समुचित विकास उन विद्यालयों में भी होगा, जो अभी धीमे-धीमे अनुपयोगी होते जा रहे हैं. हिंदी दिवस पर अनेकानेक शुभकामनाएं.
 


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